अबला नहीं हो तुम

कॉलेज के कॉमन रूम में लंच के वक्त, व्यंजनों के साथ साथ गप्पों का भी मजा लिया जा रहा था।

मुझे यह नही समझ आता है कि लड़कियों को समानता का अधिकार चाहिए....अच्छी बात है, मिलनी ही चाहिए। समानता मतलब एक जैसा। जो जो लड़कों को मिल रहा है, वो सब। एक समान ही न? ज्यादा या कम तो नहीं न? पर जब कम मिले तो, हो हल्ला हंगामा। और ज्यादा मिल जाये तो? तो क्या? सरकार की मर्जी है? वो देना चाह रहा है तो कोई क्यों न ले, हैं ना भाई?... ललित ने कटाक्ष किया।

हा हा हा हा हा। ज्यादा कहाँ मिल रहा है? रश्मि ने रोटी तोड़ते कहा।

अरे भाई कहीं कहीं तो कुछ ज्यादा ही मिल रहा है- शिक्षा में, नौकरी में, यहां तक कि ट्रेन के टिकट में..समानता से कुछ ज्यादा ही। पर ये तो बहुत अच्छी बात है। किसी को कोई दिक्कत नही है। प्रमोद ने विनोद करते हुए कहा।

क्यों दिक्कत नही है? होनी चाहिए न? क्योंकि हमारे देश मे ज्यादा तो दलितों और अत्यंत पिछड़े को मिलने का रिवाज है न ? ओहो! मैं तो भूल ही गया । स्त्री भी तो अत्यंत ही दबी कुचली प्रजाति है मानव की। तो मिलना ही चाहिए। जब समुचित विकास हो जाये, जब सचमुच स्त्री और पुरुष का स्तर एक समान हो जाये तब भी मिलता रहना चाहिए, जैसा कि दलितों को मिल रहा है। क्यों? ललित ने व्यंगात्मक लहजे से कहा।

अच्छा एक तरफ तो समानता तो दूसरी तरफ विशेष सुरक्षा भी चाहिए। मुझे ये बताये कोई कि सचमुच लड़कियां अपने आपको लुप्तप्रयाय ही समझतीं हैं क्या अब तक? ललित ने फिर अपनी बात रखी।

कुछ समझतीं हैं जिनपे अत्याचार होता है। पर जो इंडिपेंडेंट हैं, जॉब कर रहीं है, अपने इच्छानुसार जी रही हैं वो नही समझती अपने को अबला और तबला। निधि हाथ लहराते हुए व मुंह बिचकाकर तार्किकता से बोली। और हां, कुछ को तो लेना देना ही नही है इन सब बातों से, उदासीन लोग भी तो हैं संसार मे?

मुझे ये नही समझ मे आता कि महिला आयोग का गठन क्यों किया गया? क्या इससे अब महिलाओं पर अत्याचार होना बंद हो गया? सुरक्षित हो गईं हर महिला इस देश की? ललित भी थोड़ा तार्किक होते हुए बोला।

ऐसा लग रहा है कि इस देश की नारी पूरे मन से समानता चाहती ही नही है, अगर सच मे चाहती तो पहले अपने आपको उन्हें पुरुष समान ही बनाना पड़ेगा। और ये कोई नारी नही चाहती, क्योंकि वे अपनी आइडेंटिटी बनाये भी रखना चाहती है। बस उन्हें समान अधिकार चाहिए और साथ मे उनका विशेष प्रोटेक्शन भी। तो आज की नारी और पहले की नारी में अंतर क्या रह गया?

मैं समझी नही? बोलना क्या चाहते हो? निधि ने विस्मयतापूर्वक ललित से पूछा।

ललित ने कहा- अरे तुमलोग जैसी हो वैसी ही बनी रहनी चाहती हो, जब कुछ होता है तो केवल हाय तौबा मचाती हो। और फिर बात आई गई हो जाती है, इतिहास बन जाती है।

निधि दांत पिसती हुए बोली- इस देश मे कहीं भी लड़कियां सुरक्षित नहीं हैं, हरजगह उनका शोषण होता है।
क्या इसके लिए लड़कियां जिम्मेदार हैं?

हाल की ही एक घटना को ले लो। मेरी साथी बता रही थी कि उसके होस्टल के सामने बाहर के लड़के आकर गंदी हरकत करते हैं, गंदे इशारे ही नही गंदे काम भी करते हैं। शाम को रात को सड़क पे अकेले चलना तक दूभर हो गया है। बड़े शहरों में तो घर 5,6 बजे अकेले जाने में रूह काँपती है, कब कोई बाइक यहां तक सायकिल वाले का हाथ शरीर के नीचे या ऊपर कुछ टटोल कर चला जाये....

क्या करें लड़कियां? सिवाय घुट घुट के जीने के अलावा? घर पे बताएंगी नहीं, लड़के दोस्त को बता नही सकती, सिर्फ अपने सहेलियों से दुख को बांट लेतीं है। लोगों की नजरें तो ऐसे पड़ती है हमारे शरीर पे जैसे उसने आंखों में एक्स-रे लगा कर रखा हो, स्कैन करतीं हैं शरीर के हर अंगों को ठहर ठहर कर।

निधि बात को जारी रखते हुए बोली- कुछ दिन पहले की ही घटना को ले लो एक सांस्कृतिक कार्यक्रम हो रहा था हमारे विश्वविद्यालय में। अभी कार्यक्रम खत्म नहीं हुआ कि उद्घोषणा होता है- सभी लड़कियां होस्टल चलीं जाएं नही तो प्रोग्राम बन्द कर दिया जाएगा।

क्यों? अचानक से क्या हो गया? सिर्फ लड़कियां ही क्यों? ललित ने पूछा।

अरे कुछ लड़के आये दूसरे होस्टल के, आते ही उन्होंने आतंक मचा दिया। हद तो तब हो गयी जब उन्होंने अपनी पसंद के लड़कियों को चुनना शुरू कर दिया फिर उनके साथ जबरदस्ती, एतराज जताने पे उठा ले जाने की धमकी। उनके जो मन आ रहा था वो किये जा रहे थे। अफरातफरी मच गई। लड़कियां अपनी अस्मत बचाने इधर उधर भाग रही थी। छी, छी, छी, कितना घिनौना दृश्य था वह। हमारे यहां के स्टूडेंट, गार्ड्स सब मूकदर्शक बने रहे, इन लोगों को तो चूड़ियां पहन लेनी चाहिए। उनके सामने ये सब हो रहा था और छात्र और गॉर्ड सब तमाशा देख रहे थे। कुछ देर बाद आर्गेनाइजर ने प्रोग्राम बंद करने व लड़कियों को होस्टल जाने का उद्द्घोषणा किया।

ललित को निधि के ऊपर तरस और गुस्सा आ रहा था पर संयमित रह मुस्कराते, उसके गुस्से को और बढ़ाते हुए बोला- वाह वाह वाह, बहुत ही अच्छा दृश्य होगा वहां तो?

सब लोग ललित के तरफ विस्मय से देखने लगे।

कितनी घटिया सोच है तुम्हारी? तुम्हारे जैसे लोग ही लड़कियों के लिए घटिया कमेंट करते हैं। निधि गुस्से से लाल हो चुकी थी, बोली-

अगर एक लड़की के साथ रेप हुआ तो हमारे देश के प्रबुद्ध व बुद्धिजीवी तुम्हारे जैसे लोग ही बोलते हैं-
"उन्हें जीन्स, छोटे कपड़े नही पहनने चाहिए।"
"रात को क्या जरूरत थी घर से निकलने की?"
"उन्हें भी मजा आया होगा। वगैरह वगैरह।"

कोई ओपन फंक्शन में अगर लड़की गयी और उनके साथ कुछ गलत होता है तो दोष लड़कियों को ही दिया जाता है की जब जानती थी कि जहां भीड़ होगी, वहां उपद्रवी तत्वों के होने की भी संभावना होगी , तो क्यों गयी वहां?

अरे कहाँ कहाँ छुपाये, कहाँ कहाँ बचाये और किन किन से बचाये लड़किया अपने आप को? सड़क पे, बस स्टॉप, रेलवे स्टेशन, आफिस, स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी यहां तक घर पर। निधि ने अपने उमड़ते आसुओं को वहीं पे समेटते हुए कहा- कहाँ सेफ हैं लड़कियां? बताओ?

ललित शांत धैर्यपूर्वक सुन रहा था।

भरे गले से निधि बोलती रही- कुछ भी हो हमलोग के साथ, तो हमहिं लोगों को हिदायत मिलनी शुरू हो जाती है। जैसे सब गलती तो लड़कियों की ही होती है, लड़कों की तो कुछ भी नही होती गलती। हमारे पहने छोटे कपड़े और हमें अकेला देख उन्हें तो अधिकार मिल जाता है ना, हमारे साथ कुछ भी करने का? लेकिन वे तो दूध के धुले हैं तुम्हारी नजरों में ना? अरे सुधारने की जरूरत तो पुरुषों को अपनी मानसिकता को है। जब तक उनकी मानसिकता नही सुधरेगी, लड़कियां ऐसे ही वस्तु समझी जातीं रहेंगीं और जुल्म सहने को विवश होती रहेंगीं।

और तुम्हारी मानसिकता भी ऐसी ही होगी ऐसा मैने सोचा न था?

ललित पे इन बातों का कुछ असर तो न पड़ा पर उसने अपनी बातें काफी गंभीरतापूर्वक रखा।

लड़कियाँ और महिलाएं अपने दुखों का कारण खुद हैं।
मुझे तो तुमलोगों पे तरस कम और गुस्सा ज्यादा आता है। तुमलोगों का कंसेप्ट ही समझ नही आता है यार! पहले यह निर्णय लो कि तुम्हें चाहिए क्या- समानता या सुरक्षा?

सुरक्षा तो सब को चाहिए यहां तक कि बच्चे बूढ़े और जवान को भी! चाहे वो पुरुष हो या महिला।

कब तक सुरक्षा का भीख मांगती रहोगी? कब तक अपने आप को अबला समझती रहोगी? कब तक तुमलोगों को पुरुष रूपी बैसाखी की जरूरत पड़ती रहेगी? आखिर कब तक?

निधि चुप रही।

अरे यार, ये बात तुमलोगों को समझ क्यों नही आती की जब तक तुमलोग सुरक्षा मांगती रहोगी, पुरुषों को अपना बॉडी गॉर्ड मानती रहोगी और पुरुषों को अपनी मानसिकता सुधारने की दुहाई देती रहोगी तब तक तुम एक वस्तु ही समझी जाती रहोगी। शोषण होता रहेगा तुम्हारा.....

तुम्हें क्या लगता है- पुरुष सेफ हैं? कुछ मानव रूपी भेड़िये बच्चे को भी अपनी वासना का शिकार बनाते आये हैं और बना रहे हैं। छोटे बच्चों के साथ उनके रिश्तेदार तक अनर्थ करते हैं। और ये सब इसलिए होता क्योंकि वे कमजोर होते हैं उन वहशी दरिंदों के मुकाबले।

पर एक लड़की, एक महिला, जो घर से बाहर कदम रखती है पढ़ाई करने के लिए, रोटी कमाने के लिए, क्या वो उन बच्चों जितना कमजोर होती है? अरे कमजोर तो तुम लोग अपने दिमाग से बनी हुई हो। होली में जबरदस्ती कोई अगर तुम्हें रंग लगाना चाहे, तो उसके पसीने छुड़ा देती हो तुम लोग.... उस समय इतनी शक्ति कहाँ से अवतरित हो जाती है तुम्हारे शरीर मे?

अपने शक्ति को पहचानो देवी, और अपने अंदर के काली को सोने मत दो।

एक लड़के के कम से कम 4 से 5 दोस्त तो जरूर ही बन जाते हैं अगर वो कहीं भी एक हफ्ते के लिए भी जाता है तो। तुमलोगों के भी तो बनते होंगें दोस्त? और अगर नही बनते तो बनाती क्यों नही हो जो वक्त पर तुम्हारी मदद कर सके? जैसे लड़के लोग अपनी समस्या का निवारण खुद करना सीख गए हैं तुम लोग क्यों नही सीखती?

तुमने ही बताया- गर्ल्स हॉस्टल वाली बात मुझे। कितने लोग थे होस्टल के बाहर जो गंदी हरकतें कर रहे थे? 10 से ज्यादा तो नही होंगे न? और तुम लोग? कम से कम 400 लड़कियां तो होंगीं उस समय होस्टल में? चलो कम ही होंगी उस वक्त पर 50 तो होंगी ही ? सबलोग लट्ठ, बेलन या रॉड लेकर सुताई मरमत कर दी होती उन शोहदों का उस दिन, तो शायद वे लोग दुबारा गंदी हरकत करने की हिम्मत न करते ?

लेकिन तुमलोगों को तो अबला बने रहने और लोगों की संवेदना, सहानुभूति पाने की आदत जो पड़ी है। पड़ी है तो गिड़गिड़ाते रहो और अपनी रक्षा का भीख भक्षकों से मांगते रहो।

ललित का स्वर थोड़ा ऊंचा हो उठा- उस दिन सांस्कृतिक कार्यक्रम में क्या चार पांच ही लड़कियां थी? अगर स्टूडेंट्स और गार्ड्स बूत बने थे तो वहां मौजूद लड़कियां क्यों सन्न सी रह गईं? आखिर वे लोग मदद करने क्यों नही आयीं? आ सकतीं थी न? या उनकी भी सारी शक्ति बाली ने निचोड़ लिया था?

बात करती हो गली मोहल्लों, बस स्टॉप, स्टेशन, घर और ऑफीस की, तो तुम्हे किसने मना किया है पर्स में चाकू, पीपर स्प्रे रखने को? नाखून का क्या तुम लोग सिर्फ सजावट ही करती रहोगी? इस्तेमाल क्यों नही करती हो जब कोई बस में या कहीं भी तुमसे जबरदस्ती करने की कोशिश करता है तो? चलो बाइक सवार को कुछ नही कर सकते, सायकिल का कैरियर पकड़ कर गिरा तो सकती हो? अपने ऊपर हुए अचानक हमले से जब तक वो उबरे, उसपर लात घूसों की बरसात क्यों नही करती लड़कियां? तुमलोगों को भी पता है कि पुरुष के किस अंग पे वार करोगी तो उसे छट्ठी का दूध याद आ सकता है, तो करती क्यों नहीं हो -हे ममता की देवी? ललित ने दांत पिसते हुए कहा।

पर तुमलोगों को तो किसी न किसी पर अपना भड़ास निकाल कर, किसी न किसी को दोषी ठहरा कर, अपने कर्तव्य से पल्ला झाड़ लेना है।

कब तक डरती रहोगी की कोई तेजाब फेंक कर तुम्हारा शरीर जला जाएगा? अगर तुम अपने अंदर के काली को जगा लो, तब तो डरेंगे वो लोग? उनके अंदर भी यही भय होना चाहिए कि कोई उनके शरीर पर भी तेजाब फेंक सकता है।

अरे भाई, समानता की लड़ाई तुम्हारी है तो लड़ना तो तुम्हे ही पड़ेगा न? तुमलोग आगे तो बढ़ो, सारा सभ्य समाज, देश का हर जिम्मेदार नागरिक तुम्हारे पीछे होगा। सिर्फ सोशल मीडिया पर लिखना और फालतू पोस्ट शेयर करना नारीवाद नही होता और न ही इससे महिलाओं का सशक्तिकरण हो पायेगा। इस समस्या का समाधान सोशल मीडिया से नही असलियत में वर्क करने से होगा।

इसलिए हे देवी, अपनी क्षमताओं पर विश्वास रखो, अपनी शक्ति को पहचानों वो दिन दूर नहीं जब तुम्हें अपनी सुरक्षा , अधिकार और समानता की भीख मांगने की जरूरत ही नही होगी।

ललित एक ही सांस में बोल गया। कमरे में सन्नाटा था। क्लास का टाइम हुआ और सब लोग अपना लेक्चर लेने को निकल पड़े।

असलियत में ललित के बोले शब्दों में कितनी सच्चाई है, किसे फुरसत है परखने की?

आपका जबाब अपेक्षित है।

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