संगीता दीदी अब आपके यहाँ आये हैं तो आपकी ननद के बच्चों को भी मिल कर ही जायेंगे।आप उनको संदेश भिजवा दो कि हम लोग आए हैं छुट्टियों में “ माया बहुत खुश थी कि चलो यहाँ आने के बहाने उन प्यारे से बच्चों से मिलना भी जाएगा जो पिछले साल संगीता दीदी संग उनके यहाँ घूमने आए थे ओर मामी मामी करते थक नहीं रहे थे। आखिर माया ने भी तो उनको वही प्यार और दुलार दिया था जो संगीता दीदी के बच्चों को। कोई भेदभाव नहीं किया था। जाते हुए उन बच्चों के हाथ में शगुन भी रखा कि पहली बार आये हैं बच्चे। माया की बेटी भी बार बार बुआ को बोल रही थी,” बुआ दीदी ओर भैया कब आएंगे मुझ से मिलने, मैं भी उनके घर जाऊँगी न, बड़ा मजा आएगा।” पर ये क्या देखते देखते माया की वापिसी का दिन भी आ गया।पर कोई मिलने तो क्या किसी का फ़ोन तक भी नहीं आया।शाम को संगीता की ननद आई वो भी बस अपने बेटे को लेकर। बेटा ऐसे मिला जैसे कि जानता पहचानता ही न हो। कुछ समय बाद जब माया सभी को मिल कर अपनी बेटी संग बाहर निकलने लगी तो संगीता की ननद ने उसकी बेटी के हाथ कुछ रुपये थमा दिए शगुन के नाम पर। माया को बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा जी तो किया उसका कि बोल दे “ ये आप क्या कर रही हैं अगर रुपये पैसों का लेन देन इतना ज़रूरी है तो क्या प्यार मोह्हबत का नहीं । हमें अपने घर बुलाते, रहने के लिए न सही पर चाय पर ही सही। मेरी बेटी कोई भूखी नहीं आपके इन पैसों की। पर वो अपनी ननद संगीता का लिहाज कर चुप रह गई कि उसके ससुराल का मामला है। ऊपर से संगीता भी उसकी बेटी को कहने लगी रख ले बच्चे ये तेरे लिए ही है शगुन। अपने ससुराल वालों के आगे संगीता ने अपनी भाभी माया की परेशानी और भावनाओं को नज़रअंदाज़ कर दिया।


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