एसिडिक लव

सुबह के 10:50, वो कैंटीन के कोने में खड़ी थी और आज मैं फिर पिछले छः महीनों में उसके सामने तैंतीसवीं बार अपना प्यार लेकर खड़ा था।

"मैं कितनी बार मना कर चुकी हूँ, समझते क्यों नहीं।"

"एक बार झूठ ही बोल दो।"

"कुछ झूठ-सच नहीं, बोल दिया ना एक बार", ये कहते हुए, वो उसके सामने वाली चेयर पर जाकर बैठ गई।

हाँ। उसी के सामने, जिसके साथ वो पिछले 7-8 महीनों से रिलेशनशिप में हैं।

"तुम अपने घर पर हमारे बारे में कब बात करोगे" उसने पूछा।

"मैं तुमसे शादी नहीं कर रहा", उसका जवाब था।

"तुमने मुझे प्रपोज किया, तब तो ये ही बोला था और जो वादे किए तुमने, जो अपने बीच हुआ, वो सब?"

"सब पुरानी बातें हैं, भूल जाओ। और जो तुम्हारे और मेरे बीच हुआ, वो रोज मेरे और किसी लड़की के बीच में होता हैं, अब निकलो यहाँ से", वो चिल्लाया।

"कल तक या तो तुम्हारे घर पर अपने बारे में बात करो या फिर मैं तुम पर पुलिस केस करूँगी", वो बोल पड़ी।

"ऐसा हैं तो रूको, कल ही तुम्हारा इंतजाम करता हूँ", वो लाल आँखें करते हुए बोला।

अगले दिन, रोज की तरह मैं उसके पास में खड़ा उसे निहार रहा था, और वो अपनी सहेलियों से हँस-हँस कर बातें कर रही थी। तभी वो दनदनाता हुआ आया और हाथ में पकड़ी हुईं काँच की बोतल उसकी तरफ हवा में घूमा दी।

मेरे दिल ने एक अनहोनी से आशंकित होकर, मेरे शरीर को उस लहराती बोतल और उसके बीच ढकेल दिया और अगले ही पल मैं चीख उठा।

आँखें खुली तो अस्पताल में था। दाहिने तरफ गाल, गर्दन और कंधे पर जलने का भयंकर दर्द हो रहा था। ध्यान से देखा तो पाया, दाहिनी आँख से दिखाई भी नहीं दे रहा था। बगल में मम्मी खड़ी आँसू बहा रही थी, काॅलेज के कुछ दोस्त मेरे बिस्तर को घेरे हुए थे। कुछ की आँखों में मेरे लिए सम्मान और कुछ की में दया भाव थे।पर वो कहीं दिखाई नहीं दे रही थी।

हर दिन मम्मी-पापा मेरी तरफ देख कर आँखों में आँसू ले आते, पर बोलते कुछ नहीं। बीस दिन बाद अस्पताल से छुट्टी मिली। हम घर जाने की तैयारी कर रहे थे और कमरा एक बार फिर दोस्तों से भरा था।

बिस्तर से नीचे उतर ही रहा था कि वो भीड़ को चीरते हुए आ पहुँची और मेरे सामने घुटने पर बैठकर, मुझे गुलाब के फूल के साथ प्रपोज कर रही थी।

"एहसान कर रही हो मुझ पर?"

"एहसान तो तुमने मुझ पर किया हैं, पता नहीं कैसे चुका पाऊंगी", उसके ये शब्द थे।

"गलत सोच रही हो, ये तो मेरा प्यार था तुम्हारे लिए।"

"पर कोई इतना प्यार कैसे कर सकता है, किस से सीखा है तुमने इतना प्यार करना", वो खड़े होते हुए बोली।

"मेरी तरह कर सकता हैं क्योंकि प्यार करना मैंने अपनी माँ से सीखा है।"

"प्लीज, हाँ बोल दो। एक मौका मुझे भी दो", वो मेरा हाथ अपने हाथों में लेते हुए बोली।

"मौके तो बहुत मिल चुके हैं तुम्हें। पर, इस मौके में तुम प्यार नहीं एहसान करोगी मुझ पर।" मैंने बिस्तर से नीचे उतरते हुए बोला।

"प्लीज, तुम्हें पता हैं ना। अपनी ये हालत तुमने मेरे लिए की हैं।"

"हाँ और मैं जी लूँगा अपने इस जले हुए चेहरे के साथ। पर तुम्हारे इस प्रेमरूपी एहसान के साथ नहीं जी पाऊंगा।"

ये कहते हुए मैं दरवाजे की तरफ चल पड़ा। उसे अपने उस प्रेम से आजाद करते हुए, जिसे वो एहसान मान रही थी।

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