यादों का दायरा

वो बचपन जब लोग अपने जीवन में खेलकूद को महत्व देते हैं | जिस बचपन की एक अलग ही दुनिया होती है| जिस दौर में दुनिया का हर व्यक्ति लौटना चाहता है| उस बाली सी उम्र में उसकी दुनिया में वह शामिल हो गई थी | उसकी उम्र 8 वर्ष की थी| जब वह उसका हो गया | ऐसा नहीं था कि वह प्रेम में डूब गया था, पर यह भी सच था प्रेम का अनदेखा बीज पड़ चुका था | बेखबर बीज यह तो सच था वह उसका हो चुका था, इस कदर कि बिना उसे याद किये उसके दिन की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी| वैसे उसे ज्यादा यादों में डूबने की जरूरत नहीं होती थी| क्योंकि वह हर वक्त उसके साथ होती थी | खेल के मैदान में, घर में, स्कूल में, बाजर में शहर की सड़कों में पर कहते हैं ना ज़िन्दगी अगर सरलता से गुजर जाये तो शायद ज़िन्दगी में कोई मजा ही न रहे | और इस जीवन पर इतनी कथा भी न लिखी जा सकें| तो उनके जीवन में भी एक नया मोड़ आना था और आया भी |यह नया मोड़ था उम्र का दौर | वे अपने बालपन की 8 वर्ष की आयु से 15 वर्ष की नाजुक देहलीज पर आ चुके थे, जिस आयु को कच्ची मिट्टी सा कहा जाता है | जिस आकार में मोडो़ मुड़ जाती है| उम्र के इस दौर में उनका साथ कम हुआ अब वह उसका साथ सिर्फ स्कूल और घर में ही दे सकती थी | खेल के मैदान में साथ देना अब सम्भव नहीं था, क्योंकि लोगों ने जता दिया था की तुम एक लड़की हो और लड़कों के साथ उनके खेल ना खेला करो| उस बेचारे से भी कह दिया गया तुम लड़कियों के साथ न खेला करो शोभा नहीं देता तुम्हें| उसकी यादों का दायरा बढ़ गया था| जिसे याद करने की उसे जरूरत नहीं थी आज उसे वह खेल के मैदान में याद करता था| यादों का दायरा धीरे धीरे इसी तरह बढ़ते जा रहा था, क्योंकि उनकी आयु बढ़ रही थी | उन्हें बार- बार यह याद दिलाया जाता था कि तुम दोनों का साथ अब तक सब को नागवार नहीं गुजरा पर अब सब कि नजरों में तुम पुरूष हो और वह औरत | जैसे जैसे आयु बढ़ेगी यह औरत और मर्द का भेद तुम्हारे रिश्ते पर हावी हो जाएगा | तुम्हारी भावनाओं से ऊपर कर दिया जायेगा इसे| वह भी सिर्फ इसलिए की कहीं इस रिश्ते में प्रेम का बीज न पनप जाए | और अगर वह पनप गया तो लोगों के विरोध में एक नयी आवाज बुलंद हो जायेगी जिसे दबाना प्रेम को बढ़ावा देने से ऊपर समझा जायेगा| हर वर्ष उनकी आयु में एक आँकड़ा बढ़ता गया और उस आँकड़े के साथ ही उनकी यादों का दायरा बढ़ता चला गया | पहले खेल का मैदान, फिर स्कूल साथ आने जाने पर लोग क्या कहेंगे, कुछ दिनों बाद तो कॉलेज ही र्गलस करा दिया कि जमाना खराब है कोई ऊँच नीच हो गयी तो| उस ऊँच नीच में लोग उसकी मासूम मुहब्बत को बिसार बैठे, जिसे वे खुद भी पहचान नहीं पा रहे थे | फिर एक दिन तो शहर ही छोड़ना पड़ा तरक्की की सीढ़ियाँ जो चढ़नी थी | यादों का दायरा विशाल हो चुका था | ये शायद उनकी ही जिद्द व प्रेम था कि लोगों की लाख तरकीब के बाद भी वे एकदूजे से जुदा न होते थे | इस रिश्ते पर एक दया उनके घर वालों ने जरूर कर दी थी की उन्हें मिलने से नहीं रोका | शायद वह भी इस लिए की वो खुद अपने प्रेम से अनजान थे| जिस वजह से उनका रिश्ता इमली जैसा था | वे एक दूसरे के लिये उपयुक्त जीवनसाथी की चाहत रखते थे| जिसके चलते घर वालों को ऐतराज नहीं था| अब यादों का दायरा बढ़ने नहीं वाला था बल्कि पूरा रिश्ता ही यादों का होने वाला था| उसकी चाहत की सगाई हो गई वह सगाई में अपनी व्यस्तता के चलते जा नहीं पाया था| पर उन्हें क्या पता था अब जो उन्हें महशूश होने वाला है वही उन दोनों का वजूद है| सगाई से शादी तक वह अपनी चाहत से दूर होता गया, जब भी वह उसके करीब जाने की कोशिश करता उसे खुद से बहुत दूर पाता| जब भी उसका हाथ पकड़ने हाथ बढ़ाता उसके हाथों में किसी और का हाथ नजर आता| उसकी चाहत का भी हाल कुछ ऐसा ही था | वह साथ तो किसी और के होती थी पर पास वही होता था| हाथ किसी और का थामा था पर एहसास उसी का होता था | अब तक जिस अनकहे रिश्ते को वे निभा रहे थे अब वे उसका नाम समझ चुके थे | पर देर हो चुकी थी | वह उसकी नजरों के सामने सारी दुनिया के अनुसार किसी और की हो चुकी थी परन्तु यह तो उसका दिल भी जानता था | उसके दूर होने से वह किसी और की नहीं हो सकती | क्योंकि वह तो बचपन में ही उसका हो चुका था | हाँ उनका प्रेम अवश्य ही था एक रिश्ता अनकहा सा.........

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