याद न जाए 1

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यादों के गलियारों में जब मनुष्य घूमनें निकलता है तो सबसे प्रथम व प्यारी यादें माँ से जुड़ी यादें होती हैं , ये या तो वे जानते हैं , जिनके माँ होती है , या वो जानते हैं जिनके माँ नहीं होती । मेरे पास दोनों ही प्रकार के अनुभव हैं । मेरे पिताजी की माँ , उनके होश सँभालने से पहले ही स्वर्ग सिधार गईं थीं । मैं उनसे अधिक भाग्यशाली था , मुझे माँ के साथ एक उम्र जीनें को मिली ।

पिताजी सुनाते थे , कि जब माँ ( हमारी दादी ) की मृत्यु हुई तो वे छः वर्ष की आयु में थे । वो अपनें साथियों सँग गली में खेल रहे थे , जब कोई उन्हें बाजू से पकड़ कर घर ले गया , यह बोलते हुए कि तेरी माँ मर गई है , और तू यहाँ खेल रहा है ? चल , घर चल । और पिताजी के शब्दों में अगर कहूँ , तो वो बोलते थे , मुझे क्या पता था कि मरना क्या होता है ? मेरे लिए तो वो भी खेल ही था , वो तो घर जा कर जब सबको रोते देखा तो मैं भी रोनें लगा । पिताजी बहुत अच्छे चित्रकार थे , उन्हें सारी उम्र दुःख रहा कि अगर वो थोड़ा भी बड़े होते और माँ की सूरत मानस पटल पर होती , तो माँ का एक चित्र अवश्य उकेरते । हमारी दादी का एक भी चित्र नहीं है , जबकि दादा के पास एक कैमरा भी हुआ करता था । ये उस ज़मानें की बात है जब मर्द का औरत के साथ , सरेआम बातचीत करना , बदतमीज़ी में शुमार था ।

एक मैं था जिसे माँ नसीब थी और मैं नसीब वाला था । मैंनें भी बेहोशी में अर्थात् होश आनें से पहले , माँ के स्तन टटोले होंगे , उन्हें मुँह में रखकर दूध पिया होगा , माँ का स्नेह पाया होगा , माँ की गर्माहट अनुभव की होगी , लेकिन याद है अगर तो माँ का पहला चाँटा । मनुष्य केवल कड़वी यादें क्यों सहेजता है ? समझ नहीं आता ।

ये चाँटा पड़ा क्यों था ?

क्रमशः .......

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