मसान-भैरवी

वह नीचे, मसान में, उतर रहा था | यह बनारस के हरिश्चंद्र घाट का जीवंत मसान था जहाँ किसी ज़माने में सत्य की संभवतः सबसे कठिन परीक्षा राजा हरिश्चंद्र ने दी थी- जीवन के चंचल सत्य की परीक्षा, मृत्यु के स्थिर, अंतिम, सत्य के समक्ष !

उसने नजर घुमाई- यहाँ-वहां बिखरी राख और लकड़ियाँ, सुस्ताते कुत्ते, राजा हरिश्चंद्र का अटल प्राचीन मंदिर, ठंडी पड़ी धूनी के पास चिलम बनाता औघड़, ताश खेलते मछुआरे, चौकन्ने कुछ विदेशी...यह वही जगह है जहाँ की धधकती आग सदियों से प्राणहीन देहों की आहुति लेती आ रही है, महाकाल की अग्नि-भूमि, जहाँ एक न एक दिन सबको आना है | वो शरीर जिसे जीवन भर धोने, पोछने, सजाने का हम जतन करते रहते है, उसे यहीं किसी दिन, लकड़ियों से बनी एक बेढंगी चिता पर लेट, माचिस की एक तीली मात्र से जल जाना है | इससे डर कर कहीं भी भागा नहीं जा सकता | पृथ्वी में, आकाश में, पाताल में, कहीं भी कोई स्थान नहीं, जहाँ छिपकर इससे बचा जा सकता हो...इससे बची रह गईं हैं तो केवल गंगा, जो सीढ़ियों के नीचे थीं- म्लान और शांत, साक्षी भाव से बहतीं, मनुष्य की अहंता और ममता को निर्विकार भाव से देखती, सदा से, सत्य-असत्य, साधु-शैतान, दोनों को धोती, पवित्र करती |

उसने राजा हरिश्चंद्र की कहानी को कभी बेमिसाल समझा था, पर अब सत्य का प्रश्न उसके सामने बेमानी था | आज उसके लिए यह बात ज्यादा जरूरी थी कि इस घाट पर गंगा काफी गहरी हैं | इसलिए यह जगह चुनने लायक थी | वह जानता था कि रात आठ नौ बजे तक यह घाट सुनसान हो जाता है | बस कुछ अघोरी बचे रह जाते हैं, पर वे भी ढलती शाम के साथ गांजा के नशे में डूब इस दुनियावी चेतना से फ़ना हो जाते हैं | उसने सोचा था कि यही समय माकूल होगा जब एक तेज छलांग लगा कर तीर की तरह गंगा में वह समा जाएगा और मृत्यु की तलैया पार कर चिर शांति के अनंत समुन्दर में उतर जाएगा |

पिछले कुछ दिनों के जीवन की कड़वी स्मृतियाँ उसके जेहन में तूफ़ान की तरह थीं | यूं उसे अकेला, तिरष्कृत छोड़कर उसका दिल्ली चले जाना...फिर परस्पर शक, अविश्वास, धोखे और तूं-तूं, मैं-मैं का एक लम्बा दौर...बनारस का उसका वह कमरा...कमरे में वे बेचैन करवटें..अनिद्रा...बीमारी..दवाओं का वह विशाल जखीरा..तमाम डाक्टरों की पर्चिया..ज्योतिषी के नुस्ख़े..दोस्तों की सलाहें...सब बेमानी...कहीं भीतर धंसे एक चेहरे के आगे सब बेकार...एक चाहना के सिवा दुनिया की सारी चाहनायें बे-अर्थ...बे-स्वाद...

उसने समझ लिया था कि असफल प्रेम की पीड़ा से मुक्ति के रास्ते अब उसके इस जीवन में नहीं बचे | वह चेहरा अब उसका हो नहीं सकता, और वो उसे अपने दिमाग से हटा नहीं सकता | उसको साथ ले जिस तरह का जीवन वह बनाना, जीना चाहता था वह अब संभव नहीं | उसकी स्मृति में निरंतर धधकते इस कपाल की चिकित्सा अब यहाँ हो ही नहीं सकती | इसके लिए जरूरी है इस जिन्दगी को सायास छोड़ देना | शायद मृत्यु, और उसके पार जरूर कुछ ऐसा हो जिसमें चिर शांति का जीवन हो | धर्म और आध्यात्म की किताबों में उसने ऐसा पढ़ा था कि जिन्दगी के बाहर, मृत्यु के उस पार, सत्य, चित और आनंद का एक स्थिर लोक है | जीवन के इतने सूक्ष्म ज्ञाता- ऋषि, मुनि, सन्यासी, अंतर-दृष्टा- बिना यह सब देखे, जाने, अनुभव किये, आखिर उन चमकती किताबों में ऐसा क्यों लिख देगें ? जरूर वह जगह उन्होंने खोज ली होगी और वहां पँहुच गए होंगें | अतः मृत्यु..आत्मघात- अब इस मुक्ति का शायद यही अंतिम इलाज है |

इसलिए आज वह दृढ़ निश्चय करके चला था | उसका मन विकल्प-हीन था और शरीर काबू में था | आत्महत्त्या के अतिरिक्त कोई दूसरा विचार उसके मन में न था | शाम होते-होते वह यहाँ पहुँच गया और अब घाट किनारे की एक सीढ़ी पर बैठ आते जाते लोगों को देख रहा था | घाट के निर्जन होने का इंतजार कर रहा था |

खुद के द्वारा चुनी हुई, खुद की ही मौत को किसी शिकारी कुत्ते की तरह वह झपट लेना चाहता था |

यहाँ, अनाशक्त भाव में बैठा, वह बहती गंगा की मद्धिम लय के साथ बह रहा था कि सहसा एक जोड़ा उसके सामने से गुजरा | उसका ध्यान भंग हुआ | परस्पर गुंथे उन दोनों को देखने से वह स्वयं को रोक न सका | वह अपलक उन्हें जाते तब तब देखता रहा जब तक वे नजरों से ओझल नहीं हो गए | उसे याद हो आया कि कितनी ही बार इस घाट की सीढ़ियों पर उसके साथ वह घंटों बैठा रहा है | जलती चिता को देख हर बार वह उसका हाथ कस कर पकड़ लेती | कपाल क्रिया के वक्त उसका सिर उसके कन्धों पर लटक जाता | वह गुस्से में कहती- ‘कितनी फूहड़ जगह है | तुम यहाँ मुझे क्यों बार-बार ले आते हो ?’ और वह कहता- ‘एकमात्र यही प्रेम की सुन्दरतम जगह है | मृत्यु-बोध से भरा प्रेम ही स्थाई है डियर |’ वह उसकी ऐसी बातों को सुन आँखों में हँसती |

अतीत की इन सुनहरी स्मृतियोँ में वह काफी देर मग्न रहा | उसे कहीं कुछ असंगत, छिछला नहीं दिखा | अब भी एक बहुत धुंधली रौशनी कहीं दूर उसे दिखाई दे रही थी | यह देख आवेग की एक अनिवार हलचल ने उसे एकाएक फिर बेचैन कर दिया | उसके हाथ स्वतः जेब में चले गए | उसने मोबाइल निकाला और उससे बात करने का एक और प्रयास किया | घंटी बजी पर फोन उधर से काट दिया गया | उसने कई बार मिलाया पर हर बार फोन काट दिया गया | उदास हो उसने मोबाइल वापस जेब में रख दिया |

थोड़ी देर बाद उधर से फोन आया | लपककर उसने उठाया और व्यग्रता से बोला- ‘ज्योति’ |

उधर से बेहद तप्त आवाज आ रही थी- ‘भगवान् के लिए इस बेवकूफी से तुम अब बाहर निकलो | हमारे बीच जितना और जैसा रिश्ता नियत था वो बीत चुका है | मैं उस दौर से अब बाहर आ चुकी हूँ और दिल्ली के जीवन में खुश हूँ | मैं अब एक नये बने रिश्ते को लेकर काफी गंभीर हूँ | तुम प्लीज मुझे यहाँ की जिन्दगी में चैन से रहने दो | न तुम रतन सिंह हो और न ही मैं पद्मावती | इस भाव-भ्रम से बाहर निकलो डियर | जिन्दगी बहुत खूबसूरत है |’

‘ जिन्दगी तुम्हारे बिना कुछ भी नहीं है ज्योति | इस एक साल मैंने अन्दर-बाहर सब जगह ढूँढा पर कहीं कुछ नहीं मिला जहाँ मैं टिक सकूं | तुमसे विछोह असहनीय है मेरे लिए | एक अँधेरा सा छाता जा रहा है सामने | तुम मुझे बचा लो प्लीज ’- उसने अंतिम प्रयास किया |

उधर से आती आवाज निर्मम हो चुकी थी- ‘अब तुम नौटंकी कर रहे हो | जाओ और गंगा में डूब मरो | मुझे तुममें कोई दिलचस्पी नहीं |’

वह कुछ और कहना चाहता था पर मोबाइल की बैटरी ख़त्म हो चुकी थी और उसके स्क्रीन की रौशनी धीरे धीरे डूब गई | हताश उसने उसे वापस जेब में डाल लिया |

और अब सचमुच वह गंगा के बेहद करीब के घाट पर बैठा था |

घाट किनारे अपनी गुमटी नुमा कुटिया में बैठा एक औघड़ उसे काफी देर से देख रहा था | उसने गांजे का एक गहरा कश लिया और मंत्र बुदबुदाया- ‘ॐ वं वं वं क्रीं आकर्षिणी स्वाहा’ और फिर उँगलियों से माला पूरते जपना शुरू किया- ‘ मोहिनी मोहिनी मैं करा मोहिनी तेरा नाम.. राजा मोहा प्रजा मोहा मोहा शहर ग्राम...नैन नचाय कुटिल मुसकाय, फेंके मोह का फांसा...देखा मैंने महामोहिनी तेरे इल्म का तमाशा..’

उसके कलेजे में यह जाप तीर सा चुभा | उसने इधर-उधर देखा | घाट पर अभी चहल पहल थी | उसका दिल तेजी से धड़क रहा था | एक गहरे उचाट में उसकी आँखे स्वतः बंद होती गईं | कुछ देर बाद, उसकी उदास झपकी में सुराख़ बनाती कुछ आवाजों ने उसका ध्यान भंग किया | उसने आँख उठाई और सहसा उन्हें आते देखा |

वे ऊपर, सीढ़ियों से कुछ यूं उतर रहे थे जैसे गंगा शिव की जटाओं से उतर रही हों | उनमें से चार के कंधे पर एक लाश थी | उनमें से कुछ के हाथों में झाँझ, मँजीरा, ढोल, और हारमोनियम थे | उनमे से कुछ ठहाके लगा रहे थे | उनमें से कुछ गुनगुना रहे थे | उनमें से कुछ झूम रहे थे | वे किसी की अंत्येष्टि करने आ रहे थे|

‘राम नाम सत्य है’ कहते वे उसके बगल से गुजरे | उसने देखा कि उनमें मौत का खौफ, उसका दुःख, उतना नहीं दिख रहा था जितना की एक अलक्षित उत्साह..एक अजीब उमंग | उनके साथ कुछ शरारती लड़के भी थे जो राम नाम सत्य है की टेक में ‘मरा मुर्दा मस्त है’ बोल चुपके से खिलखिला भी रहे थे | वह विस्मित उन्हें गुजरता देखता रहा |

गंगा किनारे पहुँच उन्होंने लाश को उतारा और पसीने पोंछे | महाब्राह्मण ने जेब में हाथ डाल पन्नी निकाली, उसकी गाँठ खोल पान का एक बीड़ा उठाया, उसे मुंह में डाला, फिर ऊँगली से चूना चाटते व्रतोद्यापन के मन्त्र पढ़े-

‘अत्र पृथिव्यां जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तेकदेशे विष्णोराज्ञया...प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणो द्वितीयपरार्वे..गंगायां च जले मोक्षो वाराणस्यां जले स्थले...जले स्थले चान्तरिक्षे गंगासागरसंगमे...ओम तत्सत..इदन्मम...

मन्त्रों की छाँव तले गंगा के जल में शव को स्नान कराया गया | फिर उस शरीर पर घी, कस्तूरी, केसर, चन्दन, अगर, तगर, कपूर आदि का लेप लगने लगा | वह उदासीन उत्सुकता से उन्हें, यह सब, देख रहा था | उसका संकल्प,उसके मन के किसी कोने में बैठ मरियल कुत्ते सा कुनमुना रहा था |

शव-दाह के इस आयोजन को देख औघड़ की आँखें चमक उठीं थीं | उसने अपनी धूनी में आग को भड़का दिया था | वह अलख उत्साह में गुरु गोरखनाथ द्वारा गढ़े ‘जंजीरा’ के वाक्य वातावरण में विखेर रहा था- ‘ ऊँ गुरुजी मैं सरभंगी सबका संगी, दूध-माँस का इकरंगी, अमर में एक तमर दरसे, तमर में एक झाँई, झाँई में पड़झाँई, दर से वहाँ दर से मेरा साईं, मूल चक्र सरभंग का आसन, कुण सरभंग से न्यारा है, वहीं मेरा श्याम विराजे ब्रह्म तंत्र ते न्यारा है, औघड़ का चेला, फिरू अकेला, कभी न शीश नवाऊँगा, डा‍किणी, शाकिनी, भूलां, जांका, करस्यूं जूता, राजा, पकडूँ, डाकम करदूँ मुँह काला, नौ गज पाछा ढेलूँगा, कुँए पर चादर डालूँ, आसन घालूँ गहरा, मड़, मसाणा, धूणो धुकाऊँ नगर बुलाऊँ डेरा, ये सरभंग का देह, आप ही कर्ता, आप ही देह |’

इधर डोम ने तब तक चिता की लकड़ियां सजा दी थी | लाश को उस पर लिटा दिया गया | अग्नि से पहले ईशा की स्वर-लहरियां गूंजी- ’अग्ने नय सुपथा राये अस्मान विश्वानि देव वयुनानि विद्वान...युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमोक्तिम विधेम’... हे अग्नि, हमें नए सुन्दर रास्तों से ले चलो...पाप को चुनती हमारी इच्छाओं को नष्ट करो...

उनमें से एक उठा और पानी से भरे एक घड़े को कंधे पर रखा | शव की उसने तीन बार परिक्रमा की | फिर महाब्राह्मण ने एक पत्थर से घड़े को तोडा | टूटे घड़े से जल की धार बह निकली | अन्त्येष्टिकर्ता ने खड़े-खड़े घड़े को पीछे फेंक दिया |

'असौ स्वर्गाय लोकाय स्वाहा' के पाठ के साथ महाब्राह्मण ने चिता में अग्नि प्रज्वलित करने का निर्देश दिया | ठीक वहां जहाँ शव का सिर था, आग लगा दी गयी |

महाब्राह्मण हाथ जोड़ प्रार्थना करता रहा- ‘यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्... हे आत्मन ! तुमने मृत्यु के वक्त मन में जिस भाव, विचार या विषय का स्मरण किया हो तुम्हे वही योनि प्राप्त हो...

चिता की आग भभकने लगी | मुंह में बीड़ी दबाये एक व्यक्ति ने चिता पर जलते शव की चुटकी ली- ‘बैकुंठ में, तीनों देव से हमारा भी सलाम बोल देना गुरु, और हाँ, उहाँ भौकाल टाईट रखना |’ सभी ने ठहाका लगाया |

उसके होठों पर भी एक धुंधली मुस्कान थिरकी | आग और लकड़ी का मिलन होने लगा | धुएं ने अपनी दिशा खोजनी शुरू की | देखते ही देखते आग की लपटों ने मृतक को लीलना शुरू कर दिया था | सब गोला बना कर बैठ यह देख रहे थे | तभी शांति को भंग करते ढोलकिए ने थाप लगाया और आँखें तरेर कर हारमोनियम पकडे गवैये की ओर देखा | गवैये ने गला साफ़ किया, गंगा को हाथ जोड़े और फिर सजल आँखों जलती चिता को निहारते निर्गुन की तान छेड़ दी –‘उड़ जाएगा हंस अकेला..जग दर्शन का मेला...जैसे पात गिरे तरूवर से, मिलना बहुत दुहेला...ना जाने किधर गिरेगा, लगेया पवन का रेला, जब होवे उम्र पूरी,जब छुटेगा हुकुम हुजूरी...जम के दूत बड़े मजबूत,जम से पड़ा झमेला...दास कबीर हर के गुण गावे,वाह हर को परत पावे..गुरु की करनी गुरु जाएगा,चेले की करनी चेला...’

वह जैसे सोते से जागा हो | निर्गुन की आवारा धुनों ने मसान को अपने आगोश में ले लिया था | अपने अंतस में एक नयी ज्योति की उठान वह मह्शूश कर रहा था | ‘जग दर्शन का मेला’-उसने सोचा..कितना तो यथार्थ ! अक्सर ये निर्गुनिए उसे फ़ालतू के मनुष्य लगते थे | जिन्दगी के केंद्र से कितने दूर, निरर्थ, आध्यात्मिक, जिसका आधुनिक जीवन की मूल लय से कोई तालमेल नहीं | पर आज यह धुन उसे ऐसी लग रही है जैसे जीवन के भीतरी कमरे की कोई जरूरी प्राणवायु हो | वह सहज ही उसमें डूबता जा रहा था |

आते लोग कुछ देर यहाँ ठिठक कर खड़े होते | आश्चर्य से जलती चिता को देखते | कुछ विदेशी कैमरे से फोटो खींचते | कुछ चले जाते, तो कुछ सीढ़ियों पर बैठ रूक जाते |

सजल आँखों से चारों ओर उसने देखा | घाट, ताज़ी बिछी चाँदनी में जलता हुआ अनार हो रहा था | मौत की इस घाटी में प्राण-सत्ता का एक अद्भुत महाराग बज रहा था, जिसके सामने जीवन की रागिनियाँ श्री-हीन लग रही थीं | उसने आँख उठाई...उसने देखा, वहां से दिखाई देता शहर मसान-सा सुलगता नजर आ रहा था |

तभी किसी मोबाइल से गीत गूंजा- ‘जिन्दगी तो बेवफा है एक दिन ठुकराएगी / मौत महबूबा है अपने साथ लेकर जायेगी |’ इसे सुन गवैये का मिजाज अचानक पलटा और पुरानी टेक छोड़ वह इसकी ओर लपका.. ’मर के जीने की अदा दुनिया को जो सिखलाएगा..वो मुकद्दर का सिकंदर जानेमन कहलायेगा..’ यह देख घाट किनारे चाय की दूकान में लगे स्पीकर से निकलती हीमेश रेशमिया की चीख किसी ने और बढ़ा दी- ‘यारा झूम झूम.. बिना पिए ही झूम, या जाम उठाके झूम.. जोशो जूनून में झूम, या तो सुकून मैं झूम.. कोई झूमे न झूम.. तू यारा झूम झूम’ |

वह झूम रहा था | झूमते वह सोच और सोचते वह झूम रहा था...यह कैसी उलटबासी है ? एक धुन को सहसा छोड़ दूसरी धुन को तुरंत पकड़ लेने का यह कैसा सामर्थ्य है ? मौत के सन्नाटे में हो रहा यह कैसा जीवनोत्सव है ? उसे शिव के तांडव-नृत्य की याद हो आई- एक विराट होम, जिसमें जीवन और मृत्यु-दोनों की समिधा विसर्जित की जा रही हो | उसने सोचा कि इस अद्भुत, जादुई अनुभव के सामने कितनी तुच्छ है अपनी निजी अहंता और ममता, अपना प्रेम, अपनी घृणा !! मौत की वादी में जीवन के जब इतने रंग हैं तो साक्षात जीवन में क्यों नहीं ? क्या जीवन ऐसा ही मुड़ा, सिकुड़ा है या फिर उसने उसे ऐसा ही समझ लिया है ?

वह सोच की इन्ही उलझनों में फंसा था कि तभी जलती चिता से चट-चट की आवाज आई | एक आदमी उठा और उसने लगभग दो तिहाई जल चुके शव के सिर को एक बांस से कूँचना शुरू किया | किसी ने झिड़का उसे- ‘अरे धीरे धीरे महाराज, मरे हुए से काहे दुश्मनी निकाल रहे हैं |’ उसने जवाब दिया- ‘तुम जन्मजात बुड़बक हो, अरे खोपड़िया में ब्रह्मा जी का वास होता है, और ऊ बड़े जब्बर देवता हैं, बिना हचक के कुचले बाहर नहीं जायेगें’ | फिर उसने आधी बाल्टी घी लाश के सिर पर उड़ेल दिया, और बांस से पुनः कूंचते बोला- ‘जा गुरु ! इहाँ के झंझट से मुकती मिली, अब अगले जनम में कुकुर-बिलार-मनई न बनके देव-योनि पाने का जुगाड़ ब्रह्मा जी से करना |’

वहीं गुमसुम बैठे एक आदमी ने उसमें जोड़ा- ‘अरे, कैटरीनवा का पेट अभी खाली है | तंत्र-मन्त्र करा कर इनकी सीट वहीं रिजर्व करवा दीजिये |’

सबके साथ उन्मुक्त भाव से वह भी हँसा | पर उसकी आँखे कपाल-क्रिया पर टिकी हुई थीं |

थोड़ी देर बाद शव के कूंचे हुए सिर में आग का विष्फोट सा हुआ | आग का एक लपलपाता, सनसनाता गोला उसके भेजे से बाहर निकला | धुएं का एक गोल, चक्रवात सा उठा और धीरे-धीरे चारो ओर फैलने लगा | उसने अपनी आँखों में उस धुएं की जलन मह्शूश की | उनमें पानी आने लगा | वे बंद होने लगीं | उसने अपना सिर जलता मह्शूश किया | जैसे कुछ निकलना चाहता हो वहां से..जैसे कुछ निकल रहा हो..उसे तेज चक्कर सा आया..उसने दोनों हाथों से अपना सिर थाम लिया..कपाल के बीचों बीच कुछ चुभ रहा था..क्या वह कोई ब्रह्म है ? वह सोच रहा था...क्या प्रेम का ब्रह्म ?..ज्योति ?... उसे लगा उसका सिर दर्द से फट जाएगा |

और तभी कपाल-क्रिया करता व्यक्ति चिल्लाया- ‘पकड़िये पंडिज्जी, जल्दी पकड़िये, ब्रह्मा जी भाग रहे हैं |’

जवाब में महाब्राह्मण की सस्मित आवाज सुनाई दी- ‘अरे भाई, अब का करें ब्रह्मा जी, केवल एक-दो ठो तो मंदिर हैं उनके सारे देश में, बाकी सब तो विष्णु जी और महेश जी ने हड़प लिए हैं | आदमी की खोपड़िया में न रहें तो आखिर कहाँ रहें ?’

लोगों में एक बहुत जोर का ठहाका लगा | ठहाके की ध्वनि उसे ठीक वहां जहाँ कर लगी जहाँ उसे कुछ चुभ रहा था..दर्द को दबोचती एक हंसी का उठान उसने अपने अंतस में मह्शूश किया | उसे अपना सिर कुछ हल्का लगा |

इस बीच आँख बंद कर बेहद गंभीरता से महाब्राह्मण शांति के मन्त्र पढ़ रहा था-

‘ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम् पूर्णात् पूर्णमुदच्यते..पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते...ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः|’

ठहाकों, शांति के मन्त्रों के बीच उसने मह्शूश किया कि जैसे जीवित ही उसकी कपाल-क्रिया हो गयी हो | उसके सिर की चुभन काफूर हो चुकी थी | उसे लगा की उसके कपाल में बैठा कोई ब्रह्म भी जैसे निकल भागा हो ! उसने गहरी सांस ले हँसने की कोशिश की |

सहसा उसे कवि लीलाधर मंडलोई की कविता ‘कपाल-क्रिया’ याद हो आई- ‘मां की चिता/ बस चिटकती लकडियों की गूंज थी/ समय हो चला था/ पंडित ने कहा/ 'कपाल क्रिया'/ और थमा दिया एक बेडौल लम्‍बा मोटा बांस/ जाने क्‍या हुआ/ मैंने थाम लिया/ भाई का हाथ/ और बोला हठात्/ 'जरा हौले से'/ और बन्‍द कर लीं आंखें|’

उसने सोचा, इन कवियों के मानस में लोक मन की यह ‘विनोद-वृत्ति’ आखिर क्यों नहीं होती ?

ब्रह्म खोपड़ी से निकल कर भाग चुके थे | आत्मा का सांसारिक तृष्णाओं से सम्बन्ध सूत्र कपाल-क्रिया द्वारा तोड़ा जा चुका था | आग अब अपने उफान पर थी | महाब्राह्मण सस्वर मन्त्र पढता जा रहा था- ‘क्रव्यादाय नमस्तुभ्यं...यः एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम..उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते..’

उसका पत्थर बना मन पिघलता, बहता, जा रहा था | वह अपनी जगह से उठा और गवैये के पास जाकर बैठ गया |

चक्कर काटती धुनों के बीच हँसते गवैये ने उससे पूछा- ‘मरने वाले के कोई रिश्तेदार हो ?’

उसने जवाब दिया- ‘नहीं’

‘विदेशी तो नहीं लगते जो यूं ही मजा लेने आ जाते हैं ?’

‘नहीं’

‘फिर यहाँ कैसे ?’

उसने हँसते हुए जवाब दिया- ‘गंगा में कूदकर जान देने आया था |’

गवैये ने ठहाका लगाया | फिर थोड़ा गंभीर बन बोला- ‘इ वक्त और हमहीं मिले हैं मजाक करने को |’

उसने जवाब दिया- ‘तो तुम भी तो वही कर रहे हो गुरु |’

गवैया फिर जोर से हंसा | कुछ देर अलापने के बाद सबको सुनाते जोर से बोला-‘त भईया लोगों, ई भईया के संकल्प के पूरन हेतु पेश है हमारे प्यारे दोस्त, जो अभी-अभी चिता में जल रहे हैं, का प्रिय निर्गुन गान | चला हो ढोलक बाबू, मारा ताल, अब मुकाबला कुमार गंधर्ब से बा |’

हारमोनियम का सुर सजाने के बाद निर्गुन की स्वर-लहरियां उसके कंठ से फूट रही थीं - ‘ साधो रे..ए..ए..ए, इ मुर्दों का गाँव..पीर मरे, पैगम्बर मरिहें,मरिहें जिन्दा जोगी,राजा मरिहें, परजा मरिहें,मरिहें बैद्य और रोगी...चन्दा मरिहें, सूरूज मरिहें,मरिहें धरती अकासा.. चौदह भुवन के चौधरी मरिहें,इनहुँ की का आसा..नाम अनाम अनंत रहत है,दूजा तत्व न कोई,कहे कबीर सूनो भई साधो,भटक मरो मत कोई....

चिता की आग अब अपने अंतिम भभकों के साथ जल रही थी | लपटें जैसे निर्गुन की धुन के साथ कदम ताल कर रही हों | पूरी कायनात को मुंह चिढ़ाती इस धुन ने उसे ध्यान की एक भूमिका से उठाकर दूसरी भूमिका में फेंक दिया | वह सजल आँखों गवैये के चेहरे को देखता रहा | जीवन और मौत की चिंता से परे उसके चेहरे पर उसने करुणा की गहरी लकीरें देखीं और देखा- एक पठार-सा धीरज |

आग शरीर को निगल अब शांत हो रही थी | निर्गुन ख़त्म हो चुका था | लोग पसीने पोछ रहे थे | हारमोनियम बंद करते गवैये ने नारा लगाया-

‘बोलो शिरीमान राम सनेही उर्फ़ इलाहाबादी उर्फ़ निरहुआ की’ और सभी ने उच्च स्वर में कहा- ‘जय हो, जय हो’|

राम सनेही मृतक का कायदे का नाम था | इलाहाबादी नाम से उसकी पत्नी उसे पुकारती थी और निरहुआ के गीत वह बड़े शानदार तरीके से गाता था |

चिता की ठंढाती आग को तभी एक बुजुर्ग ने अपनी उँगलियों से टटोला, फिर खैनी बनाई, ठोंकी और उसे दबाते बेहद बेजान सी आवाज में बोले - ‘अब चला हो लोग, मैना फुर्र हो गईल |’

वे सब उठ खड़े हुए | एक स्वर में उन्होंने ‘हर हर महादेव’ कहा | फिर वे जाने लगे | वे जिधर से आये थे उधर से ही चले गए | उन्हें जाता वह देखता रहा |

पीछे छूट गए महाब्राह्मण ने गंगा में स्नान किया, यहाँ-वहां बिखरी दक्षिणा समेटी और हाथ जोड़ अंत्येष्टि के अंतिम श्लोक पढ़े- ‘ऊँ शान्तं पापं..शान्तं पापं..मृत्योर्माऽमृतंगमय...वायुर्निलममृतंथेदम भस्मांतम शरीरं...ऊँ कृतो स्मर कृतं स्मर, कृतो स्मर कृतं स्मर....’

सिर झुकाए, कुछ मन्त्र नुमा बुदबुदाते, वह उसके सामने से गुजरा |

रात गहरा चुकी थी | वह चिता के पास ठिठका खड़ा था | मसान में, मौत की छाती पर चढ़ हुई यह मस्ती देख वह दंग था | ‘भटक मरो मत कोई’ का भाव उसके संकल्प को किसी अजगर की तरह लील रहा था | उसे आश्चर्य हुआ | क्या मौत की छाती पर खड़े हो कर भी जिन्दगी के गीत गाये जा सकते हैं ? आंसुओं के कीचड़ में भी क्या भरतनाट्यम की महा-मुद्रा संभव है ? क्या ठीक से जीने के लिए मरण का भाव भी जरूरी है ? मौत से लिथड़ी, चिपकी इस जिन्दगी या मौत के क्षण भी जिंदादिल इस जिन्दगी का यह दुर्दम्य उत्साह देख वह जीवन की अथाह संभावनाओं पर सोचने लगा |

सोच बदली तो संकल्प भी कटे | उसने अनुभव किया कि विचार ही विचार को काटता है...और, एक अच्छा विचार बुरे विचार को अंततः दबोच कर ख़त्म कर देता है |

उसने पास की दुकान से खरीद एक सिगरेट को चिता की बची-खुची आग से सुलगाया और फिर उसी के पास बैठ कर उसके गहरे कश लेने लगा | एक जहर अन्दर जाता था और भीतर के कई जहरों को बाहर खींच लाता था | जहर ही शायद जहर को मारता है | उसने सोचा, मोह रुपी जहर को मारने का भी कोई जहर जरूर होता होगा | क्या है वो ? कहाँ है वो ? बनारस में है कि दिल्ली में ? उसे लगा शायद भगवद्गीता में हो..पर वह तो युद्ध के मैदान की बात थी ! तो क्या प्रेम के मैदान में मोह से मुक्ति की राह बताने वाला सारथि कृष्ण कहीं कोई भी नहीं है ?

उसकी तन्मयता को तभी एक गंभीर, मरघटी-वाक्य ने तोड़ दिया- ‘जिन्दा हो बच्चा !!’

यह आदि भैरव शाष्त्री थे, बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग के अवकाश प्राप्त प्रोफ़ेसर, जो उसकी बगल में आ कर न जाने कब के बैठ चुके थे पर उसे पता तक न चला | वे औघड़ बन चुके थे और सारा शहर उन्हें महागुरु कहता था | आजकल एक जर्मन महिला के साथ मसान-साधना में लीन रहते देखे जाते हैं | इधर शहर में उनकी प्रभुता बढ़ी थी कारण एक सार्वजनिक मंच पर जबरन चढ़ कर उन्होंने भावी प्रधानमंत्री को नसीहत दे दी कि वाक् उर्जा का बेजा इस्तेमाल न करें | यह आध्यात्म के खिलाफ है | कहते हैं जब सरकार बनी तो प्रधानमंत्री उनसे डरकर कुछ दिन तो चुप रहे पर इधर फिर से ज्यादा बकबकाने लगे हैं | लोगों ने पूछा ‘महागुरु अब क्या करियेगा ?’ जवाब में उन्होंने कहा- ‘ नरेंद्र का स्त्री पक्ष कमजोर है, इसीलिए वाग्देवी चंचला हैं | मैं उसके लिए कर्ण-पिशाचिनी साधना करूंगा |’ पर चौदह दिन तक एक कोठरी में बंद हो अपना ही गू,मूत पीकर भवानी को प्रसन्न करने का समय भारत के प्रधानमंत्री के पास कहाँ ! पर चौराहे के लोग हैं कि प्रधानमंत्री के इस चौदह दिनी वनवास की प्रतीक्षा में आज तक जमें हैं |

महागुरु,इस बीच मसान का यह सारा दृश्य देख, जांघो में ताल देते ऐसे खुश थे जैसे देव-अप्सरा उर्वशी का नृत्य देख रहे हों |

उसे बेचैन देख उनके मुँह से कबीर बोल उठे- ‘कबीर मन्दिर आपने, नित उठि करता आल||मरघट देखी डरपता, चौड़े दीया डाल..’

फिर प्रेम से उसके कंधे पर हाथ रख वे आगे बोले- ‘ सब ठाठ पड़ा रह जाएगा जब लाद चलेगा बनजारा !! अचरज त्यागो बच्चा ! प्रेम जगाओ | प्रेम ही प्रेम का काउंटर भी है | यह मसान, जहाँ तुम बैठे हो, बड़ी ही जाग्रत जगह होती है | ऊपर से काशी का यह मसान ! साक्षात शिव का वरदान ! उसे यहीं जगाओ | इस मरघट में ही असली उत्सव जमता है बच्चा, क्योंकि यहाँ आकर सारी चाहनायें चकित और उदास हो जाती हैं | गीता कहती है- ‘जातस्य ही ध्रुवो मृत्यु: ध्रुवो जन्म मृतस्य च’ अर्थात जन्मे मनुष्य का मरना अटल है और मरे हुए का जन्म लेना निश्चित है | इसलिए जीवन-मरण दोनों का मौज लो पुत्र | हमारे ऋषियों ने भी कहा है- तस्माज्जातं मृञ्चैव सम्पश्यन्ति सुचेतस: - अर्थात, विवेकवान व्यक्ति, जन्म और मरण को समान रूप से देखता है |’

यह कह वे मौन हो गए | वह उनके शब्दों को खुरँच रहा था |

महागुरु उसे घूर रहे थे | वे फिर बोले- ‘तुमने जो यहाँ देखा वह राग भैरवी नहीं, मसान भैरवी था...राग भैरवी तो सुबह का राग है जिसका सुख अंततः एन्द्रिक ही है..पर मसान भैरवी, भीतर, आत्मा तक को झनझनाती है..और गाने के वक्त का भी कोई झंझट नहीं..यह महाकाल को भी मुंह चिढ़ाती है | इसका अनुभव यह है कि यदि ठीक से जीना चाहते हो तो पहले मरण भाव को आत्मसात कर लो ’|

महागुरु आँखे बंद कर भीतर उतर गए | औघड़ के मुंह से ‘बम भोले’ सुन वे चेते | उसे गरियाते बोले- ‘चुप साला, औघड़ के नौ घर,बिगड़े तो शव घर |’

फिर संयत हो शून्य में देखते उससे पूंछा - ‘तो अब तुम्हारा क्या इरादा है ?’

वह सकपकाया | आश्चर्य से बोला- ‘कैसा इरादा, महागुरु ?’

उसका जवाब सुन वे जोर से हँसे,जैसे की सब कुछ जानते हों | फिर खड़े होते हुए बोले - ‘मेरा मतलब है कि तुम अब नीचे गंगा-दर्शन करने जाना चाहोगे कि मेरे साथ सीढ़ियों से ऊपर शहर की तरफ चलोगे ?’ वे रुके,पलटे और उसकी ओर गहरे देखते फिर कहा- ‘वैसे तुम जाओ किसी भी ओर पर अंततः पहुंचोगे मसान में ही |’

यह सुन वह सहम गया था पर महागुरु इतना कहकर निकल चुके थे |

वह भी चुपचाप उनके पीछे चल पड़ा |

चलते-चलते वे कह रहे थे-‘ जैसे बाजार जाते हो, वैसे ही यहाँ भी कुछ देर तक आकर बैठा करो | जीने मरने में कोई अंतर नहीं है | असली बात है- होना..और ठीक से होना तभी संभव है जब मृत्यु के साथ नैन-मटक्का चलता रहे | मृत्यु हमेशा स्मरण करते रहने की चीज है बच्चा, स्वयं वरण की नहीं | उसे खुद चल कर अपने पास आने दो |’

उनके साथ सबसे ऊपर की सीढ़ी पर पहुँच वह पलटा | उत्सुक नज़रों से उसने मसान को फिर देखा..वे अब भी थीं..बत्तियां..सीढियां..लकड़ियाँ..राजा हरिश्चंद्र का पुराना मंदिर..खिलखिलाती चांदनी..कुत्ते..औघड़..और..और..बाँह फैलाए, साक्षी भाव से बहती, पतित-पावनी भगवती गंगा..सहसा उसे कौंधा कि सायास किये गए संकल्प कर्म के अँधेरे खोखलों में छिपे रहते हैं और वक्त आने पर फिर से कूद सामने आ जाते हैं | कहीं उन्हीं का समाधान तो पवित्रता नहीं !!

और तब उससे रुका नहीं गया | बदहवास तेज क़दमों से वह सीढ़ियों से उतरा…गंगा किनारे की मढ़ी पर चढ़ा...फेफड़ों में प्राण भरे...आँखें मूँद प्रार्थना की...देव सुरेश्वरि भगवति गंगे..त्रिभुवन तारिणि तरल तरंगे..और..और...उसने गंगा में छलांग लगा दी | जल को सिर से चीरते वह सीधा अन्दर घुसता चला गया |

औघड़ ने क्षण में उसे आते, मढ़ी पर चढ़ते और कूदते देखा | वह बदहवास चिल्लाया- ‘धत साला..हो ! हो !..कूद गया हरामी..’

पर उस औघड़ और एक कुत्ते के अलावा उसे बचाने को वहां कोई नहीं था |

उसे अपने में समेट कर तब तक गंगा शांत हो चुकी थी |

थोड़ी देर तक औघड़ सन्न खड़ा रहा | फिर धीरे से वह भी गंगा के पानी में उतर गया |

कुनमुनाता कुत्ता पानी में आश्चर्य से देख रहा था |

सहसा जल में हलचल हुई | औघड़ ‘हो हो’ कर डूब-उतरा रहा था |

तभी जल में फिर हलचल हुई | वह बाहर उतराया | उसने औघड़ की बांह पकड़ी और तैरते-तैराते किनारे तक ले आया | औघड़ की साँसें ऊपर-नीचे हो रही थीं और अपनी लाल-लाल आँखों से वह उसे घूरते हुए गालियाँ दे रहा था | पहले उसे अचम्भा हुआ | फिर वह औघड़ के और पास आया और बनावटी क्रोध में जोर से चीखा- ‘चुप साला | तैरना जब नहीं आता तो कूदता क्यों है ? पार जाने की चाहत क्यों रखता है ?’

औघड़ सिहर गया | अचानक वह हंसा | हँसता रहा | औघड़ ने उसे पहचान लिया | उसने भी हँसना शुरू किया | फिर उसने औघड़ की बाँह पकड़ी और नाचना शुरू किया | दोनों गोल-गोल नाचते रहे | नाचते हुए औघड़ से ही सुना जाप वह जोर-जोर से जपने लगा- ‘मोहिनी तेरा नाम...देखा महामोहिनी तेरे इल्म का तमाशा..देखा मोहिनी..’ अंत में पस्त होकर दोनों मसान की जमीन पर बैठ गए |

फिर औघड़ ने उसकी दाहिनी हथेली पर राख रख उसे एक मन्त्र दिया- ‘बिस्मिल्लाह र रहमान र रहीम, या सुलेमान बा हक़ रहमते शाह परी हाजर सो हाजर ‘| और बेहद अपनापे से उसने उससे कहा- ‘इसे हमेशा याद रखना’ | हिन्दू मसान में मिले इस सुलेमानी मन्त्र को पा वह सचमुच विस्मित हुआ | उसे लगा कि शायद मसान ही वह जगह है जहाँ हिन्दू-मुस्लिम संस्कृतियों में रूहानी एकता है |

गांजे के नशे में औघड़ की चेतना फ़ना हो चुकी थी | अपनी काली कमली में दुबककर वह शायद सो चुका था | कुछ देर बाद वह उठ कर खड़ा हुआ | वह उधर की ओर चलने लगा जहाँ थोड़ी देर पहले चिता जली थी | उसने देखा- राख..उसने मुट्ठी भर उठा ली और फूंक मार उसे दिल्ली की दिशा में उड़ा दिया | फिर उसने चारो तरफ उसे खोजा- ज्योति ! नहीं..नहीं..मौत ! पर वह, वह दोनों, वहां नहीं थी..वे अन्दर भी नहीं थी..वे अब कहीं भी नहीं थी..उसने सोचा- उन्हें इस तरह कहीं होना भी नहीं चाहिए |

‘साधो इ मुर्दों का गाँव’ पद गुनगुनाते वह सीढ़ियों से ऊपर चढ़ने लगा | इधर औघड़ अचानक जग चुका था | वह गुनगुनी राख में अपने दोनों हाथ डाल कुछ खोजने लगा था..उसकी गुनगुनाहट साफ़ सुनी जा सकती थी- ’ठगिनी क्या नैना झमकावे..कद्दू काट मृदंग बनावे, नीबू काट मजीरा..पाँच तरोई मंगल गावें, नाचे बालम खीरा.. रूपा पहिर के रूप दिखावे, सोना पहिर रिझावे..गले डाल तुलसी की माला, तीन लोक भरमावे..ठगिनी..’

औघड़ को ऐसा करते देख वह मन ही मन हंसा | उसे उस पर दया आयी | उसका मन हुआ कि औघड़ को वह अपने साथ ऊपर ले आए | पर वह शायद नहीं आता | गहरी ग्लानि में वह ऊपर चढ़ता गया..

ऊपर पहुँच उसने सामने शहर की ओर नजर दौड़ाई | झिलमिलाती रोशनियों में वह ऊँघ रहा था | उसे वह जगह-जगह से जलता, सुसुआता, मसान के एक अंतहीन मैदान के रूप में लगा | उसे कबीर याद आये- ‘ऊँचा महल चुनाईया,सुबरन कली दुलाय..वे मंदिर खाली पड़े, रहै मसाने जाय..’

महागुरु काफी आगे निकल चुके थे | उसने अपने पैरों को गति दी | थिरकते शव-सा मस्त, अब शहर में वह वापस लौट रहा था |

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