रज़ाई/लघुकथा

घर मे घुसते ही विनय ने पत्नी को घूरते हुए कहा-"शांति मैं ये क्या देख रहा हूँ?"

शांति-" क्या देख लिया तुमने?"

विनय-"बाहर इतनी सर्दी है,और तुमने माँ को ओढ़ने के लिए कंबल दे रखा है?"

शांति-"तो, और क्या दूँ ?"

विनय-क्यों, घर मे रज़ाई नहीं है क्या?"

शांति-"फालतू तो कोई नहीं!"

विनय-"फालतू ?अभी कल ही तो नई रज़ाई भरवा कर लाया था !"

शांति-"अजी तुम जाओ अब ज्यादा सरवन कुमार न बनो अपना काम करो,वह मैंने उठा कर रख दी।"
विनय-कमाल है?उठा कर क्यों रख दी?
शांति- किसी आये गए महमान के लिए नई रज़ाई चाहिए कि नही?

विनय को लगा, बरामदे में सफेद कंबल ओढ़े,माँ की लाश पड़ी है।

- मनमोहन कौशिक
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