वो कोठों पर बैठी रही,

आज-कल और हर पल

झांकती रही दरवाजों की दरख्तों से,

उसे इंतजार चमड़ी को

नाखूनों से खुरचने वालों का था,


हर कोई उसके दर्द को नहीं

उसके तन को समेटना चाहता था,

बड़े शौक से उसका दीदार होता,

आंखों में उसे मसलने का ख्वाब पलता,

पर उसके मन में खलिश दौड़े जा रही थी,

इस किस्से के दाग छोड़े जा रही थी....


सीत्कारों में सुख की अनुभूति को

मर्दानगी मान बैठा था ये ज़माना,

फिर झटके से उठता,

कीमत पटकता,


एक दफे फिर अपने में

मरती रहती-घुटती रहती,

बार-बार की मौतों ने

उसे मनहूस बना दिया,


पर क्यों सिर्फ वो मनहूस है.....

ये ज़माना क्यों नहीं ?

जिसने तैयार कर दी एक प्यारी मासूम 'वैश्या'


दर्द की इंतहा के बावजूद

वो निवालों को जुटाती-पकाती और खिलाती भी,

लाल (बेटे) उसके जख्मों की वजह पूछते,

वो बातों में बहला देती,

जागे हुए सारे जख्मों को सुला देती,


हर सुबह उसके जख्मों पर

खुद ब खुद पसीना उतर आता,

उस दर्द की टीसन

आपको महसूस हो रही है क्या ?

शायद हां या नहीं....


बेटे ने एक रात रिश्तों को

बिस्तर पर बिखरते देखा,

पर उसे वो निवाले न दिखे

जिन्हें मां ने आंसुओं में डुबोकर

अपने लाल को खिलाया था,


मर चुकी मां को

उसने बेदर्दी से मार डाला,

पर आज भी जमाने में

जीवित हैं ये पंक्तियां कि

वो कोठों पर बैठी रही,

आज-कल और हर पल

झांकती रही दरवाजों की दरख्तों से......

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