विश्वास का मोल

“पिता जी ! इन जेवरों में तो आधो- आध का खोट है जबकि आपने तो ग्राहक को चौदह आने टंच तोल की रकम चुका दी।“ रमेश ने एक वृध्द ग्राहक के जेवर पिघालने के पश्चात हाथ आये आठ आने भर सोने को देख कर अपने पिता से पूछा।

“शायद उन दिनों मेरे पिता जी का हाथ कुछ तंग रहा होगा।“ पारसमल ने कोयले पर रखी सोने की पत्ती पर अपनी अनुभवी आँखें जमाए ही उत्तर दिया।

“मतलब कि दादा जी ने इन जेवरों में ज्यादा खोट मिलाया था ?”

“ हो सकता है उन दिनों उनकी कोई मजबूरी रही होगी ।“

“ लेकिन हमारे सामने तो कोई मजबूरी नहीं,हम तो खोट काटकर शुध्द सोने का मूल्य चुका सकते हैं।

“मोल सोने का नहीं,मोल विश्वास का है बेटा।सुनार शुध्द सोने के जेवर बनाये या रत्ती बर सोने का पानी चढा कर ग्राहक को दे दे, कोई फर्क नहीं पडता। सोने में न स्वाद है न सुगंध।“

“लेकिन दूसरा सुनार तो खरा खोटा बता ही सकता है।“

“जरूर बता सकता है बेटा। मगर वह सच बोल कर भी झूठा कहलाएगा। क्योंकि हम ग्राहक को चौबह आने टंच का मोल दे रहे हैं,जबकि वह आधा मोल देगा।“ वह क्षण भर को रूके और कुछ सोच कर फिर बोले “ विशवास की यह परंपरा पीढियों से चली आ रही है। मेरे पिता जी के हाथ के बने गहनों को मैं चौदह आने टंच बताता हूँ।मेरे पिता जी ने मेरे दादा जी के हाथ के बने गहनों को हमेशा चौदह आने टंच ही माना।जिंदगी में उतार-चढाव आते ही रहते हैं।तुम भी इस दुकान के बने गहनों को चौदह आने टंच ही बताना। इस गद्दी का विश्वास बनाये रकना बेटा। विश्वास है तो भगवान है, नहीं तो पत्थर का टुकडा।“ उन्होंने सोने की पत्ती एक साफ तश्तरी में रखी और रमेश के हाथ से पिघलाए सोने का टुकडा अपने हाथ में ले कर बोले ”तुम बता सकते हो कि भारतीय संस्कृति को विश्व में सर्वोच्च स्थान क्यों प्राप्त है ? भिन्न-भिन्न धर्मों –जातियों-विश्वासों के इस बहुरंगी देश में भी समय-समय पर न जाने क्या कुछ बना है-बिगडा है,तिन्तु हमारे सद्भाव,सहचर्य,समभाव के विशवासों का मूल्य आज भी वही है। क्योंकि हमारे क्षणिक मतभेद,आपसी मनमुटाव और गलत-फहमियाँ स्थायी मूल्यों को प्रभावित नहीं कर लकते।“

“जी,पिता जी! मैं समझ गया विशवास का मोल क्या है। मैं भी इस गद्दी का विशवास बनाये रखूँगा और अपने बच्चे को भी यही शिक्षा दूँगा।“ रमेश ने श्रध्दा भाव से उत्तर दिया और सोने के पतरों को सहेज कर तिजोरी में रख दिया।***


-प्रभु मंढइया विकल

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