हास्टल में भूत

जी, हाँ! प्रभाकर गोपालपुरिया एक नई रोमांचक भूतही कहानी लेकर हाजिर है। इस कहानी में- कॉलेज के हास्टल में रहने वाला एक लड़का मरने के बाद भी हास्टल में अपने सहपाठियों के साथ रहने आ जा रहा है और जब उसके सहपाठियों को यह बात पता चलती है तो उन पर क्या गुजरती है? इस कहानी की रहस्यमय घटनाएँ आपको बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देंगी और साथ ही आपके रोंगटे भी खड़े हुए बिना नहीं रह पाएंगे। कहानी शुरू करने से पहले, दो बातें- शायद आप भूत-प्रेत में विश्वास न करते हों? यह भी सत्य है कि आधुनिक वैज्ञानिक युग में कुछ चीजों का अस्तित्व केवल इसलिए नहीं माना जाता कि विज्ञान उसे अपनी कसौटियों पर कसता है और अपने निर्णय सुना देता है। अभी भी विश्व कुछ ऐसी रहस्यमय चीजों, बातों से पटा पड़ा है, जहाँ विज्ञान अपने ज्ञान को ही भूल जाता है और वह उस रहस्यमयता से परदा नहीं उठा पाता। खैर हम तो बस इतना ही जानते हैं कि अगर ईश्वर, भगवान का अस्तित्व है तो भूत-प्रेतों का क्यों नहीं? खैर आप मनोरंजन, रहस्यमयता, रोमांच, भूत-प्रेतों की दुनिया एवं उनके कारनामों के लिए पढ़ते रहें “भूत-प्रेत की कहानियाँ!!”

कहानी शुरू करने से पहले मैं बता दूँ कि यह कहानी कोई मनगढ़ंत नहीं है, काल्पनिक नहीं है। यह कहानी मैंने कई लोगों से मुख से सुन रखी है और बताने वालों का तो कहना था कि यह कहानी पूरी तरह से सत्य है? हाँ, मैंने सिर्फ इतना किया है कि कहानी को सुनकर उसे शब्दों में बस पिरो दिया है ताकि आप भी इसका आनंद उठा सकें। कहानी पढ़ने के बाद आप खुद ही निर्णय लीजिए की यह कहानी काल्पनिक है या वास्तव में ऐसी घटना घट सकती है। वैसे भी संसार रहस्यों से भरा पड़ा है। जीवन में, समाज में, दुनिया में कुछ ऐसी बातें घट जाती हैं जो सत्य होकर भी असत्य लगती हैं पर जिसने खुद देखा हो, महसूस किया हो उसे तो किसी और प्रमाण की आवश्यकता ही नहीं होती, वह न विज्ञान की सुनता है और न किसी और का, वह तो बस अपनी आँखों पर विश्वास करता है, बस अपनी आँखों पर। तो आइए अब देर न करते हुए आपको इस अद्भुत, रोमांचक, सिहराने वाली कहानी की यात्रा पर अग्रसर करता हूँ।

ऐसा नहीं कहा जा सकता कि इस घटना को घटे बहुत दिन हो गए हैं। यह घटना मेरे बचपन काल की है, यानी कहा जा सकता है कि 25-30 साल पहले की। हमारे जिले-जवार की ही यह घटना है। जी हाँ, ए बड़े नामचीन महाविद्यालय की घटना। यह महाविद्यालय बहुत पुराना होने के साथ ही साथ आज भी अपनी गरिमा को बनाए हुए है और इसकी गणना सुप्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में होती है। दूर-दूर से बच्चें यहाँ शिक्षा ग्रहण के लिए आते हैं। इस महाविद्यालय में कई हास्टल हैं, जिसमें मेधावी छात्र रहते हैं और पढ़ाई-लिखाई में इस महाविद्यालय और अपने घर-परिवार का नाम रोशन करते हैं। एक बार की बात है कि ओजस्वी नामक हास्टल में बिहार का एक लड़का रहकर पढ़ाई करता था। वह बहुत ही मेधावी और मिलनसार था। हास्टल में उसके साथ रहनेवाले अन्य बच्चे उसे दूबेभाई-दूबेभाई किया करते थे। दूबेजी पढ़ाई-लिखाई में अन्य बच्चों की मदद करने के साथ ही साथ उनकी अन्य परेशानियों को दूर करने के लिए सदा तत्पर रहते थे। हास्टल में उनका बहुत ही मान-सम्मान था। अपने सहपाठियों के साथ ही वे अध्यापकों के भी चहेते थे। उन्हें अपने कॉलेज से बहुत ही प्रेम था, उन्हें सुबह-सुबह या शाम के समय कॉलेज में अपने साथियों के साथ घूमते हुए अक्सर देखा जा सकता था।

एक बार की बात है कि दूबेजी अपने बड़े भाई की शादी में सम्मिलित होने के लिए 15 दिन के लिए गाँव गए। हास्टल के अन्य बच्चों ने उनसे कहा कि दूबेभाई जल्दी ही वापस आ जाइएगा। दुबेजी ने सकारात्मकता से सिर हिलाते हुए अपने सहपाठियों से विदा ली। उन्होंने शाम की बस पकड़ी और अपने गाँव की ओर चल दिए। चूँकि उस समय उनके पास फोन आदि की सुविधा नहीं थी, इसलिए वे अपने सहपाठियों को अपने पहुँचने की खबर तुरंत नहीं दे सकते थे। खैर इधर हास्टल में दुबेजी की कमी तो सहपाठियों को खलती थी पर उन्हें संतोष था कि 15 दिन की ही तो बात है, फिर दुबेजी उन लोगों के साथ ही तो होंगे।

आखिरकार वह 15 दिन के समय की आयु पूर्ण हुई और दुबेजी का पदार्पण हास्टल में हो गया। पर यह पदार्पण कुछ अलग हटकर था, क्योंकि दुबेजी के चेहरे पर से पहले वाली मुस्कान गायब थी और साथ ही उनका मिलनसार रवैया भी। अब तो दुबेजी पूरे के पूरे बदले हुए नजर आ रहे थे। यहाँ तक कि आने के बाद ना ही वह अपने किसी सहपाठी या रूम-पार्टनर से अच्छी तरह से बात किए और ना ही घर-परिवार, शादी-विवाह आदि की ही कोई बात बताई। एक दिन रात को खाना बनाते समय उनके रूम-पार्टनर ने कहा कि दुबेजी आज की रात आप जो बोलेंगे वही बनाऊँगा तो दुबेजी ने बेमन से कहा कि अपने हिसाब से बनाओ, वैसे भी मुझे आज भूख नहीं है। दुबेजी की यह उदासी, बदला-बदला स्वभाव उनके रूम-पार्टनर को परेशान किए जा रही थी, वह सोच रहा था कि कब कोई दुबेजी के घर का व्यक्ति आए और वह उससे बातें करें क्योंकि उस रूम-पार्टनर के लिए दुबेजी अब रहस्यमय होते जा रहे थे क्योंकि वे हर बात को टालने के साथ ही कभी-कभी दिनभर गायब भी रहते थे।

एकदिन तो एक ऐसी भयावह, रोंगटे खड़ी करनेवाली घटना घट गई की रुम-पार्टनर बेचारा बीमार पड़ गया और छुट्टी लेकर एक हप्ते के लिए उसे गाँव जाना पड़ा। हुआ यह कि एकदिन सबेरे-सबेरे रुम-पार्टनर उठकर टहलने चला गया था। उधर ही कहीं से नीम की दातून तोड़ लाया था। उसने देखा था कि जाते समय तो दुबेजी अपनी खाट पर सोए थे पर आने पर उसने पाया कि दुबेजी तो रूम में हैं ही नहीं, खैर उसे लगा कि कहीं गए होंगे, अभी आ जाएंगे। उसके बाद वह कमरे में टंगे एक बड़े शीशे (दर्पण) में देखते हुए अपने बालों में कंघी करने लगा, अरे अचानक उस शीशे में उसे दुबेजी का चेहरा दिखाई दिया। वह तो चौंक गया और पीछे मुड़कर देखा तो पीछे दुबेजी थे ही नहीं। फिर वह डरते-डरते शीशे की ओर मुड़ा तो शीशे में दुबेजी का चेहरा नहीं दिखा। वह एकदम से परेशान हो गया और थोड़ा डरते हुए अपनी खाट की ओर बढ़ने लगा। खाटों के पास पहुंचकर क्या देखता है कि दुबेजी तो अपनी खाट पर सोए हैं। अब तो उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम, क्योंकि जब वह आया तो दुबेजी कमरे में नहीं थे और अंदर से उसने दरवाजे की सिटकनी भी तो लगा दी थी तो फिर दुबेजी अंदर कैसे आए? वह उस समय इतना डर गया कि बिना दुबेजी को जगाए रूम से बाहर निकल गया और बगल वाले सहपाठी के रूम में चला गया पर उसकी बेचैनी कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी और उसे यह भी लग रहा था कि यह बात अगर वह किसी से बताता है तो कहीं लोग उस पर हँसने न लगें, उसका मजाक न बना दें? खैर वह कोई बहाना बनाकर उस सहपाठी को अपने कमरे में लेकर आया और बात करते-करते हिम्मत करके दुबेजी को जगाया, जब दुबेजी जगे तो उनसे थोड़ा दूर रहते हुए ही उसने दुबेजी से कहा कि सकी तबियत ठीक नहीं लग रही है, उसे तेज बुखार है, इसलिए वह एक हप्ते के लिए गाँव जा रहा है। इससे पहले कि दुबेजी कुछ समझें या उस रूम में आया हुआ उसका सहपाठी कुछ समझे, वह धीरे से अपना एक छोटा बेग उठाया और तेजी से कमरे से निकल गया। दुबेजी और उसका सहपाठी बस एक दूसरे को देखते ही रह गए और चाहकर भी उसे जाने से रोक नहीं सके।

खैर एक हप्ते का समय बीत गया और दुबेजी का डरा-सहमा रुम पार्टनर फिर से हास्टल में आ गया। पर अब वह भी कमरे में कम ही रहता और कोई न कोई बहाना बनाकर बगल में रह रहे सहपाठियों के कमरों में चला जाता या पुस्तकालय में। रात को जल्दी से खाना-ओना बनाकर, खा-पीकर, कोई पुस्तक आदि लेकर सोने के लिए भी अब वह किसी सहपाठी के कमरे में ही चला जाता पर पूरा कोशिश करता कि उसे दुबेजी के साथ न रहना पड़े।

एकदिन तो दुबेजी के रूम पार्टनर पर ऐसा डरावना, भयावह तुषारपात हुआ कि डर के मारे उसकी शरीर कांपने लगी और वह अपने आप को संभाल नहीं पाया और बेहोश होकर गिर पड़ा। साथ ही उसके आस-पास के कमरे में रहने वाले बच्चों के चेहरे पर भी हवाइयां उड़ने लगी और सबके सब भयभीत हो गए। चिल्लाहट-रूदन मच गया। हुआ यह कि एक दिन दुबेजी का रूम-पार्टनर सुबह-सुबह अपने कुछ सहपाठियों को अपने रूम पर बुला लिया था और सबके लिए चाय बना रहा था। दुबेजी सुबह-सुबह ही बिना बताए कहीं निकल गए थे। अचानक दुबेजी के उस रूम के दरवाजे पर कुछ अस्पष्ट शोर-गुल सुनाई दिया, फिर कमरे के दरवाजे को बाहर से कोई तेजी से भड़भड़ाने लगा। फिर दुबेजी के रूम-पार्टनर से दरवाजा खोला तो क्या देखता है कि दरवाजे पर उसके हास्टल के ही डरे-सहमे कुछ बच्चे और दुबेजी के पिताजी और और उनके बड़े भाई खड़े हैं। दुबेजी के पिताजी की आँखों से आंसूँ झर रहे थे और उनके बड़े भाई के चेहरे पर भी असीम मायूसी छाई हुई थी। दुबेजी का रूम पार्टनर इन दोनों को पहचानता था अस्तु उसने आगे बढ़कर इन दोनों को प्रणाम किया और मायूस होकर ही बोला कि दुबेजी तो अभी कमरे में नहीं है। सुबह-सुबह ही कहीं चले गए। आधे-एक घंटे में आ जाएंगे, तबतक आप लोग अंदर आकर बैठिए, चाय पीजिए। यह सारी बातों दुबेजी का रूम पार्टनर स्थिति को भाँपते की कोशिश करते हुए एक ही साँस में बोल गया।

रूम पार्टनर की बात सुनकर वहाँ खड़ी उदास, डरी भीड़ में से कोई बोले उसके पहले ही दुबेजी के पिताजी भोंकार पारकर (बहुत तेज, आवाज करते हुए) रोते हुए बोल पड़े, “नहीं बेटा! वह कैसे आ सकता है? वह तो अब इस दुनिया में रहा ही नहीं। हम लोग तो उसका सामान लेने आएँ हैं और कालेज को खबर करने।” इतना कहते हुए दुबेजी के पिताजी और भी फफककर रो पड़े। उनकी बात सुनते ही दुबेजी के रूम पार्टनर की शरीर पूरी तरह से कांपने लगी तथा दुबेजी के बड़े भाई रुआँसू होकर बोल पड़े कि यहाँ से घर जाने के दो दिन ही बाद दुबे (दुबेजी) मोटरसाइकिल से एक रिस्तेदार के वहाँ जा रहा था। पता नहीं कैसे उसकी मोटरसाइकिल एक तेज आती ट्रक से टकरा गई थी और वह आन स्पाट ही काल के गाल में समा गया था। इतना कहते ही वे फफककर रो पड़े और पता नहीं उनकी बात दुबेजी का रूम पार्टन पूरा सुन पाया था या नहीं, वह तो बेहोश होकर गिर पड़ा था। बाकी सारे बच्चों को भी ठकुआ मार गया था और उन सबकी आँखों में आँसू आ गए थे। अधिकांश बच्चे कांप भी रहे थे। बच्चों के दिमाग में बार-बार यही बात चल रही थी कि क्या वे लोग 10-15 दिन से किसी भूत के साथ रह रहे थे? क्या उनके हास्टल में जो लड़का रह रहा था, वह आत्मा थी? क्या वह दुबेजी का भूत था?


खैर उस दिन के बाद से दूबेभाई का भूत फिर कभी हास्टल में नहीं आया पर कई महीनों तक हास्टल के सारे बच्चे खौफ में जीते रहे और दूबेभाई के रहनेवाले कमरे में ताला लटकता रहा। लोग कहते रहे कि दूबेभाई को अपने हास्टल से बहुत ही लगाव था इसलिए स्वर्गीय होने के बाद भी वे हास्टल का मोह छोड़ न सके। अब खुद सोचिए की दुबेजी के रूम-पार्टनर पर क्या बीती होगी या बीत रही होगी जो एक आत्मा (भूत) के साथ 15 दिनों तक एक ही कमरे में रहा?

यह घटना सही है या गलत; यह मैं नहीं कह सकता। क्योंकि मैंने यह घटना अपने क्षेत्र के कुछ लोगों से सुनी है। खैर भगवान दूबेभाई की आत्मा को शांति और मोक्ष प्रदान करें।


पं. प्रभाकर गोपालपुरिया


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