नीला आसमान
काले भूरे बादलों
के भार से
झुक आता था
धरती पर ।
झूमकर बरस
उठते थे मेह
भर जाते थे
नदी और पोखर
गीत गाते थे दादुर
नाच उठते थे मोर ।
फिर बदलने लगी
रंगत आसमान की
उसका नीलापन
हो उठा स्याह
पर टपकी नहीं
पानी की एक भी बूँद
सूख गये पोखर
दरक गयी
छाती नदी की
रुँध गये दादुर के कंठ
मोर भी भूल गये
अपना नृत्य ।
किसने छीन ली
धरती की वो
हरी हरी चूनर
किसने सोंख लिया
बादलों का पानी
आँखों में उभरती हैं
धुआँ उगलती चिमनियाँ
जो निगलती जा रही हैं
आसमान का नीलापन
और आसमान होता जा रहा है
स्याह स्याह और स्याह ॥

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