सहर होगी किसी स्याह रात के बाद

कार ड्राइव करते हुए पूरे रास्ते मन में घुमड़ती खलबलियों आशंकाओं से जूझता रहा था |कौन है ये लडकी ?कहाँ रहती है?इसके नाते रिश्तेदारों को कैसे सूचित करूँ ?लग तो अच्छे परिवार की पढी लिखी रही है लेकिन इतनी रात ये कहाँ से आ रही होगी अकेली ? वो तो मुझे आज ऑफिस से लौटने में देर हो गयी थी सोचा शोर्ट कट से निकल जाऊँगा और वहीं ये लडकी अंधेरी सुनसान सडक के किनारे घनी झाड़ियों के पास बेहोश पडी मिली |बस एक कुत्ता था पास में जो उसके पास पड़े मोबाइल और डायरी पर्स वगेरह को सूंघ रहा था | लडकी का स्कूटर पास में ही गिरा पड़ा था जिसमे से धुंए में लिपटी पेट्रोल की गंध अब तक आ रही थी | वारदात हुए ज्यादा समय नहीं गुजरा था ,ऐसा मुझे लगा |सडक अंधेरी और सुनसान थी | दरअसल सडक के बीचोंबीच जो खड्डे थे शायद बारिश से बन गए होंगे उन्हीं को बचाते हुए मैंने सडक से कार कुछ नीचे कच्चे रस्ते में उतार ली थी कि लडकी पर हेड लाईट की रोशनी पडी |नहीं तो शायद मै भी सीधे निकल जाता |मै कुछ देर वहीं खड़ा रहा कि कोई आ जाये तो कम से कम दो लोग तो हो जायेंगे |एक विचार ये भी आया कि चुपचाप कार स्टार्ट करूँ और मै भी चलता बनूँ |पता नहीं लडकी जिंदा है या मर गई है?लेकिन जिंदा हुई तो...?हो सकता है कि कई लोग यूँ ही देख निकल भी गए हों |पुलिस के झमेलों को कौन नहीं जानता ?लेकिन न जाने क्यूँ मेरा मन नहीं माना | कभी कभी ऐसे वक़्त में जब मस्तिष्क अनिश्चितता और ऊहा पोह की नदी में गहरे डूबता जाता है ...’ये या वो’...और विवेक एक निरीह बालक –सा किसी कोने में दुबक कर खड़ा हो जाता है तब निर्णय यकायक हमारी असोची किसी भी क्रिया के जिम्मे आ पड़ते हैं ... ‘ये या वो’ में से कोई एक औचक चुन लेना हमारी विवशता होती है |मेरे साथ भी यही हुआ |मैंने ज़मीन पर गिरे उसके मोबाइल और डायरी उठा लिए जो वहीं बिखरे सामान के साथ पड़े थे |उसी के बैग में डाल कर बैग कार में रख दिया |लडकी को बाहों में उठाया और कार की पिछली सीट पर लिटा दिया और सीधे कार दौड़ा दी प्राइवेट हॉस्पिटल ‘’चिरायु ‘’की ओर जो वहां से सबसे निकट था | जो होगा देखा जायेगा ...मैंने सोचा | जो भी होगा आत्मग्लानी की तकलीफ से बेहतर ही होगा |माँ को फोन कर दिया आज ऑफिस में काम ज्यादा है पूरा होते ही आ जाऊँगा फ़िक्र मत करना |सच कह देता तो खाम-ख्वाह और चिंता करतीं |

वो तो गनीमत थी कि मेरी गिडगिडाहट पर तरस खाकर प्राइवेट अस्पताल के उस जूनियर डॉक्टर ने क्युबिकल्स में से कोने वाले उस खाली प्राइवेट रूम के पलंग पर कुछ देर उसे लिटाने की इजाजत दे दी थी |बेहोश लडकी के बदन पर ओढ़े झीने दुपट्टे को हटाकर मैंने अब चादर से ढांक दिया था जो बेड के पायताने पर रखी हुई थी |कमरा छोटा और हवादार था |जिसमे दो पलंग दो कुर्सियां और दौनों पलंगों की बगल में एक एक छोटी मेज़ थी जो खाली थी | ये व्यवस्था कुछ देर के लिए थी लेकिन डॉक्टर ने इलाज़ के लिए मना कर दिया था ‘’नो सर वी कांट हेल्प यु ...दिस इस अ पुलिस केस ‘’

मैं बेहद उलझ गया था |बॉस की पहचान अच्छी है सो उन्हें फोन पर पूरा माजरा बताकर उनकी हेल्प लूँ |वो सी एम् ओ या अस्पताल प्रबन्धन से बात करेंगे तो कम से कम इलाज तो शुरू हो जाएगा ! पर ये बेहोश है खून भी बहता जा रहा है इसे अकेला छोड़ना भी ठीक नहीं ...लेकिन नहीं जाता तो इसका इलाज कैसे होगा लडकी का कोई अता पता भी नहीं कहाँ फोन करे क्या करे ? दिल से मस्तिष्क तक जाने वाली रक्त नलिकाओं में मानों बर्फ जम गई थी | सफ़ेद पारदर्शी ठोस बर्फ ...हारकर मै किंकर्तव्य विमूढ़ सा बैठ गया वहीं और लाचारी से लडकी का चेहरा देखता रहा |मन ही मन पारिवारिक संस्कारों और बड़े बूढों की ‘सीखों’’ को भी कोसा मैंने |

लडकी की दुबली पतली काया पलंग पर अचेत पडी थी |उस की ऑंखें सूजी हुई थीं |उसकी कनपटी और माथे से अब भी खून बह रहा था जो गालों तक आकर वहीं सूखे जा रहा था|उसे देखकर एक वित्रश्ना का भाव अंतर में कहीं उभर रहा था ..न जाने कहाँ से आ रही थी ..? ऐसी वैसी कोई लडकी ...कॉल गर्ल ...पता नहीं कौन है..|अजीबोगरीब मनःस्थिति हो गई थी मेरी |खुद पर गुस्सा भी आ रहा था ..पड़े रहने देता वहीं ..मर जाती और क्या ...अब तो गले की हड्डी हो गयी ये ..न यहाँ रह सकता न इसे छोड़कर भाग सकता ...

घन्न घन्न लडकी की बगल में पडा उसका मोबाइल बजने लगा था मैने लपक कर उठा लिया |लडकी अब भी मरणासन्न पडी थी

हेलो?...मैने कहा

‘’हेलो आसिफ बोल रहा हूँ ...आप कौन साब हैं ?हिना का फोन आपके पास कैसे ?’’उसकी आवाज़ में घबराहट थी

मैने अपना परिचय दिया और संक्षिप्त में सारा वाकया बताया...ये भी कहा कि हम ‘’चिरायु’’अस्पताल में हैं प्लीज़ आप लोग ज़ल्दी आ जाइए इनकी हालत ठीक नहीं| पुलिस केस कहकर डॉक्टर हाथ नहीं लगा रहे हैं ..

आसिफ कुछ देर चुप रहा शायद यकीन नहीं कर पा रहा था

‘’’’नया सवेरा ‘’अखबार से बोल रहा हूँ मै |किन लफ़्ज़ों में शुक्रिया अदा करूँ साहब आपका ...बस आप वहीं रुकिए हम अभी हिना के इलाज का बंदोबस्त करने की कोशिश करते हैं |लडकी का दोस्त ज़ल्दबाजी में था

ठीक है... फ़िक्र न करें मैं हूँ उनके पास मैने उसे यकीन दिलाया ...बट प्लीज़ कम सून ..मुझे घर भी जाना है अर्जेंसी है ‘’| ये सच था ...माँ अकेली हैं जल्दी घबरा जाती हैं टाइम पर न पहुंचूं तो |

डोंट वरी..आई एम् ऑन माय वे....फोन बंद हो गया

कुछ राहत मिली

लडकी बीच बीच में हल्की सी होश में आती |दर्द से कराहती वो अपनी कांपती पतली उँगलियों को बैचेनी से चेहरे पर फिराती |बहुत हौले हौले ...|माथे पर दर्द की एक लकीर खिंच जाती और फिर बेहोशी छा जाती उस पर |उसके बाल बिखरे थे और खून में सन कर माथे और कनपटी पर चिपक गए थे |मै उसके सिरहाने ही खड़ा था| हमारे बीच खामोशी थी| मै उससे बात करना चाहता था |उससे कहना चाहता था कि अब तुम सुरक्षित हो |इलाज के बाद सब ठीक हो जाएगा | हौसला देना चाहता था मै उसे ...लेकिन इतनी रात में शरीफ घर की लड़कियां बाहर होती हैं क्या?...मेरी आँखों में एक हिकारत उतर आई | शक के कीड़े ने अपना घर बना लिया था मस्तिष्क में ..खैर इंसानियत के नाते ये मेरा कर्तव्य था अब इसके घरवाले आ जाएँ तो बला कटे ...

अचानक कमरे में तीन चार नर्सें डॉक्टर और अन्य कर्मचारी आ गए |कमरे में खलबली सी मच गई |

‘’सर ,डॉक्टर का फोन आया है इन्हें अभी ओपरेशन थियेटर में ले जाना होगा |पुलिस की कार्यवाही बाद में होगी |नर्स ने कहा शायद मुझसे| और मेरी कोई प्रतिक्रया पाए बिना वे उसे स्ट्रेचर पर ले जाने की तैयारी करने लगे |मैं खिड़की के पास कोने में खड़ा हो गया |अचेत लडकी को बेड से स्ट्रेचर पर ‘शिफ्ट’ करते हुए लडकी के ऊपर ओढा हुआ चादर खिसक गया और उसके अस्त व्यस्त और फटे हुए कपड़ों में से लहूलुहान अंग दिखाई देने लगे |स्ट्रेचर ले जाने वाले दौनों हट्टे कट्टे वार्ड बॉय ने एक दूसरे को देखा |हल्की सी मुस्कुराहट की एक लकीर उनके चेहरे पर खिंच गई | हलाकि इस अनजान लडकी से मेरी ये पहली ही मुलाकात थी वो भी कुछ ही पलों पहले हुई थी पर न जाने क्यूँ मुझे उसे देखकर लड़कों का इस तरह मुस्कुराना अच्छा नहीं लगा |मैंने बेहोश लडकी को चादर फिर ओढ़ा दिया |उस भरे पूरे अस्पताल में भी मुझे लगा कि इन दो ‘मुस्टंडों’ के भरोसे उसे नहीं छोड़ना चाहिए लिहाजा मै भी उसके पीछे जाने को हुआ लेकिन कमरे के दरवाजे पर ही नर्स ने मुझे रोक दिया | वो लडकी को लेकर चले गए| नर्स के हाथ में एक फॉर्म था

‘’आप कौन हैं इनके ?नर्स की आवाज़ और लहज़ा रोबदार थे

कोई नहीं ..बस एक राहगीर जो इन्हें घटना स्थल से उठाकर यहाँ तक लाया

ठीक है ...यहाँ साइन कर दीजिये |फिलहाल आप ही इनके अटेंडेंट हैं उसने फॉर्म आगे बढ़ा दिया..

‘’लेकिन मैं....!

देखिये पेशेंट की हालत बहुत नाज़ुक है...काफी खून बह गया है यदि इलाज नहीं किया गया तो ....

अजीब स्थिति थी ... वक़्त बहुत कम था मैने साइन कर दिए कोई चारा भी नहीं था ...

...और हाँ जाइएगा नहीं | नर्स ने मुझे हिदायत दी

...’’जी ठीक है ‘’...मैंने उन्हें आश्वस्त किया |नर्स का पत्थर जैसा भावहीन चेहरा और यांत्रिक भंगिमाएं मुझे अचम्भित ही नहीं किंचित आतंकित भी कर गईं |

मैंने महसूस किया कि इन अस्पताल कर्मचारियों के लिए कोई भी घटना और दुर्घटना कितनी आम रोजमर्रा की चीज़ होती है ...कोई रहम कोई सरोकार ही नहीं या शायद समूचा समाज इतना ही संवेदन हीन हो चुका है !

मै कमरे से बाहर आया लेकिन तब तक वो लोग स्ट्रेचर लेकर कहीं ओपरेशन थियेटर में घुस गए थे |मै वापिस रूम में लौट आया और वहीं कुर्सी पर बैठ गया | अब बिस्तर खाली था |बेड पर बिछा सफ़ेद झक्क चादर खून के धब्बे और सिलवटों से बदरंग हो गया था |मेरी नज़र तकिये के पास रखी लडकी की उस डायरी और मोबाइल पर पडी |मैंने मोबाइल तकिये के नीचे रख दिया और डायरी उठा ली |बस यूँ ही डायरी के पन्ने पलटने शुरू कर दिए इस उम्मीद से कि इसमें लडकी का कोई फोन नंबर या पता मिल जाये| डायरी पर मिट्टी और खून के कुछ दाग थे |ये उसकी व्यक्तिगत डायरी थी |

पहले पन्ने पर पाओलो कोएलो की कुछ पंक्तियाँ थीं

‘’ हम विद्रोही समय में पैदा हुए हैं इसमें हम अपनी सारी शक्ति उंडेलते हैं हम अपनी ज़िंदगी और जवानी का जोखिम उठाते हैं |अचानक हम डरने लगते हैं और शुरुवाती जोश के सामने असली चुनौतियां आती हैं तो थकान , अकेलापन , और अपनी क्षमताओं के बारे में संदेह उस जोश की जगह ले लेता है | हमने देखा है कि हमारे कुछ दोस्त पहले ही हार मान चुके हैं |हम मजबूर हैं अकेलेपन का सामना करने को सड़क को खतरनाक मोडों के मुताबिक चलने को , थोड़ी सी गिरावटें झेलने को जबकि आसपास कोई नहीं जो मदद करे और अंत में हम खुद से पूछते रह जाते हैं क्या ये सब इस लायक है कि इतनी कोशिश की जाये ? ’’ (पाओलो कोएलो )

(अंतिम पंक्ति को रेखांकित किया गया था )

मै डायरी के पन्ने पलटने लगा ...बीच का कोई पेज...

28 दिसम्बर

ठीक तीन दिन बचे हैं नए साल के .....काश कभी ऐसा हो जब आदमी किसी नए बरस में नए सपनों के साथ दाखिल हो कि सुबह उठे और देखे कि दुनियां बदल चुकी है |सदियों से औरत मर्द, न्याय-अन्याय,आम और ख़ास ,इंसानियत और हैवानियत ,पूंजीपतियों व् गरीबों के बीच चल रही ये जंग ख़त्म हो चुकी है ....हर जगह अमन चैन और खुशहाली है ...नाइंसाफी और दरिन्दगी का वक़्त गुज़र चुका है ....कभी २ मेरे ख्वाब किसी जंगल में भटक जाते हैं और उस जंगल की ऊसर ज़मीन और बीहड़ झाड़ियों में उलझ कर वो लहुलुहान हो जाते हैं| मुझे सचमुच ताज्जुब होता है कि सदियाँ और पीढ़ियाँ इन्हीं बुरे ख़्वाबों और ज़ख्मों के बीच छटपटाती जीती मरती रही हैं |एक सपने में मुझे कोई दूसरा सपना झिंझोड़कर न उठाये ऐसा कम ही हुआ है |काश मेरा वक़्त भी मेरे साथ ही शुरू हुआ होता !

मेरी उत्सुकता बढ़ने लगी ...हलाकि किसी की व्यक्तिगत डायरी पढ़ना सभ्यता के खिलाफ होता है ..फिर भी ...

10 जनवरी

अम्मी को न जाने क्यूँ दहशत होती है मेरी इस जिद्द से |कहती हैं ‘अखबारनवीसी तो मर्दों का पेशा है | ये भी कोई शौक है भला लड़कियों के ?रात दिन गुंडों मवालियों से पाला पड़ता है |रात बिरात घर आना और फिर तुम्हारे अब्बू भी तो किसी बड़े ओहदे पर नहीं |मामूली से एक क्लर्क हैं |कुछ वारदात हो तो बचा भी नहीं पाएंगे ..आगे पीछे कोई नहीं ..

मै कहती हूँ ‘यानी ओहदेदार लोग बेख़ौफ़ हो कोई भी वारदात करने को आज़ाद हैं ?क्यूँ कि उनके आगे पीछे उन्हें बचाने वाले तमाम लोग हैं ?

तुम बहुत बहस करती हो ‘’अम्मी खीझकर कहती हैं और फिर आवाज़ में नरमाई लाकर समझाती हैं ‘’तुम्हारा आम आदमी से सरोकार ,ईमानदार और बेख़ौफ़ होना जानते हैं| हम तारीफ भी करते हैं लेकिन आजकल इंसान इन खूबियों के साथ आसानी से नहीं जी सकता बिटिया |ज़माना बहुत खराब है |लड़कियों को थोड़ा तहजीब और डरकर रहना ज़रूरी है.कैसे समझाएं तुम्हे ?

अम्मी ज़माना तो सभी के लिए खराब है फिर लड़कियों ने ही ऐसा क्या गुनाह किया है जो उन्हें डरकर छिपकर रहना चाहिए?

मेरी इस दलील पर अम्मी बेबस और खामोश हो अपने काम में लग जाती हैं पर उनकी खामोशी मेरे दिल पर हथोड़े सी टनट्नाती रहती है |मुझे लगने लगता है जैसे मै सांस के साथ ऑक्सीजन नहीं बल्कि कोई गाढ़ा ज़हरीला धुआं खींच रही हूँ ...धमनियों में एक घुटन भरी बैचेनी दौड़ रही है |फिर वही सवाल ...सैंकड़ों सवाल जो सदियों से बुत की तरह खड़े हैं नंगे...जिनके कोई ज़वाब नहीं ,जिनका कोई समाधान नहीं |ऐसे बेज़वाब सवाल दिल के किसी अँधेरे कोने में जाकर एक नश्तर से धंस जाते है और टीसते रहते हैं गाहे ब गाहे |अल्लाह ...कितने सवालों से भरी है ये दुनियां !गोया ये नारंगी के आकार की प्रथ्वी सवालों के रेशों से ही बुनी है .आग में भी तो एक शेड नारंगी होता है न .....सवाल ही सवाल...आग ही आग |मै अम्मी की इस खामोशी की पीठ से ऑंखें फेर अपनी अगली कवायद में मसरूफ हो जाती हैं ...अम्मी भी अपने घरेलू काम काजों में मशगूल पर हम दौनों जानते हैं कि हमारी ये बहसें एक दूसरे की रूहों में उलझ गई हैं (जिन्हें सुलझाने का जिम्मा भी अम्मी का ही है मै तो जिद्दी ठहरी ना ऊपर से अपने अब्बू की बेटी ?)

20 जनवरी

आज मैंने छुट्टी ली है..थकान उतारना चाहती हूँ ऊपर से जाड़ा भी बहुत है |किसी ‘’खबर’’ के सिलसिले में तमाम कानूनी किताबें उलट पुलट डालूं |दुश्मनों को नाकों चने चबवाने का हौसला रखूं |बड़े से बड़े तीस मार खान से भिड लूँ |बहस में पसीना निकलवा दूँ लेकिन जाड़े के दिनों में अम्मी से लिपटकर लिहाफ में गुड़मुड़ी होकर सोना मुझे आज भी सबसे अच्छा लगता है |अम्मी मेरे बालों में हाथ फेरती हैं और मै अम्मी के पेट पर हाथ रखकर उनसे तमाम सवाल करती हूँ ...मेरी ज़िंदगी की कुछ निखालिस खुशियों में से एक ये भी है

‘’अम्मी,आप ही तो बताती हैं कि आप के वालिद भी निहायत तरक्की पसंद और बेख़ौफ़ इंसान थे| दुनियां एक दिन ज़रूर बदलेगी ये ख्वाब देखा करते थे !..आप ये भी तो फख्र से कहती थीं कि मै बिलकुल अपने नाना पर गयी हूँ ! कि नाइंसाफी और झूठ से नफरत है मुझे भी | (अम्मी कहती हैं उम्र के साथ वो भुलक्कड होती जा रही हैं |क्या भरोसा अपनी ये पुरानी यादें वो कहीं रखकर भूल गई हों ?एक खौफ की पतली सी लकीर खिंच जाती है मेरे भीतर)

.............अम्मी खामोश रहती हैं ...मेरा डर एक कदम और बढ़ जाता है | मै एक और सवाल का पौधा अम्मी के ज़ेहन में बो देती हूँ ...शायद अम्मी की चुप्पी के भीतर दाखिल हो ये दहशत अपनी मुठ्ठी में दबा बैठ जाना चाहती हूँ अपने यकीन में ताकि खौफ से निजात पा सकूँ

‘’ गूंगे बहरों लाचारों की तरह सब देखते चले जाना और खून के घूंट पीते रहना . अम्मी क्या ये ठीक है ?खामोशी का ये सिलसिला आखिर कब तक ? कब तक ये नाइंसाफी चलती रहेगी इन हुक्मरानों दरिंदों की ? पहल तो किसी न किसी को करनी ही होगी ना !

आखिरकार अम्मी की खामोशी टूटती है

‘’तुम्हे क्या लगता है कि तुम्हारे या अब्बू के पहले नाइंसाफी और हैवानियत देखकर किसी का खून नहीं खौला होगा? और पहल ...! की तो थी पहल उन तमाम अफ्सनानिगारों, ईमानदार और तरक्की पसंद नेताओं ,शहीदों ,अपने हकों के लिए आवाज़ उठाने वाली औरतों ने |देखा तो था ख्वाब एक उम्दा मुल्क बनाने का इसे ..क्या नतीज़ा रहा ...पहले से भी बदतर हालात हो गए हैं |

अम्मी कुछ देर खामोश रहती हैं फिर मेरी सोच को सहलाते हुए अपनी समझाइश जारी रखती हैं

‘मेरी जान,जानते हैं कि अभी खून गर्म है तुम्हारा और ताकत है शरीर में इसलिए ये सोचती हो पर खैरियत तो इसी में है बिटिया कि नज़रें बहुत दूर तक न दौड़ाओ बस अपने घर परिवार की हिफाज़त करो और खामोशी से सब देखते रहो |

‘’अम्मी ,अपने बच्चों का तो बेजुबान जानवर कीड़े मकोड़े भी पेट भर ही लेते हैं बात तो तब है जब पूरी इंसानियत के बारे में सोचा जाये ..ज़ुल्मों के खिलाफ आवाज़ बुलंद की जाए ...डरना कैसा?...और डरें भी मौत से, जानवरों से नहीं बल्कि मर्दों से उनकी ज्यादतियों से ?जिन्हें किसी औरत ने ही पैदा किया है? पता नहीं अम्मी मेरी इस सफाई पर कितना एतबार रखती हैं लेकिन इतना ज़रूर जानती हूँ कि इस बहस में वो हर बार हारती हैं और बार बार जीत की गुंजाइश के बगैर हारती जाती हैं पर थकती नहीं !अपनी उम्र के इस सफर तक तक मैंने जितना भी सुना देखा पढ़ा और समझा उसमे सिर्फ एक कोशिश पर भरोसा कर सकी वो था मेरे इस प्रोफेशन का चुना जाना क्यूँ कि मेरा यकीन अब तार तार हो रहा था हुकूमत, मजहबी वादों –दावों,फिरकापरस्तों कानून सब पर, तब लोकतंत्र के इस चौथे खम्भे पर अपनी बची खुची उम्मीद की नज़रें गढा दी मैंने जो शायद मेरे यकीन का आखिरी पडाव था |मेरे लिए क्राइम रिपोर्टर की हैसियत से किसी अखबार में काम करना मेरा ख्वाब था मेरा पैशन |अम्मी भरोसा करो कि डरकर रहना किसी भी मुश्किल का सामना करने से अधिक खौफनाक होता है ..बुजदिली किसी अन्याय का तोड़ नहीं

27 जनवरी

मुझ जैसे ‘सिरफिरे’लोगों की हर सुबह एक नए जन्म की तरह होती है |कई बार जब सवेरे की चाय पीते हुए कुछ देर के लिए टी वी पर ख़बरें देखती हूँ उनमे मेरी मौत की कोई खबर नहीं होती तब ज़िंदा होने का यकीन पाती हूँ |हलाकि मै आम लोगों से थोडा अलग हूँ जिनके लिए मौत को सोचना या मौत का ख़याल मौत से भी खौफनाक होता है |सच कहूँ ..मुझे डर मौत से नहीं ज़िंदगी से लगता है अपंग और लाचारी से भरी ज़िंदगी ...

कोशिश करती हूँ कि दुनियां जहाँ के पचड़े और फितूर घर में लेकर न आऊं | मेरा ये चाहना मेरी अम्मी के प्रति मुहब्बत और फ़िक्र से करीबी ताल्लुक रखता है सो हमेशा मुस्कुराती दाखिल होती हूँ घर में लेकिन मेरी जान मेरी अम्मी ,मेरे साये को देखकर भी मेरी तबीयत का अंदाजा लगा लें! हम दौनों के बीच चाय एक राहत भरा सुकून है अम्मी जानती हैं कि चाय की चुस्कियां मुझे न सिर्फ अपने विगत से कुछ देर के लिए ही सही दूर कर देंगी बल्कि इनसे हम अपने अंदरूनी और बाहरी माहौल से रिश्ता सुकून से कायम कर लेंगे |

2 फरवरी ...

हम एक अजीबोगरीब वक़्त में जी रहे हैं | राज्य सत्ता ,कार्पोरेट सत्ता और माफिया संस्कृति इन सबने मिलकर वाकई एक आम आदमी का जीना दूभर कर दिया है ...ये एक आदमखोर सभ्यता है |

8 फरवरी ....

जब से मैंने उस दलित नाबालिग लडकी को भरे बाज़ार से उठाकर ले जाने और उसके साथ सामूहिक बलात्कार करने वाले उन तीन मशहूर लोगों की औलादों के खिलाफ मोर्चा खोला है उसकी तह तक जाने का फैसला किया है उसी की शिनाख्त करते हुए कसूरबार मुजरिमों को कटघरे में खड़ा करने की कसम खाई है ‘सर’ पर ही नहीं मुझ पर भी कई ‘रसूखदारों’ का दबाव बढ़ता जा रहा है| कई फोन आ चुके हैं |किसी ने धमकी दी है तो किसी ने मुंह मांगा पैसा देने की गुजारिश |ताज्जुब है ,क्या पैसा इतना क्रूर होता है कि लडकी की इज्ज़त और नाइंसाफी को भी सिरे से नकार दे..दरकिनार कर दे ?क्या उन लोगों को माँ बहन जैसे रिश्तों में यकीन नहीं ?या वो भी इनके लिए सिर्फ एक जिस्म हैं ?बलात्कार एक यौन विकृति है |बलात्कारी एक औरत के जिस्म का शिकार करता है और ऐसे पशु की नस्ल को हमें ख़त्म कर देना है |

आसिफ मुझे तुम पर भी आश्चर्य हुआ था सचमुच..जब तुम जो मेरे इस मुहीम के इकलौते तरफदार थे और कहते थे कि मुझे तुम पर फ़ख्र है हिना तुम और लड़कियों से बहुत अलग हो तुम्हारा यही ‘अलग’ होना मेरे दिल में तुम्हारे लिए इज्ज़त और मुहब्बत के लिए ज़िम्मेदार है ...खौफ बुज़दिली है!याद रखो ,डरपोक कौमें इन्कलाब नहीं करतीं लेकिन उस दिन तुमने कहा ’’ हिना ..देखो तुम लडकी हो |नहीं जानतीं दुश्मनी का मतलब वो भी मर्दों से| क्यूँ मर्दों के अहंकार को चुनौती दे रही हो तुम| मै ताज्जुब से देखती रही थी तुम्हारी तरफ आसिफ ..ये तुम कह रहे हो? सडकों,दुकानों ,मॉलों,बाज़ारों से लेकर ,अफसरों,वकीलों,दफ्तेरियों ,पुलिस चौकियों न जाने कितने घूमते फिरते लिज़लिज़े जीवों से अलग दीखते थे तुम मुझे| दहशतगर्जी और हैवानियत से फ़र्क चेहरा एक इंसान का ...एक जांबाज़ ...जो इन्साफ के लिए कुछ भी कर सकता है आसिफ तुम्ही तो मेरा हौसला हो जब सब मुझे पीछे धकेलते तुम कहते ‘’नहीं आगे बढ़ो...

जैसे जैसे धमकियाँ बढ़ रही हैं ,ताज्जुब है खौफ की जगह मेरे हौसले और बुलंद हो रहे हैं |मुझे बहुत अजीब लगा जब सर के पास एस पी ऑफिस से फोन आया कि उस सामूहिक बलात्कार वाले केस पर लिखना अब बंद होना चाहिए |इस तरह की ख़बरें जनता में रोष पैदा करती हैं विध्वंसक स्थितियां निर्मित होती हैं |मीडिया का काम माहौल को शांत करना है भड़काना नहीं ..’’इसके बाद उनकी चेतावनी थी ‘’यदि ये सिलसिला रोका नहीं गया तो कार्यवाही की जायेगी ‘’|सर ने मुझे बुलाकर ये पत्र पढवाया | मुझे ताज्जुब हुआ ‘’सर आपको नहीं लगता कि ये आदेश अभिव्यक्ति की आज़ादी का मखौल है ?मैंने कहा

नए नए अजीबोगरीब वाकये पेश आ रहे थे उन्हीं में से एक ये था जब सर जो निर्भीकता की सरेआम वकालत करते रहे हमेशा ,अब वो ही मुझे ‘’रोक ‘’ देने के लिए कह रहे थे बल्कि एहतियात के मद्देनज़र दूसरे सेक्शन में भेज देने का मंसूबा भी बना रहे थे ..ये कहकर कि हिना मै तुम्हे किसी खतरे में डालना नहीं चाहता |तुम एक लडकी हो वो भी अल्पसंख्यक समुदाय की तुम पर ख़तरा दोहरा है |’’

‘’सर मेरी फ़िक्र छोडिये सिर्फ मेरे एक सवाल का ज़वाब दीजिये| क्या वो पीडिता लडकी किसी रसूखदार और रईस बाप की बेटी होती तब भी हम ये बहस कर रहे होते ?या फिर वो अपराधी किसी सामान्य परिवार से ताल्लुक रखते तब ?....

सर कुछ देर सोचते रहे थे |पेपर वेट उनके हाथ में था जिसे वो गोल गोल घुमा रहे थे

‘’बात समझने की कोशिश करो हिना ...ये वक़्त बहस का नहीं

सर,ये अखबार आपका है आप मालिक हैं इसके ..आप जो फैसला लेंगे ... लेकिन मेरी आपसे यही गुजारिश है कि मुझे इस केस की सच्चाई लिखने दी जाए ताकि सच जनता के सामने लाया जा सके | ..इस दरिन्दगी के वाकये को आम और ख़ास सबकी आँखों के आगे से गुज़रना ही चाहिए |उन दरिंदों पर भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (बलात्कार का आरोप) का मुकदमा चल रहा है |देखें तो कितने लम्बे हैं आपके क़ानून के हाथ ?

‘’देखो हिना बात समझने की कोशिश करो |बहुत नाज़ुक मामला है ये |कुछ भी हो सकता है|तुम जानती तो हो कि अपराधी किस वर्ग और हैसियत से ताल्लुक रखते हैं ...इसीलिये मैं तुमसे ....

‘’नहीं सर ...लड़ने दीजिये उसे ..वो अकेली नहीं |और फिर जब सफर शुरू होता है तब आदमी अकेला ही होता है हुजूम तो बनता जाता है तब कितने और कहाँ कहाँ अल्प संख्यक होंगे और कहाँ बहु संख्यक इस सबका हिसाब किताब नहीं रखा जाता | हत्यारों ,गुनहगारों के चेहरे नहीं होते सर ना ही कौम वो सिर्फ दरिन्दे होते हैं और उन हमशक्लों का सिर्फ एक नाम होता है हत्यारे ...आसिफ ने मेरी हौसला अफजाई की तो मुझे बहुत राहत मिली |आसिफ तुम बहुत अच्छे हो बहुत नेक ...

19 फरवरी

कचहरी में उस पीडिता बच्ची को बुलाया गया सुनवाई के लिए |वो अपने वालिदेन के साथ वहां पहुँची |उस ने अपना बयान बदल दिया ‘’वो मेरा दोस्त था ..मै सहमती से गई थी उसके साथ ...उसके दोस्तों ने मुझ पर कोई ज्यादती नहीं की ‘’|केस लगभग सोल्व हो चुका था |मै इस लडकी के घर गई |मैंने उससे पूछा

‘क्यूँ किया तुमने ऐसा ?क्यूँ दिया गलत बयान ..जबकि उस दिन तुम्ही ने कहा था कि उन तीन ज़ल्लादों ने तुम्हे बुरी तरह नोंच खसोट डाला था| ये लोग तुम्हे मेले में से जीप में बिठाकर ले गए थे जबरन ?बच्ची ऑंखें झुकाए बैठी रही |

‘’मैडम आपके हाथ जोड़ रहे हैं हमें हमारे हाल पर छोड़ दो |वैसे भी अब बचा ही क्या है ज़िंदगी में?समाज में तो इज्ज़त रही नहीं |इस से भी अब कौन शादी करेगा बर्बाद हो चुके हैं| हम जानते हैं ये लेकिन घर के किसी सदस्य को मरता भी तो नहीं देख सकते ?इज्ज़त ऐसी चीज़ हैं इस देश में जो जब तक बची है खैर मनाओ जिस दिन चली गई उस दिन अफ़सोस ...बस हम जैसे लाचार गरीब लोगों के हाथ में अफ़सोस मनाना ही लिखा है’’उसके पिता ने कहा

‘’ जी आप बिलकुल सही फरमा रहे हैं लेकिन क्या आप नहीं चाहते कि अब इन कहावतों का अंत होना चाहिए ताकि आपकी पुश्तें ये नाइंसाफी ना झेलें ? हालातों के सामने हथियार डाल देना ये कैसी मजबूरी है...क्या इस झूठ का बोझ दिल पर रखकर ज़िंदगी भर खुद को माफ़ कर पाएँगे आप ?’’मैंने समझाने की कोशिश की लेकिन कोई फायदा नहीं था जानती थी ...इतिहास फिर दोहरा रहा था खुद को ...

वापिस घर लौटते वक़्त बहुत थकान महसूस कर रही थी मै ..

27 फरवरी

लोग पीछे पड़े हैं मेरे ..न जाने कौन लोग हैं वो?दिन रात फोन की घंटियाँ घनघनाती रहती हैं बुजदिल....डरपोक...जो अंधेरों की ओट में अपना कारोबार चलाते हैं दहशत फैलाते हैं | फोन पर सुनाई देने वाली हर आवाज़ मुझे इसी नाइंसाफी के जिन्न की आवाज़ लगती है ..|मै चाहूँ तो फोन बीच में बंद कर सकती हूँ लेकिन सुनना चाहती हूँ उन ज़ल्लादों के मंसूबे ..भाषा ..गालियाँ...धमकियां |उनमे सुनाई देती है मुझे आज़ाद भारत की सिसकियाँ |डेमोक्रेसी का मजबूर और रक्तरंजित चेहरा |...क्या हार मान लूँ ..क्या पीछे हट जाना चाहिए मुझे इस मुहीम से ?क्या मुझे भी शामिल हो जाना चाहिए उन दहशत गर्ज़ और कायर लोगों की ज़मात में जो ज़िंदा होने की गलतफहमी पाले मरे हुए लोग हैं ?जिन्होंने अपनी रूह इन गुनाहगार दरिंदों के हाथ गिरवीं रख छोडी है?नहीं ... मै हर ज्यादती और अन्याय का अंत तक पीछा करूंगी |वैसे आसिफ कहता है कि‘’जिस मीडिया की रोशनी में तुम आगे बढ़ रही हो उसका सच जानती हो?ये मीडिया रोबोट की तरह एक आत्मा रहित देह है |एक बहरा पथ प्रदर्शक जिसके सिर्फ ऑंखें और जुबां है | कितना चीखोगी इसके सामने तुम ?जब तक तुम एक वाक्य कहोगी मीडिया की हेड लाइन पर कोई दूसरी खबर चस्पा होगी ...|

5 मार्च

उफ़ एक के बाद एक दिल दहला देने वाले वाकये ....कभी कभी लगता है जैसे पूरा मुल्क गुनाहों और गुनाहगारों के शिकंजें में जकड़ चुका है ..आखिर कब ख़त्म होगा इनका सिलसिला ?मर्द की मर्दानगी का सबूत महज़ यही वारदातें रह गई हैं गोया

या अल्लाह ...ये दुनियां महज एक सुलगती हुई तीली की और मुखातिब है...आखिर कब तक इस उदास उकताई धरती पर ये ठंडा अँधेरा पसरा रहेगा?रोशनी सूर्य का पर्याय क्यूँ नहीं ..क्यूँ रोशनी का तिलिस्म ये तीली और उसके मुहाने पर लिपटा ये बारूद जानता है...कि अंधेरों का राज़ इस तीली में ही गुम है .... इस रोशनी के मायने सिर्फ लपट क्यूँ ,‘’उजाले’’ क्यूँ नहीं ?

बहुत ही जटिल हालात हैं सब कुछ उलझा हुआ |सच कहते हो तुम आसिफ |जब सब लोग खुद को खुश और तृप्त दिखा रहे हैं मुस्कुरा रहे हैं गैरकानूनी ज़रियों से कमा रहे हैं वो भी ...और भूख को परे खिसका पत्थरों पर अपनी किस्मत फोड़ रहे हैं वो भी... होठों को सिले सब जिए तो जा रहे हैं गिरते पड़ते फिर मै भला क्यूँ परेशान हूँ ?क्यूँ नहीं मै भी अपने क़ानून की तरह बहरी अंधी हो जाती ..बस अपने में मस्त |

15 मार्च

अम्मी कह रही हैं शादी कर लो ...आसिफ कह रहा है पहले तुम अपना ‘’भूत ‘’उतार लो समाज सुधार का तब निकाह करेंगे |लेकिन ये भूत कभी उतरेगा क्या ?अब समझ में आया कि क्यूँ इस देश की आधी से ज्यादा आबादी अनपढ़ और लाचार है?उन्हें क्यूँ गरीब और बे पढ़ बनाये रखना चाहते हैं ये हुक्मरान और ओहदेदार लोग ?इसी भूत से डरते हैं न?

21 मार्च

‘’मै मरना नहीं चाहती ...हलाकि ये देश रहने लायक तो क्या होशोहवास में जीने लायक भी नहीं रह गया है ...बावजूद इस त्रासदी के |लेकिन इनको हथियार सौंप देना निरी कायरता होगी...बुजदिली

आसिफ कहता है तुम जैसे लोगों को ‘’जुनून ’’ का कीड़ा काट लेता है |

मै हंसती हूँ ...वो भी,फिर कहता है कभी कभी मुझे लगता है खुदा ने हम इंसानों को गढ़ने के लिए जिस मिट्टी का स्तेमाल किया होगा ज़रूर ही हमारी मिट्टी कुछ अलहदा किस्म की रही होगी...शायद कुछ ज्यादा खुरदुरी और पथरीली

’’बिलकुल...सच है ये ..एक बात तो सोचो आसिफ ..मै कहती हूँ ,जिस मुल्क में ज़िंदगी मौत से ज्यादा खौफनाक और मौत ज़िंदगी से ज्यादा आज़ाद हो गई हो उस मौत से क्या डरना ...ऐसे नहीं तो वैसे आ जायेगी ? सडक पर छटपटाते हुए ,नदी में मुर्दा जिस्म की शक्ल में ,किन्हीं दीवारों के बीच,बन्दूक की किसी गोली में बंद ...फिर मुकाबला करते हुए मरने में क्या हर्ज़ है ?

आसिफ मेरी इस बात को हंसी में उडाता है कहता है ‘’मरना ही पड़े तो पूरी तरह न मर जाना जान ‘’और हम दौनों देर तक हँसते रहते हैं |

1 अप्रेल

आसिफ...कल तुमने मेरे जन्म दिन पर गुलाब भेजा था मेरे केबिन में ..सच बहुत खुशी हुई | तुमने कितने दिन की छुट्टी ली है प्रेस से ? सच कहूँ आसिफ कभी २ मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है ...इस भरी पूरी दुनियां में लगता है बिलकुल तनहा हूँ कोई अपना नहीं |जो ‘अपने’हैं वो अपनेपन से ज्यादा डरे हुए लोग हैं ...खुलकर ना मुहब्बत कर पाते हैं ना अपना जोर चला पाते हैं ...बेबस हैं बेचारे |हाँ मै अम्मी अब्बू की बात ही कर रही हूँ ..खैर छोडो ...आसिफ अब हमें अपने निकाह के बारे में सोचना चाहिए | ऐसा होना हमारी मुहीम को तेज़ और पुख्ता करने के लिए भी ज़रूरी है ....इंशाअल्लाह हम कामयाब होंगे’’

अचानक कुछ शोरगुल से मै डायरी के पन्नों से बाहर आ जाता हूँ |वही अस्पताल का प्राइवेट रूम ..

कमरे में दो औरतें और दो आदमी दाखिल हुए वो बेहद घबराये हुए थे |एक आदमी बूढा और एक अधेड़ ..एक औरत ने शलवार कमीज़ पहना हुआ था दूसरी जो पचासेक साल की थी ने बुरखा पहना था जो लडकी की माँ थी |

‘’हिना ...कहाँ है वो ‘’?

बूढ़े आदमी ने चिंतित स्वर में मुझ से पूछा

‘’ओपरेशन थियेटर में हैं अभी ‘’

कब आई ये यहाँ मेरा मतलब कैसे ?दूसरे आदमी ने पूछा |

करीब दो घंटे पहले ....आज़ाद नगर की पुलिया के पास ये बेहोश पडी थीं ..उनकी स्कूटर अब भी वहीं है ... ‘’मैंने कहा

बुजुर्गवार खामोश थे | उनके चेहरे पर दुःख और फ़िक्र की ताज़ी लकीरें उग आईं |

‘’ फोन पर कहा था इससे कि बाकी का काम कल कर लेना घर आ जाओ अब ....लेकिन वो नहीं मानी कहा कि कल तो ये न्यूज़ जानी ही है फ़िक्र मत करो अम्मी आ जाउंगी’’बूढ़ी औरत बिसूरते हुए बोली |

‘’पहले ही कहा था भाभीजान कि तालीम के फेर में ना पड़ो निकाह कर दो इनका जैसे हमने अपनी बच्चियों का कर दिया ....आजकल पढी लिखी लड़कियां ऐसे ही हाथ से छूट जाती हैं मनमानी करती हैं ‘’दूसरी औरत ने पहली को उलाहना दी

‘’ये कोई वक़्त है क्या आपा इस तरह की बातें करने का?दूसरे आदमी ने टोका

मै वहां से उठकर बाहर आ गया |

हलाकि उन लोगों के आ जाने से मुझे कुछ राहत ज़रूर मिली |बल्कि मन में ये भी आया कि अब तो ये लोग आ ही गए हैं मै चुपचाप निकल लूँ यहाँ से , लेकिन उस लडकी से कोई पूर्व परिचय न होने और बातचीत न होने के बावजूद न जाने एक कैसी आत्मीयता और श्रद्धा सी हो गई थी कि जाने का मन नहीं किया |उसकी फ़िक्रमंदी ने मुझे जाने नहीं दिया !हलाकि मै ये जानता था कि अब यहाँ से चले जाना मेरे लिए सुरक्षित निर्णय होगा पुलिस के झमेले जानता हूँ न

हज़ार सवाल करेंगे

‘’आप ही लेकर आये हैं उस एक्सीडेंट केस को यहाँ ..

..क्या नाम है लडकी का?

‘’आप पहले से जानते थे इन्हें ?

जब अपने इन्हें देखा सडक पर और कौन था इनके साथ ?

आपने पुलिस को फोन क्यूँ नहीं किया?

तब लडकी होश में थी या बेहोश?

यहाँ तक इन्हें कैसे लेकर आये ?

वगेरा वगेरा ... मरणासन्न लडकी को अस्पताल में पहुँचाने का शुक्रिया तो दूर मुझ पर ही अजीबोगरीब बेतुके सवालों की बौछार और शक ...नतमस्तक हूँ दुनियां के इस सबसे बड़े लोकतंत्र की न्याय प्रणाली पर ..

लडकी अभी भी ओपरेशन थियेटर में ही थी | मै वापस प्राइवेट रूम में आ गया लडकी के रिश्तेदार अब भी कमरे में थे बीच में नर्सों की अवा जाही बनी रही |वो लोग अपने अपने दिलों के हाहाकार को दबाये मौन बैठे थे |बुजुर्ग औरत अलबत्ता रह रह कर बिलखने लगती थी |बार बार फोन की घंटी बज रही थी और बुजुर्ग वार फोन लेकर बाहर चले जाते बाकी समय वो सर झुकाए कुछ सोचते रहते |

कभी कभी प्रतीक्षा भी कितनी उबाऊ और बोझिल हो जाती है !

मुझे मनहूसियत भरी बैचेनी सी होने लगी अतः मै कमरे से बाहर बरामदे में निकल आया |मैंने एक सिगरेट जलाई और वहीं टहल कदमी करने लगा |रात बढ़ रही थी |अचानक वो सीनियर नर्स दौडती हुई आती दिखी जो हिना को लेकर गई थी ओपरेशन थियेटर में वो घबराई हुई थी |.

‘’लिसिन ...उसने मुझ से कहा

जी कहिये

बाकी पेमेंट तो कर दिया गया है लेकिन ये कुछ इंजेक्शंस और टेबलेट्स लानी होंगी ...ओ नेगेटिव ब्लड का इंतजाम भी करना होगा स्टाक में कम है .ज़रुरत पड़ सकती है ..थोड़ा ज़ल्दी जाइए प्लीज़ |शी इज सीरियस ...उसकी घबराहट मेरी हताशा के बहुत करीब थी ’’नर्स जा चुकी थी |पर्चा मेरे हाथ में कंपकंपा रहा था |

शायद नर्स को नहीं पता कि लडकी के घरवाले आ चुके हैं खैर ...मै बाहर आ गया मुझे कुछ वक़्त लगा ये सब लाने में |जब वापिस लौटा तो सुबह अपनी आमद दर्ज करा चुकी थी हालाकि रात ने भी अभी अपनी चादर पूरी तरह समेटी नहीं थी |अस्पताल का कोरिडोर लोगों से भरा था | गहमा गहमी थी पत्रकार,फोटोग्राफर्स,रिश्तेदार,मीडियाकर्मी ...| कैमरों की पगलाई सी ऑंखें इधर उधर घूम रही थीं |उन्हें बिलकुल समझ में नहीं आ रहा था कि वो अपना फोकस उन गुस्साए नौजवानों के चेहरों पर करे जो तमतमाए हुए खडे हैं एक जुट में ,या लडकी के उदास रिश्तेदारों पर या फिर उन तमाशबीनों को रोशनी के घेरे में लें जिनके पास माइक लिए कोई एंकर किसी सनसनीखेज खबर का इंतज़ार कर रहा है |

एक खौफ की चिंगारी सी भीतर तक कौंध गयी ....यानी हिना अब .....?

मैं बहराया सा सीढियां चढ़ने लगा ..लिफ्ट मेरे दिमाग से अपना होना पोंछ चुकी थी उस ख़ास वक़्त में | लेकिन ये भीड़...?

एक मरा हुआ मनुष्य इस समय

जीवित मनुष्य की तुलना में कहीं ज्यादा कह रहा है

उसके शरीर से बहता हुआ रक्त

शरीर के भीतर दौड़ते हुए रक्त से कहीं ज्यादा आवाज़ कर रहा है

एक तेज़ हवा चल रही है

और विचारों ,स्वप्नों , स्म्रतियों को

फटे हुए कागजों की तरह उड़ा रही है

एक अंधेरी सी काली चीज़

हिंसक पशुओं से भरी हुई एक रात

चारों और इकट्ठा हो रहे है

एक लुटेरा ,एक हत्यारा ,एक दलाल

आसमानों ,मैदानों,पहाड़ों को लांघता हुआ आ रहा है

उसके हाथ धरती के मर्म को दबोचने के लिए बढ़ रहे हैं |(मंगलेश डबराल)

मै घबराया हुआ नर्सों के रूम की और लपका जहाँ वही सीनियर नर्स बैठी कुछ लिख रही थी

‘’सिस्टर ये मेडिसिन्स ...आपने मंगाई थीं ...मैंने पर्चा उसे दे दिया ..और ये ब्लड ...ओ नेगेटिव

मैंने अपने हाथ की कंपकंपाहट दिल तक महसूस की |’’यस यस ...’’नर्स ने मेरे हाथ से सब चीज़ें ले लीं |

हाऊ इज शी नाओ...मेरी आवाज़ मेरी धडकनों के साथ किसी अँधेरे कुँए में डूबती जा रही थी

नर्स कुछ देर वैसे ही लिखती रही ..मै ज़वाब की प्रतीक्षा में मानों सदियों से खड़ा था |मुझे लगा धरती कांप रही है ...पर बाद में महसूस हुआ वो मेरे पैर थे |

‘’तुम कह रहे थे तुम कोई नहीं लगते उस लडकी के ?’’नर्स ने पेन को रोक चश्मे में से मेरी और झांकते हुए कहा

जी ...कुछ भी नहीं ..मैंने कुछ अचकचाते हुए कहा

हुम्मम्म्म्म...उसने कहा |फिर चश्मा उतारते हुए मुस्कुराकर बोली ‘’कुछ देर में उन्हें आई सी यु में शिफ्ट कर दिया जायेगा ..यु कैन मीट हर इन हाफ एन अवर ...गुड लक

शुक्रिया ....मैंने बाहर आते हुए एक लम्बी सांस खींची जैसे किसी गहरी खाई तक आते आते अचानक खींच लिया हो किसी ने पीछे से |मुझे लग रहा था जैसे शरीर ये खुशी बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है | सचमुच मै बहुत थक गया था ...वहीं विजिटर्स सोफे पर बैठ गया |वहां से नीचे खड़े लोग दिख रहे थे जो जमा थे मैंने अंदाजा -

‘’वो औरतें और बुजुर्ग लडकी के रिश्तेदार होंगे

वो अपोजिट पार्टी के लोग ...वो मीडियाकर्मी....

वो दूसरे मरीजों के रिश्तेदार ....वो तमाशबीन

वो पुलिस अफसर ...वो नेता....वो अखबार का संपादक या मालिक

मै लिफ्ट से फिर नीचे उतर आया और भीड़ में से होता हुआ अस्पताल के बाहर लॉन में आ गया | जेब से विल्स का पैकेट निकाला एक सिगरेट निकालकर होठों में दबा ली लाइटर से उसे सुलगा मुलायम दूब पर टहलने लगा

सोच रहा था लडकी को होश आ जायेगा तो वो कैसे पहचानेगी मुझे ?उसे अपना परिचय ज़रूर दूंगा ...कहूंगा कि मोहतरमा आज आप जो मुस्कुरा रही हैं सिर्फ मेरी बदौलत| आई एम् प्राउड ऑफ़ यु हिना यु आर अ जेम ..तुम लाखों करोड़ों उन लड़कियों से बेहतर हो जो आसान और निरर्थक सी ज़िंदगी इन्हीं अन्यायों और ज्यादतियों को सहते हुए गुज़ार देती हैं ...मै उसका हाथ अपने हाथ में ले लूंगा |जीवन में न जाने कितनी तरह की लड़कियों से जान पहचान हुई ...स्कूल कॉलेज,नौकरी ,जलसों में | कुछ के साथ दिनों से लेकर महीनों तक प्रेम प्रसंग भी चले लेकिन अंतत खुद ही पीछे हो गया ...न जाने क्या चाहता था मै जो मुझे उन ख़ूबसूरत,बुद्धिजीवी,होशियार,अमीर लड़कियों में नहीं मिला?और आज ...इतनी नामालूम सी इस अजीबोगरीब मुलाकात में मुझे क्यूँ लग रहा है ऐसा कि तुम ही हो वो लडकी जिसे मैं दोस्त बनाना चाहता था ...!एक सुरसुरी सी मन में कौंध गई

तभी मेरी नज़रें गेट के पारदर्शी दरवाजे को लांघ भीतर की भीड़ का मुआयना करने लगीं

एक दुबला पतला लड़का जींस कुर्ता, गोरा रंग बेतरतीब दाड़ी चमड़े की चप्पलें पहने लोगों से घिरा खड़ा था |उसके बाल बिखरे हुए थे चेहरे पर एक शांत परिपक्वता भरा रोष था |वो लोगों से कम बातचीत कर रहा था और बार बार ओपरेशन थियेटर को जाने वाली सीढ़ियों की और देख रहा था ....

’’आसिफ....मेरे मुंह से निकला |आसिफ हिना का दोस्त ...

आसिफ उस भीड़ से निकलकर अलग जाकर खड़ा हो गया था और इधर उधर देखने लगा जैसे कुछ खोज रहा हो....उसकी ऑंखें छोटी पर सपनों से भरी थीं ...उसके चेहरे पर थकावट थी लेकिन उसके पीछे एक संकल्प और जिद्द दिपदिपा रही थी| वो अस्पताल के मुख्य द्वार पर आकर खड़ा हो गया था अकेला... उसकी नज़रें अब भी किसी को खोज रही थीं |मैं उसके ठीक सामने के लॉन में टहल रहा था सिगरेट पीता हुआ ..फिर उसने पास से निकलती दो एक नर्सों से कुछ पूछा ..मुझमे और उसमे कुछ फीट का फांसला था ..

मैं उसके पास से होता हुआ एक बार दुबारा सीढियां चढ़कर ऑपरेशन रूम के द्वार तक गया ...बंद दरवाजों को देख मुस्कुराया ...वहीं से मैंने मुस्कुराकर हाथ हिलाया ‘’खुदा हाफ़िज़ हिना .... सीढियां उतरते हुए पार कीं मैंने |कैमरामैन,फोटोग्राफर्स,पुलिसकर्मियों,अखबारनवीसों तमाशबीनों,अस्पताल कर्मचारियों आदि की भीड़ को चीरता हुआ तेज़ी से अस्पताल के मुख्य दरवाजे की तरफ बढा |आसिफ अब वहां नहीं था | मुझे लग रहा था हिना की थकी मगर मुस्कुराती ऑंखें मेरी पीठ से चिपकी हुई हैं और अस्पताल के मुख्य द्वार तक आकर मुझे शुक्रिया कह रही हैं ....मै तेज़ी से पार्किंग तक आया |

...कार स्टार्ट की और अस्पताल अहाते से बाहर मोड़ ली |

‘’फोन बज रहा था ..माँ का था ‘’कब आओगे घर ?सुबह होने को आई ..अभी तक काम ख़त्म नहीं हुआ क्या ?

‘’ख़त्म हो गया...लौट ही रहा हूँ ...माँ आज कुछ अच्छा बनाकर रखना ...मैंने कहा ...बहुत भूख लगी है

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