रात के दो बजे - ( रोहन उसकी बीवी सोनल और मैं उसके घर पर )

" कुछ पता नहीं चल रहा यार, माया ने अचानक से? दीपक को पता भी नहीं चला .. वो इतनी परेशां थी ..जबकी दोनों एक साल से एक साथ रह रहे हैं .."

" और .. मेरे साथ ही आई थी वो सुपर मार्किट ..लेकिन मुझे क्या पता था वो रेट किलर वो क्यों खरीद रही थी .. बिचारा दीपक ...मुझसे उसकी हालत ..."

" बहुत देर हो गई है ..चलो अब बकर बंद करो बे - मतलब की बातें.. मैं जा रहा हूँ सोने, सोनल " कहकर रोहन अपने बैडरूम में चला गया ..

उस रात मैं जब रोहन के घर से लौटा तो बहुत देर हो गई थी. करीब दो बजकर बिस मिंट हो रहे थे. रोहन ने रुक जाने को बहुत कहा लेकिन पीने के बाद मुझे बस सिर्फ मेरा बिस्तर दिखाई देता हैं. मैंने सोचा पंद्रह मिनट का रास्ता तो मैं यूँ चल लूंगा, डरता थोड़ी न हूँ किसी से ....

अभी दस मीटर ही दूर आया था... अभी भी पीछे रोहन के घर की बत्ती हलकी हलकी सी दिख रही थी. वैसे मैं डरता नहीं हूँ किसी भी चीज़ से लेकिन पता नहीं उस रात बार बार जी वापिस मुड़ जाने को कर रहा था ... रौशनी भी कम थी रास्तों पर ... और रोहन से मेरे घर का रास्ता एक छोटे से घने पेड़ो वाले चौराहे से होकर जाता था ...

नहीं करनी चाहिए थी माया की इतनी बुराई.. पता नहीं मुझे पीने के बाद क्या हो जाता है ..!! आखिर उसने ऐसा क्या किया था.... अभी भी समय है ... लौट जाता हूँ .. रोहन को बोल दूंगा की पैर में मोच आ गई है.. लेकिन मैं साला डरता थोड़ी न हूँ किसी से भी .. फिर बार बार क्यों माया का ख़याल मेरे दिल में आ रहा है ..

तभी दायीं और से पत्तों में कुछ फड़फड़ाहट हुई. मैं वही ठहर गया. पहली बार मेरे शरीर ने कम्पन महसूस की. मैंने चलना जारी रखा लेकिन अपने आप स्पीड मेरी काम हो गई थी. मैं जितनी तेजी से आगे बढ़ना चाहता था रास्ता उतना ही लंबा लग रहा था मुझे. उतनी देर में किसी के हंसने की आवाज मुझे सुनाई दी. और बस मेरे लिए अगर यह वहम भी था तो भी काफी था. एक पल भी सोचे बिना मैं रोहन के घर की और वापिस बढ़ चला .. कुछ देर बाद ज्ञात हुआ की मैं भाग रहा हूँ और हाफ भी रहा हूँ ...लेकिन क्यों ... रोहन के घर के बिलकुल बहार खड़ा हो गया मैं .. अगर अंदर जाऊंगा और पूछेंगे लोग.. तो साला डरता थोड़ी न हूँ किसी से... पीना ही नहीं चाहिए था इतना .. सब इसी की वजह से हो रहा हैं ...

पट्ट्ट्ट ... बीसी... अँधेरे से डर गया मैं ... नहीं हो सकता ऐसा ... और मैं दुगनी छाती से फिर मुड़ गया. उसको मेरी हिम्मत दिखाने, मैं और भी तेजी से बढ़ रहा था इसबार. फिर से पेड़ों के बिच पहुँच चूका था मैं. करीब 1000 मीटर दूर रोहन के घर से .. अब या तो इस पार या उस पार... दिखा ही देता हूँ बीसी... और अचानक से वो पीछे होने का एहसास हो गया ... आगे आ रही थी वो ... मेरे बराबर चलने लगी थी अब .. तभी जैसे उसने मेरे शर्ट की स्लीव को खिंचा हो वैसा लगा ... जैसे वह पहले किया करती थी .. कुछ भी बताना होता था तो मेरी शर्ट की स्लीव खिंचती.. मुझे बहुत अच्छा लगता उसका यह करना ... लेकिन अभी मेरी फटकर हाथ में आ गई थी ...

वही गिर पड़ा मैं .. आँखों में पानी भर आया था .. फिर से हिम्मत खो बैठा और रोहन के घर की और भाग दौड़ा ... इसबार जाते ही सीधे डोर-बेल बजा दी. थोड़ी ही देर में रोहन और सोनल दोनों दरवाजे पर आ खड़े हुए. सोनल फटी आखों से मुझे देख रही थी. मैं पसीने से लथबथ हाफ रहा था.. रोहन ने मुझे घर में ले जाकर दरवाजा अंदर से बंद कर दिया.

" क्या हुआ भाई , तू अचानक से ऐसे वापिस ?" रोहन ने सोनल को पानी लेने रसोई में भेजा.

" वो .. मैं ... वो ..."

मैं कुछ बोलूं उससे पहले ही मेरे नशे ने चमक दिखा दी. मेरी आँखे मुझे धोका दे दी. फूटफूटकर रोने लगा मैं रोहन के सामने... रोहन एकदम हक्काबक्का रह गया. गूंज उठी आवाज से सोनल भी दौड़ कर बाहर आ गई. और मैंने कुछ भी सोचे समजे बिना सबकुछ बता दिया, क्योंकि मुझे पता था की यह माया की ही साजिश थी मेरे मुह से सच उगलवाने की -

" रोहन ..सोनल ...मैं तुम लोगो का बहुत बड़ा गुनहगार हूँ. मैंने दीपक को जो सजा दी है उसका कोई प्रायष्चित नहीं हैं... याद है तुम दोनों को - उस रात, गरबे की आखिरी रात .. जब हम सब दीपक के घर गए थे ?? बस उसी समय की बात हैं .. दीपक मुम्बई था और हम सब देर रात तक बैठकर गप्पे मार रहे थे .. तुम दोनों थोड़ी देर में चले गए.. और मैंने ....मेरे से बहुत बड़ी गलती हो गई .. मैं माया को सच्चा प्यार करता था.. कभी कभी मुझे लगता की वो भी मुझे उतना ही चाहती हैं .. मुझे पता था की वह मेरे साथ खुश ज्यादा खुश है ...शायद उसको भी पता था ... उसके बात करने के तरीकों से मुझे यकीं हुआ था की बहुत ही जल्द कुछ आगे बढ़ेगा ... लेकिन उस रात.. मैं मेरा संयम गवा बैठा .. और और ...और.. मैंने ...मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई, रोहन भाई ... शायद यही वजह है क्यों माया ने कुछ भी बताये बिना आत्महत्या कर ली ... मैं उसका और तुम सबका गुनहगार हूँ , सोनल ... लेकिन मैंने कभी यह सब नहीं चाहा था ...मैंने सच्चे दिल से माया को मुहब्बत की थी .. लेकिन मैं स्वार्थी हो गया था .. मैंने दीपक के बारे में एक दफा भी न सोचा ..."

तभी मुझे लगा की कोई मुझे पिट पिट कर मार रहा हैं और अचानक से बारिश हुई ... मैं भीग गया और मुझे होश आया ... मेरे मुह पर किसी ने दारू फेंकी थी ..

" विपिन, क्या थोड़ा पीते ही तुम्हारी हालत टाइट हो जाती हैं !! हाहाहाहा... सही हैं इसका ... साला बेवड़ा ..." रोहन मटर चबाते हुए बोला.

दीपक माया को अपनी बाहों में लिए सबके लिए चौथा पेग बना रहा था ... रोहन और सोनल भी पेट पकड़कर हंस रहे थे ... पत्ते बटे हुए थे ... राउंड टेबल पर दारू पार्टी चल रही थी ...

" विपिन बाबु, कम पिया करो वरना अँधेरा छोड़ेगा नहीं ..." माया ने टेबल के नीचे से मेरे पैरो को सहलाते हुए वहीँ अदाओ से मेरी और देखा.

और मैं चुपचाप वहां से मेरी कार की चाबी लेकर अपने घर को निकल लिया .....








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