विषाल ने आखें खोलीं तो स्वयं को अस्पताल के बेड पर पाया । वह समझने का प्रयास कर रहे थे कि कहां पर हैं और कैसे यहां आये। विषाल ने मस्तिष्क पर जोर डाला तो उन्हे स्मरण हुआ कि जब वह सामान ले कर अपनी गाड़ी तक आने के लिये सड़क पार कर रहे थे तो उल्टी दिषा से आती बाइक ने उन्हे अचानक पीछे से टक्कर मारी थी और वह हवा में उछल गये थे ,उसके बाद क्या हुआ, यहां उन्हे कौन लाया ,उनकी पत्नी नीता को इस दुर्घटना का पता है कि नही आदि प्रष्न उनके मन में अनुत्तरित उमड़ने घुमड़ने लगे।
विषाल ने कुछ हिलने का प्रयास किया तो नर्स ने सिर उठा कर देखा और उसे होष में आया देख कर वह तुरंत डाक्टर को सूचित करने के लिये चली गयी। कुछ ही क्षणों में षुभ्र वस्त्रों में एक डाक्टर, उनके पीछे एक सहायक एवं वही नर्स अन्दर आये।डाक्टर ने पूछा ’’ सर आपको कैसा लग रहा है, कहीं दर्द तो नही है?‘‘
विषाल ने उठने का असफल प्रयास किया , तो एक टीस की गहरी लहर सी उठी और उनके मुंह से आह सी निकल पड़ी।डाक्टर ने कहा ’’उठिये नही आपको बहुत गहरी चोटें आयी हैं ,मल्टीपिल फ्रैक्चर हो गया है‘‘।
’’ पर मैं यहां कैसे आया‘‘?
’’ बस ऊपर वाले की कृपा है कि आप को समय पर कुछ भले लोग मेरे अस्पताल में ले आये नही तो इतना रक्त बह चुका था कि यदि कुछ देर और हो जाती तो आपको बचाना कठिन हो जाता । ‘‘
डाक्टर ने बताया कि उन्होने विषाल के मोबाइल में देख कर उनके घर पर नीता को सूचित कर दिया था।तभी किसी ने आ कर कहा ’’डाक्टर नवीन जल्दी चलिये बेड नम्बर पांच वाले मरीज की स्थिति बिगड़ती जा रही है वह बेहोष हो गया है‘‘।
डाक्टर तुरंत चले गये पर उस व्यक्ति के कहे षब्द विषाल के मन मस्तिष्क पर हथैड़े के समान पड़ रहे थे...नवीन......नवीन......नवीन!कहीं यह वही नवीन तो नही है ?फिर उन्होने अपने मस्तिष्क पर जोर डाला तो उन्हे विष्वास हो गया कि हो न हो यह वही है। वह व्यग्र हो गये, उनका मन पक्षी अतीत के आकाष में विचरने लगा ।
वह कक्षा ग्यारह एवं बारह में विज्ञान के अध्यापक थे। उस वर्ष के छात्रों में नवीन भी उनकी कक्षा में आया था। जब नवीन की परिचय देने की बारी आयी तो उसने बैठे बैठे ही धृष्टता से बताया कि उसका नाम नवीन है और वह इस कालेज के संस्थापक,निदेषक तथा षहर से सम्पन्न व्यवसायी सेठ कमलकान्त का बेटा है ,मानों यही उसकी योग्यता हो। विषाल को उसका यह रवैया अच्छा नही लगा पर पहली बार उन्होने उसे अनदेखा करना ही उचित समझा। विषाल सर उन लोगों में नही थे जो किसी की पृष्ठभूमि से प्रभावित हो कर अथवा दबाव में आ कर छात्र को महत्व दें ,उनके लिये छात्र की योग्यता ही उसको महत्व देने अथवा प्रषंसा करने का मापदंड थी।वह पढ़ाने के बाद अपने विषय पर प्रष्न करते और छात्रों के द्वारा गलत उत्तर देने पर उसे पुनः समझाते और तब तक समझाते जब तक उन्हे संतुष्टि न हो जाये कि सभी छात्रों को समझ में आ गया है।यही कारण था कि सभी छात्रों के वह प्रिय षिक्षक थे।
परन्तु नवीन की दृष्टि में वह मात्र उसके पिता के कालेज में काम करने वाले और उनकी कृपा दृष्टि पर जीवनयापन करने वाले एक साधारण षिक्षक थें।जब भी वह कक्षा में उससे कोई प्रष्न पूछते वह चुपचाप खड़ा हो जाता । विषाल यह सोच कर कि उसे कुछ समझ में नही आ रहा है उसे पुनः समझाने का प्रयास करते उसे और परिश्रम करने के लिये प्रेरित करते पर वही ढाक के तीन पात।अन्ततः विषाल सर ने उसे अलग से पढ़ाने का निष्चय किया। उन्होने एक दिन कक्षा समाप्त होने के बाद नवीन से कहा’’ तुम कक्षा समाप्त होने के बाद रुकना मैं तुम्हे अलग से समझाऊंगा‘‘।
उन्होने नवीन को अभी दो ही दिन पढ़ाया था कि कालेज के निदेषक कमलकान्त जी ने विषाल सर को अपने कक्ष में बुलाया। निदेषक महोदय के कक्ष में पहुचें तो उन्होने कहा ’’ मुझे पता चला कि आप कालेज के बाद छात्रों को निजी ट्यूषन पढ़ाते हैं ।‘‘ फिर वो बोले ’’वो तो नवीन मेरा बेटा है नही तो मुझे पता ही नही चलता कि मेरी नाक के नीचे क्या हो रहा है।‘‘
विषाल सर सकपका गये उन्होने कहा’’ नही सर मैने तो नवीन को कक्षा में समझ नही आता था इसलिये अलग से विषेष रूप से ध्यान देने के लिये पढ़ाना प्रारम्भ किया ,मैं उसकी कोई फीस नही लूंगा‘‘।
’’ अब बहाने मत बनाइये आप को पता चल गया कि आप की पोल खुल गयी तो कह रहे हैं कि फीस नही लेंगे ,ऐसे कोई बिना फीस के अपना समय गंवाता है क्या?‘‘
फिर रुक कर बोले ’’यदि नवीन को कक्षा में समझ नही आता है तो यह आप की कमी है ।‘‘ विषाल सर हतप्रभ थे ,निदेषक महोदय का व्यवहार देख कर वह चाह कर भी नवीन के बारे में कुछ नही कह पाये और चुपचाप बाहर आ गये।बाहर नवीन खड़ा था,उन्हे उसकी आंखों में व्यंग्य भरी मुस्कराहट स्पष्ट दिखाई पड़ रही थी ।
विषाल सर ने अपने सहयोगियों से इस बात की चर्चा की, तो उन्होने उल्टे उन्ही को चुप रहने की सलाह दी।
अपने सहयोगियों की बाते नवीन सर के गले नही उतर रही उनका निष्चय था कि चाहे जो भी हो मै अपने किसी भी छात्र का अहित नही कर सकता ,यदि वह गलत राह पर है तो उसे उचित मार्ग दिखाना एक षिक्षक का कर्तव्य है।
वह प्रायः ही नवीन से कक्षा में प्रष्न पूछते और उसके न बताने पर उसे डांटते।।परीक्षा चल रही थी नवीन खुले आम पर्चियें से नकल कर रहा था , विषाल सर ने उसे पकड़ लिया और परीक्षा देने से रोक दिया।
उस समय तो नवीन कक्षा से बाहर निकल गया पर जब वह कालेज से घर लौट रहे थे तो उन पर उसने अपने कुछ साथियों के साथ हमला कर दिया। विषाल सर लहूलुहान हो गये ,उन्हे बचाने उनके प्रषंसक कुछ छात्र आ गये, जिस कारण छात्रों में आपस में मारपीट हो गयी और बात बढ़ने पर पुलिस को बीच बचाव करना पड़ा।
अगले दिन जब विषाल सर कालेज गये तो उन्हे छात्रों में दंगा भड़काने के आरोप में निकाल दिया गया।सब जानते थे कि इसका असली कारण कुछ और है पर कोई भी बोल कर अपनी नौकरी से खेलना नही चाहता था।
आज भी विषाल को याद है कि किस प्रकार उस विषम परिस्थिति में ,जब उनकी पत्नी मां बनने वाली थीं ,पिता बुजुर्ग और बीमार थे तथा छोटी बहन के विवाह का दायित्व उनके कंधों पर था ,अचानक नौकरी छूटने से उन पर क्या बीती थी। कमलकान्त के प्रभाव और विषाल सर के हवा के समान तेजी से फेले अपयष ने किसी भी कालेज में उनकी नौकरी के द्वार बंद कर दिये थे।जब आर्थिक स्थिति उनके हाथों से बाहर हो गयी तो उन्हे वह षहर ही छोड़ना पड़ा था।
अब आज उसी उच्छृंखल नवीन को डाक्टर के रूप में पा कर वह आष्चर्यचकित भी थे और कहीं वह पहचान न ले इस भय से आषंकित भी।
उन्होने नीता से कहा ’’चलो अब घर चलते है ‘‘।
वास्तविकता से अन्जान नीता ने कहा ’’ अरे अभी घर कैसे जा सकते है अभी तो आप की चिकित्सा चल रही है‘‘।
’’नही नही अब मै ठीक हूं ,वैसे भी यह बहुत महंगा अस्पताल लगता है। हम किसी छोटे या सरकारी अस्पताल में चिकित्सा करा लेंगे‘‘ विषाल ने कहा।
’’ठीक है मैं डाक्टर से पूछ लूंगी ‘‘।
विषाल ने खीज कर कहा ’’तुम इसी समय चलो यदि डाक्टर से पूछोगी तो वह भला मरीज को जाने की आज्ञा दे कर अपनी आय क्यों गंवाएगा‘‘।
विषाल को बस यही चिन्ता थी कि अभी तो नवीन उन्हे पहचान नही पाया है पर कहीं नवीन को नीता ने उसका नाम बता दिया तब तो वह अवष्य ही पहचान जायेगा और तब न जाने वह किस प्रकार उससे बदला ले।
पर नीता तो डाक्टर को भगवान माने बैठी थी वह अड़ गई कि वह डाक्टर के बिना अनुमति के कहीं नही जाएगी।
तभी डाक्टर नवीन आ गये इससे पहले कि विषाल कुछ कहते नीता बोली ’’ डाक्टर साहब देखिये ये घर जाने की हठ कर रहे हैं ,इन्हे यह भय है कि हम यहां की फीस नहीं चुका पाएंगे‘‘।
नवीन ने मुस्करा कर कहा ’’आंटी आप चिंता मत करिये आपको कुछ नही देना है ‘‘।
फिर विषाल की ओर मुंड़ कर बोले ’’,सर लगता है आपने मुझे पहचाना नही पर मै जब आपको अस्पताल में लाया गया तभी पहचान गया था मैं आपका वही, उद्दंड छात्र नवीन हूं ‘‘।
विषाल को जिस बात का भय था वही हुआ ,उनका मुंह सूख गया,अब न जाने नवीन उनका क्या अपमान करने वाला है,वह मन ही मन सोच रहे थे।
तभी नवीन ने उनका पांव छूते हुये कहा ’’ सर आज मैं जो कुछ भी हूं आपके कारण ही हूं ।‘‘
विषाल ने उसे ध्यान से देखा कि वह व्यंग्य तो नही कर रहा है।नवीन बताने लगा ’’सर आपको मेरे ही झूठे आरोप लगाने पर मेरे पापा ने मेरे प्यार और विष्वास में अंधे हो कर कालेज से निकाला था।सच तो यह है कि उस समय मैं अपनी विजय और आपसे बदला लेने पर बहुत प्रसन्न हुआ । अपने पापा के प्रभाव के चलते मैं प्रयोग परीक्षा में अधिक अंक और लिखित में पास होने भर अंक से पास हो गया तथा धन के बल पर मेडिकल कालेज में प्रवेष भी पा गया, पर वहां की पढ़ाई और परीक्षा मेरे वष की नही थी ।‘‘
नवीन कुछ क्षण को रुका फिर गहरी सांस ले कर बोला’’ मैं साल दर साल फेल होता जा रहा था , धीरे धीरे मेरे मि़त्र और लड़कियां जो मेरे खुले हाथ से व्यय के कारण मेरे आगे पीछे घूमते थे मुझ पर व्यंग्य करने लगे।तब मुझे आप बहुत याद आये ,एक आप ही थे जिसने मुझे दर्पण दिखाने का प्रयास किया था नही तो मै अपने पिता के प्रभाव की धुंध में भ्रमित भटक रहा था और चाटुकारों को अपना हितैषी समझ रहा था।यहां तक कि मेरे पिता ने भी अपने प्रभाव और धन के दंभ में अन्जाने ही मेरे प्रति षत्रु की भूमिका निभायी।
एक दिन मेरे एक मित्र ने सार्वजनिक रूप से जब मेरा उपहास बनाया तो मै अति लज्जित हुआ, सदा दंभ से सिर उठा कर चलने वाला मैं, अपने अहम् पर चोट सह न पाया तथा सब ओर से निराष हो कर मैने आत्म हत्या करने की ठान ली ।पर पता नही मेरा अन्तर्मन जो आप को सही मानता था और मन की गहराइयों में कहीं स्वयं को आपका दोषी मानता था यह उस मन का भ्रम था या सच में आप मेरे स्वप्न में आये थे।आपने मुझसे अपना वही ब्रह्म वाक्य दोहराया कि ’परिश्रम ही सफलता की कुंजी है,प्रयास करते रहो हार न मानो, सफलता अवष्य मिलेगी‘। आप ने उस दिन मेरे अन्तर्मन पर दस्तक दी और पुनः पहले की ही भांति मुझे हार न मान कर पुनः प्रयास करने को प्रेरित किया।
अब विषाल की जान में जान आयी थी ,उन्होने पूछा ’’पर जैसा कि मैने इतनी देर में सुना और जाना तुम आज बहुत योग्य और सफल चिकित्सक हो ‘‘।
’’ वह दिन और आज का दिन मैने परिश्रम और लगन से मुंह नही मोड़ा़ ,परिणाम आपके समक्ष है ‘‘ कहते कहते नवीन का गला रुंध गया । विषाल सर की आंखों से भी निरंतर अश्रु बह रहे थे जो निष्चय ही आनन्द के थे। आज दोनो के मध्य गलतफहमी की दीवार ढह गयी थी ।


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