"क्यों री बहूँ...ऐसा क्या डालती है मेरे बेटे के खानें में जो रोज रोज उल्टियाँ करता हैंं। उसको मारना चाहती हैं क्या ?" हरकी गुस्सें में चिल्लाईं।

"कुछ भी तो नही ..माँ। वो तो मौनी के बापू का लीवर खराब है न ,इसलिएं उल्टियाँ कर रहा है" रमेसरी ने सफाई दी।

"..झूठ बोल रही है तुँ। अभी मैने खुद देखा तुझे कुछ मिलाते हुएँ ।सच सच बता नही तो अभी तुझे घर से निकालती हूँ " हरकी नें बहूँ को बालों से पकड़ कर खीँचा।

"नही माँ ऐसा मत करना , मैं बताती हूँ.."रमेसरी गिड़गिड़ाई।

"मैं डाक्टर बाबू से शराब छुडाने वाली पुड़ियाँ लेकर आई थी ।वही डाल देती हूँ उसके खानें में।जिससे वो शराब पीनें के बाद उल्टियाँ करता हैं।"

"अरें..उसके शराब पीने से तो मैं भी बहुत दुखी हूँ पर एक बार लत पड़ गयी फिर कहाँ छूटती हैंं ?" हरकी के स्वर नरम पड़ गये।

" कोशिश तो करनी ही होगी माँ ।मौनी का बापू अपनी सारी कमाईं शराब में उड़ा देता है और मैंं जो लोगो के घरों में काम करके

कमाती हूँ उसमें से भी छीन कर ले जाता है। घर खर्च तों किसी तरह चला लेती हूँ।पर मै बेटी को पढाना चाहती हूँ ताकि * कामवाली की बेटी कामवाली न बनें * इज्जत से जिंदगी जिएं ".रमेसरी सुबकने लगी।

.हरकी उठी और बहूँ का हाथ पकड़ कर बोली " तुम अकेलीनही हों.रमेसरी ।.अब मैं भी तुम्हारे साथ हूँ। मौनी को पढ़ाने के लिएँ जो कुछ

कर सकी , मै करूंगी।"

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