तृष्णा

जरूरी नहीं कि तुम पास रहो, मुमकिन नहीं कि तुम साथ रहो, पर जब चाहूँ ,तुम्हें जी सकूँ, बन कर ऐसी तलब,एक एहसास रहो ।

जरूरी नहीं कि तुम ना जाओ कहीं, मुमकिन नहीं कि तुम्हें पाऊँ हर कहीं, पर जब भी चाहूँ,तुम्हें ढूंढ सकूँ, बन कर वो जुस्तजू,वो तलाश रहो ।

जरूरी नहीं कि चलते रहे कुछ सिलसिले, फिर मुद्दतो के भी तो हैं ये फासले, दरिया नहीं,हाँ सहरा ही सही, महसूसते तुम्हें ही जान जाए,ऐसी प्यास रहो ।

दुआ नहीं,दर्द सही, दवा नहीं,मर्ज सही, जिसकी कोई मियाद,कोई मोहलत नहीं, ऐसी खलिश,ऐसी फ़ाँस बनो कर कोई जतन,दे कोई भरम, बस.................मेरे पास रहो ।

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