भोपाल से ट्रैन तेज़ रफ़्तार में चली जा रही है।उससे कही ज्यादा तेज़ मेरे विचारों की गति है।
कितनी मासूम शक़्ल और अक़्ल भी....
कितना तेज़ चौंकी थी जब मेरे बगल वाली सीट पर बैठी महिला ने कहा कि जीजी पूरे एक साल की सज़ा काटकर कल ही जेल से बेइल पर छुटी हूँ... आज अपने घर ब्यावरा जा रही हूँ।
एक बार मन मे अफ़सोस भी हुआ कि क्यों कुरेदा मैंने...!! लेकिन किसीको घंटो रोते देखकर मन थोड़े ही मानता है..!
केसरी : "एक चीटीं भी गलती से मर जाती तो कितना अफसोस होता था।".
किन्तु आज मने कोई अफसोस ना है।
मैं कुतूहलवश देख रही हूँ... निःशब्द..!
मेडम जी मारा हँसता-खेलता परिवार था। ससुरजी, मर्द,दो छोरा ने एक छोरी। मर्द मेहनत मजदूरी करता है और मैं खेती का काम। बोत अच्छे से नी पर गुजरान चल जाता था,खुस थे मैं लोग।
"फिर ऐसा क्या हुआ? केसरी ।
वा ठाकुर जल्लाद था। किसी रकम से समाधानी ना थातो।
"बोत परेसान करयो हमको मैडमजी।"
पर बात क्या थी?
बात क्या थी!! लालची रहयो, नीची नजर को भी। मारी थोड़ी-सी ज़मीन ह्वी।बस कांड की जड़ ज़मीन थी।
"ससरो ने जमीन देने को इनकार करयो हतो"।
इस पर तो ससुर ने निःवस्त्र कर्यो, मुँह पर कालिख पोती अने पीछे रस्सी से दोनों हाथ बांधी।पूरा गांव मे जूलूस निकलयो।
पाछे हमको गाँव से धमका के भगा दयो कि दोबारा इस गाँव मे दिखना नही।
केसरी आप लोगों ने पुलिस की मदद क्यों नही ली?
"क्या बोलूं मैडमजी सब मिली भगत हई।"
"पुलिस के कने गए थे,डाँट कर भगा दई।"
'ससुर भी सदमे में सिधार गए।'
मतलब। ?
मर गए मैडमजी. !!
कहकर सुबकने लगी।
सुनकर,मेरा मन भारी हो गया था। इतनी क्रूरता..!! थोड़े-से ज़मीन के टुकड़े के लिए..!!'
अंधेर है..!! सही तो है,चंद सिक्कों की खनक और चमक ईमान को बेच देती है। जल्लाद बना देती है।
खैर, सिस्टम है..!! किंकर्तव्यंमूढम...?
पहले तो हमसे कहा कि अपना पटटा हमे बेच दे। नही माने तो लालच दई। कैसे बेच देते ज़मीन? उसी से तो पेट भरता था। फिर डराना धमकाना शुरू किया। एक दिन तो रास्ते मे कहता है"केसरी क्या ग़ज़ब की कमर है रे तेरी। मेरी तो तन बदन में आग लग गयी मैन कही कमर मत ही नापी नहितो एक दिन मैं तेरा जीव नाप लूँगी। क्या पता था कि मेरी जीभ से भाखा हुआ सब्द सच्चा होइ जाएगा..?
केसरी फिर किसी अंधेरों में गुम हो जाती!! और बुदबुदाने लगती....
जल्लाद ने मोहे हत्यारिन बना दियो। इस बात पर ससरे ने कम्प्लेंट कर दी तो ....
फिर गहन सोच में डूब जाती है।
मैन फिर झंझोड़ा... तो क्या हुआ केसरी?
अरे आप सोच भी नि सकते। नियति भी क्या खेल रचती है? सुना है गलत कर्म का बुरा नतीजा। किन्तु इनका तो कोई ईमान धर्म ही नही प्रतीत होता!! जल्लाद भी कहलाने के लायक नहीं। ऐसा कुकर्म रूह तक काँप जाए,नींद कैसे आती होगी?
आश्चर्य होता है..!!
कितनी प्रताड़ना? एक आदमी को दूसरे आदमी द्वारा।
केसरी फिर बोलने लगती है और मेरे विचारों का सिलसिला टूट जाता है।
"मार्किट में साग भाजी लेने गयी थी।"
फिर पड़ोस में शादी भी हती तो ,थोड़ी सजी सँवरी भी थी।
"मने काहे कि खबर कि आज किस्मत मारे साथ इतना बड़ा खेल खेलन वाली है!!"
"मारे संगे गाँव की एक दो और औरतन भी उस दिन साथ थी।"
सब्जी खरीदकर घर जा रई थी कि आधे रास्ते में वा जल्लाद भिड़ गयो।
अपने मानसो नु बोल्यो ई छोड़ी ने पकड़ीं ल्यो।
आज तो ज़मीन लिखवा के छोड़ी हूँ।
फिर क्या मैंने वहाँ से भागना शुरू कर दिया। पर नी भाग पायी। पकड़कर एक गोदाम में लाई। वहाँ बंध कर दई।
फिर?
फिर क्या मारा घरवाला ने बोलावा गया। और मैं भागने के पक्के फिराक में थी। थोडीक वार में मैं भाग निकली। मंडी बाजू ...मंडी में घणी भीड़ हती। वहाँ वो जल्लाद भी पहोंची गयो। फिरसे मने धर लइ, अबकी बार बोल्यो,बहुत ताकत है न?
यही भर मंडी में तुझे बेइज्जत करूँगा। मैं बहुत डरी गई थी। वा मारी साड़ी ने हाथ लगाने गयो,वैसे ही मारी नज़र एक फावड़ा पर पड़ी। मैंने फावड़ा उठायो अने, इने कि चमकावा लागी। पन ई नशे में धुत..!! मेरी एक सुनवा तैयार नई। फावड़ों खेंचि मारि दई। ता तों वानी मुंडी अलग...!! पूरी मंडी में भागम भाग।
"मैं तो बेहोश हो गयी। होश आया तो सरकारी दवाखाने में थी।"
इतना कहते ही विलाप करने लगी।
और भी पैसेंजर हम दोनों को देखने लगे। फिर थोड़ा संभलकर, बुदबुदाकर विलाप करने लगी...मुओ मेरेको हत्यारिन बना गयो।मने पोलिस पकड़ के थाने ले गई।फिर वहां से भोपाल जेल में बंद कर दी गयी। दो साल तक जेल में कोर्ट में तारीख निकलती तब कोर्ट लाई जाती।एक बार तो जेलर ने कही कि अब कोर्ट क्यों ले जाते हो,सीधे सज़ा दे दो। जेलर बिना कछु कहे मुझे देखता रह गया।

मने तो बिल्कुल उमेद न थी कि अब कभी घर भेगी होउंगी। लेकिन उन सभी अच्छे लोगों के कारण,अब मैं अपने परिवार केसाथ रह सकती हूँ। बहुत दिनों से मन मे दबा कर रखा था। पर वकील भाई ने आपकी घनी प्रशंसा करी।
इसके लिए मैने सारी पेट की बात आपने बता दई। हाँ, केसरी अच्छा किया,कम-से-कम तुम्हारा मन तो हल्का हो गया।
वैसे तो कितना भी बड़ा दोषी हो,उसको मार देना...!!
मौत की सज़ा की, मैं हिमायती नही हूँ। लेकिन तुम्हे सुनकर,इतना तो कह सकती हूँ कि तुमने उस दरिंदे को जान से मारने के बारे में सपने में भी नही सोचा होगा।
तुम से निर्दोषतावश हो गया। तुम अपने आप को दोषी मत मानो।
और रही कानून की बात तो वो अपना काम कर रहा है।
पूरी ईमानदारी से उसका साथ दो। न्याय होगा..।
ये मेरा विश्वास है।
केसरी के मन का बोझ तो कम हो गया किन्तु अपने इर्दगिर्द पनप रहे, इस गुंडाराज से मेरा मन बोझिल हो गया। और अपना फोन नम्बर केसरी को देते हुए,मन ही मन ये तय कर लिया कि केसरी को सज़ा से मुक्त करवाना है।वो स्थितियों की शिकार मात्र है। लेकिन यह भी तो सच है....
'सर्वाइवल इज ध फिटेस्ट पर्सन इन ध वर्ल्ड'।
लेकिन सरवाइवल कौन वो दरिंदा या केसरी।
घर पहुँच गई थी किन्तु केसरी दिमाग मे से हट ही नही रही थी।

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