हयात शहर में आने से पहले मैं इतना संजीदा बिल्कुल भी नहीं था| होता भी कैसे मेरे पास वो सब कुछ था जो मुझे चाहिए था| पहला निशिथा और दूसरा मेरा डॉक्टर बनने का सपना, जो कि निशिथा की बदौलत था| निशिथा वह लड़की थी जिसके साथ मैने जीने - मरने के सपने देखे थे लेकिन वो अब बस निरा ख्वाब बनकर रह गयी थी| वजह- समाज के बंधन, जाति, गोत्र, जिनके अनुसार हम एक दूजे के लिए नही बने थे| डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए मैनें सम्राट पृथ्वीराज चौहान मेडिकल कॉलेज, हयात शहर चुना|

हयात शहर में अगस्त का महीना बड़ा ही खूबसूरत होता है| वजह है यहाँ के मौसम का मिजाज़| हयात शहर में जहाँ एक छोर पर थोड़ी सी बारिश में नदी-नाले उफान पर आ जाते हैं, तो वहीं दूसरे छोर पर पवित्र झील के उस पार दूर तक फैला सहरा पानी की एक-एक बूँद को तरसता रहता है| लेकिन पुरवई के ठंडे झोंके पूरे शहर को नसीब होते हैं|

हयात शहर में मैं सात सावन देख चुका हूँ, पर उस दिन मेरी हालत पस्त थी जब मैं यहाँ पहली बार आया था| एक तो अनजान शहर और उपर से रैगिंग का डर| दाखिले के बाद कॉलेज में मेरा पहला दिन भी कम नहीं भयानक था| कॉलेज के गेट में एंट्री करने से पहले से मेरा थप्पड़ों और घूसों से स्वागत हो चुका था| वो रैगिंग थी| थोड़ी देर बाद हम सब छात्रों को एनॉट्मी हॉल में इकठ्ठा किया गया| एनॉट्मी हॉल का नज़ारा और भी डरा देने वाला था| सामने टेबलों पर पाँच-पाँच मुर्दे लिटा रखे थे| साथ ही कुछ पंडे मुर्दों को तिलक लगाने,माला पहनाने और मंत्रोचारण में मशगूल थे| अगरबत्तियों का धूआं पूरे हॉल में फैला हुआ था| कुल मिलाकर वहाँ का माहौल किसी अघोर तंत्र साधना से कम नहीं था| जिस तरह से मुर्दों की आवभगत, कर्मकांड किए जा रहे थे, अगर एवज में कोई मुर्दा उठ कर शुकराना अदा कर देता, तो हैरत की बात नहीं होती|


खैर जैसे-तैसे मेरा पहला दिन बीता| पर शाम मेरे लिए और भी बड़ा सदमा लिए तैयार बैठी थी| मेरे एक दोस्त जिसके यहाँ मैने कुछ दिन रुकने का फ़ैसला किया था, उसने अपने यहाँ रखने से मना कर दिया था| शायद वो उँचे दर्जे के लोग थे| उस रात मैं अजमेर शरीफ रेलवे स्टेशन पर मुसाफिर खाने में रुका| पर तीन दिन में ही मेरी हालत ख़स्ता हो गयी| होती भी क्यूँ नहीं… जब सुबह-सुबह थप्पड़ों से स्वागत होता, फिर मुर्दों के बीच पूरा दिन बीतता और रात को रेलगाडियों की धड़ाधड़ चलती आवाज़ के बीच सोना जो पड़ता था|

चौथा दिन मेरे लिए सुकून देने वाला था| इसकी दो वजहें थी| पहली ये की मुझे सेवापुर रामभवन में रहने का ठिकाना मिल गया था, दूसरा विजय- मेरा पी.एम.टी. टाइम का दोस्त अब मेरे साथ था| उसने भी मेरे ही कॉलेज में दाखिला लिया था| हयात शहर में अब मेरा मन लगने लगा था पर निशिथा से अलग होने का ख़ालीपन अब भी मुझमें मौजूद था| विजय से मेरी कोई भी बात छुपी नहीं थी| मेरे जेहन के ख़ालीपन को वो भली-भाँति पढ़ पा रहा था| मेरे मन की नीरसता और निशिथा के ख़ालीपन को हल्का करने के लिए वो भी अब कोई-न-कोई पैंतरा आज़माने लगा था| आख़िरकार उसका पैंतरा बैठ गया| हमने हर वीकेंड शहर का एक हिस्सा घूमने का फ़ैसला किया| मैं भी उसके फ़ैसले से सहमत था| हमें हयात शहर की हर रग से वाकिफ़ होने का मौका जो मिला था| साल के अंत तक हम शहर के सारे हिस्से घूम चुके थे पर हम वीराना पसंद लोगों को शहर का कोई हिस्सा ख़ास पसंद नहीं आया था| हाँ, कभी- कभार हम बजरंगगढ़ की पहाड़ियों पर देर शाम जाकर बैठ जाया करते| पहाड़ी की तलहटी में शाँत दूर तक फैली आनासागर झील और चोटी पर स्थित बजरंगबली के मंदिर के घंटे की आवाज़ जहाँ दिल को सुकून देने वाली थी तो वहीं झील में उठती अशान्त लहरें निशिथा के ख़ालीपन को फिर से जगा देती|

दिन गुजरते गये| अब हमने फर्स्ट एम.बी.बी.एस. अच्छे नंबरों से पास कर ली थी| रिज़ल्ट अच्छा रहने की खुशी में उस दिन हमने शहर का बाहरी हिस्सा घूमने का फ़ैसला लिया| इत्तिफाक से हमें उस दिन हमारे मनमाफ़िक जगह मिल गयी थी | पवित्र झील| शहर के दक्षिण में पहाड़ी की तलहटी में| झील के किनारे फैले सफेद पत्थरों को देख कर मालूम होता था कि वर्षों पहले वहाँ मार्बल की खदानें रही होंगी| झील अभी भी आम लोगों की पहुँच से दूर थी| कारण-सामने उँची पहाड़ी और उस पार दूर तक फैले रेत के टीले, जो झील को अपने आँचल में छुपाए हुए थे| झील का पानी इतना साफ था कि तली में पड़े सफेद पत्थर भी उपर से साफ नज़र आ रहे थे| सहरा के उस पार से टकराकर आती हुई सूरज की किरणें झील के पानी पर गिरकर जादुई प्रभाव उत्पन्न कर रही थी|

पहाड़ी बिल्कुल शांत थी| बस इकके-दुक्के बड़े कंटीले पेड़ और बस नागफनियाँ ही नागफनियाँ| हमें और क्या चाहिए था, हम रोज वहाँ आकर डेरा जमा लेते| अब हमारा वहाँ एक और साथी बन गया था....रेत के सबसे उँचे टीले पर उगा सूखा रौन्झ का पेड़| विजय ने उसे "ग़रीब दोस्त" नाम दिया था|

हर बार की तरह उस शाम भी हम पवित्र झील के उस पार ग़रीब दोस्त के साथ बैठे हुए थे| मेरी भाव शून्य निगाहें सामने पहाड़ी पर जमी हुई थी| विजय ने मुझे ज्ञान देना अब भी नहीं छोड़ा था| "पाँच साल की बातें पाँच दिन में नही भूली जाती" हर बार की तरह मैने यही दलील देकर सिगरेट का लंबा कश मारकर आसमान मे छोड़ दिया| एक पल के लिए सिगरेट के धुएँ ने मेरे सामने का सब कुछ धुँधला कर दिया था लेकिन धुएँ का गुबार हटते ही मेरे सामने का दृश्‍य बदल चुका था|

सामने एक लड़की थी, सर पर पानी की मटकी लिए| शायद पवित्र झील के उस पार कोई कुआँ था|

हयात शहर में हमने लड़कियाँ तो बहुत देखी थी,पर वो.....|इतनी खूबसूरत लड़की मैने पहले कभी नहीं देखी थी| लहंगा ब्लाव्ज भी इतने सलीके से पहने थे क़ि......|बला की खूबसूरती थी उसमें|

"तुम्हारी बकरी खो गयी है?....जो पहाड़ी को इतने गौर से देखे जा रहे हो" उसने अल्हड़ सवालिया लहजे में पूंछा|

अचानक मेरा ध्यान टूटा| शायद मैं अभी भी निशिथा के शून्य मे खोया हुआ था|

"नहीं तो!!!!!..बस ऐसे ही पहाड़ी का नज़ारा कर रहे थे | मैने झिझकते हुए जवाब दिया|

वो मुस्कुराई और फिर मटकी लिए वहाँ से चली गयी| एक पल के लिए ही सही.....मैं उस वक्त निशिथा के शून्य को भूल गया था| शाम ढले हम वापस लौट आये|

दिन गुजरते गये| अब मैनें खुद को थोड़ा अध्यात्म की ओर मोड़ लिया था| धीरे-धीरे निशिथा का शून्य भर चला था| अब मैं प्री-फाइनल एम.बी.बी.एस. में पहुँच गया था| इन दो सालों में में काफ़ी कुछ बदल चुका था...मैं भी...हालात भी|

उस रात मैं और विजय हृदय रोग विभाग में ई.सी.जी. सीखने गये हुए थे| सीनियर डॉक्टर ने हमें आइ.सी.यू. में बेड न.14 के पेशेंट की ई.सी.जी. निकालने को कहा| बेड न. 14 के पेशेंट को देखकर मैं सन्न रह गया| पेशेंट कोई और नहीं...पवित्र झील पर मिली लड़की थी| विजय ने उसकी ई.सी.जी. निकली| ई.सी.जी फाइंडिंग और भी चौंकाने वाली थी| उसे हार्ट के वाल्व की बीमारी थी| शायद उसके वाल्व में छेद था|

"नाम क्या है तुम्हारा" मैनें पूछा

"अनामिका" उसने जवाब दिया

मैनें ई.सी.जी. में उसका नाम, बेड न. दर्ज करके सीनियर डॉक्टर को भिजवा दी|

"तुम पवित्र झील के पास वाले गाँव में रहती हो ना" मैनें पूछ ही लिया

"आपको कैसे पता?" उसने पूछा

दो साल पहले पवित्र झील के पास वाली पहाड़ी पर हमारी बकरी खो गयी थी| उसे ढूँढते-ढूँढते हम तुमसे टकरा गये थे| तुम्हारे सर पर पानी की मटकी थी तब|

उसे एकदम से हँसी आ गयी| शायद उसे उस दिन वाला वकिया याद आ गया था| उसके चेहरे पर वो अल्हाड़पन और मासूमियत अब भी बाकी थी|

"तो उस दिन...... आप ही थे" उसने चहकते हुए कहा|

"पर आप सिगरेट क्यूँ पी रहे थे"

"बिना काम की बातें बाद में पूछना...अभी तुम आराम करो....तुम्हारी तबीयत ज़्यादा खराब है" मैनें उसे थोड़ा डाँटकर चुप करा दिया और बाकी मरीजों की वाइटल चार्टिंग में लग गया|

मेरी आँखों के सामने अब भी दो साल पहले का अनामिका का सर पर मटकी लिए हुए.....दृश्य घूम रहा था|

थोड़ी देर बाद मैं वापस अनामिका के बेड पर आ गया| वो अभी तक सोयी नहीं थी|

"बॉस अपनी कोई नज़्म सुनाओ ना" पीछे से आवाज़ सुनाई दी|

मैं हैरान था कि ये बॉस किसने कहा क्योंकि एक जूनियर डॉक्टर ही अपने सीनियर डॉक्टर को बॉस कहकर संबोधित करता है| मैनें चौंककर चारों ओर देखा पर वहाँ अनामिका के सिवा कोई नहीं था|

"किसे ढूँढ रहे हो बॉस" उसने फिर पूछा|

मेरे आश्चर्य का कोई ठिकाना नहीं था|

" तुम मेडिकल स्टूडेंट हो? " मैनें पूछा

"हाँ" फर्स्ट यीअर में हूँ"

"अब बाकी बातें बाद में पूछना, पहले अपनी कोई अच्छी सी नज़्म सुनाओ" उसने थोड़ा मुँह बनाकर कहा|

"मुझे कोई नज़्म-वज्म नहीं आती" मैनें तोड़ा सख़्त होकर उससे मुखातिब होते हुए कहा|

"आप झूठ बोल रहे हैं ना? लास्ट यीअर आपकी नज़्म मैनें कॉलेज की मेगज़ीन में पढ़ी थी| लास्ट यीअर आपकी नज़मों की बुकलेट भी पढ़ी थी मैनें, अपनी किसी सीनियर से लेकर| बहुत अच्छा लिखते हो आप| " कहते-कहते उसने मेरी तारीफों के पुल बाँध दिए|

उसकी बातें सुनकर एक पल के लिए तो मैं अपने अतीत में पहुँच गया था| फिर खुद को तोड़ा संभलकर

"लिखता हूँ नहीं....लिखता था| एक अरसा बीत गया लिखे हुए| कलम थामते हुए...लिखते हुए हाथ काँपते हैं अब" कहते-कहते मेरे स्वर उदासी के समंदर में डूब गये|

पर वो कहाँ चुप रहने वाली थी| शायद चुप रहना तो उसने सीखा ही नहीं था|

"आप जैसे लोग ही अपना फन छोड़ देंगे तो हम जैसे दिल के मरीजों का क्या होगा| ले-दे कर ये ही तो चीज़ें बचती हैं हम जैसे दिल के मारों के पास, दिल बहलाने के लिए| "

उसकी आँखों में अब भी सवाल थे| मैं भी अपने अतीत में खो गया था| ऐसा भी वक्त था, जब नज़्म-ग़ज़लों के साथ मेरी सुबह, मेरी शाम होती थी| और सही तो कह रही थी वो....एक यही तो उद्देश्य होता है साहित्य का, जहाँ लिखने वाला अपना सारा दर्द, सारा बोझ कागज के सीने में उतार कर सुकून पाता है तो वहीं पढ़ने वाला उस साहित्य के आगोश में अपने दर्द को भुला देता है| मेरे मन में द्वंद्व मचा हुआ था| दूसरी ओर मुझे उसकी हालत पर भी तरस आ रहा था| एक तरफ जहाँ उपर वाले ने उसे जहाँ भर की खूबसूरती अता की थी तो वहीं दूसरी ओर उतना ही बेबस भी बना दिया था|

"अपने नज़्म लिखना क्यूँ छोड़ा बॉस" उसका एक और मासूम सा सवाल मेरे

सामने था|

"कुछ सवालों के जवाब नहीं होते" फिर कुछ सोचकर " ज़िंदगी में कभी-कभी कुछ अहम् फ़ैसले लेना ज़रूरी हो जाते हैं| अगर हम हमेशा अपने अतीत को पकड़कर बैठे रहें तो ज़माने के साथ कदम मिलाकर चल नहीं पाएँगे| और मैं अच्छे से अपनी पढ़ाई कर तो रहा हूँ" मैनें जोड़ कर अपना जवाब पेश किया|

"मैं आपसे सहमत नहीं हूँ!! हमारा अतीत कभी हमारे वर्तमान या भविष्य के आड़े नहीं आता बल्कि एक सेतु बनकर हमारा रास्ता बनता है| एक कलाकार अपनी कला के दम पर हर मुश्किल से उभर आता है| कला खुदा की नेमत होती है….हर किसी को नसीब नहीं होती|"

" और सिगरेट....यह कौनसा भविष्य है आपका? "

उसके पास मेरी हर दलील का जवाब था| मुझे उसकी समझ पर हँसी आ रही थी| भला इतना तो कोई अपना भी अपने बारे में नहीं सोचता|

रात के तकरीबन दो बज चुके थे|

"अब तुम सो जाओ| रात काफ़ी चुकी है| इन फालतू बातों के बारे में इतना मत सोचो" मैनें उसके हाथ पर हल्का सा हाथ रखते हुए कहा और उसे चादर ओढ़ा दी|

उसके बाद मैं और विजय जल्दी सुबह हॉस्टल आ गये| पर मेरे मन में अब भी घमासान मचा हुआ था| रह-रह कर उसकी बातें सीने के पार हो रही थी| कहीं भी तो मेरा फन मेरे भविष्य के बीच नहीं आया था| मैं खुद अपने अतीत को बहाना बनाकर खुद से भाग ही तो रहा था| मेरे अतीत का हर पल आज मुझसे जवाब माँग रहा था| कहते है " सर्द आहों से लाल खून भी जम जाता है" शायद यही हुआ था मेरे साथ| पहले निशिथा...फिर हादसा दर हादसा..मैं खुद को संभाल ही नहीं सका| जब अपने हालात से सामना नहीं कर पाया तो अपने फन को ही ठुकरा आया|

बहुत मलाल हो रहा था मुझे अपने किए पर|

अगले दिन मैं वापस हृदय रोग विभाग गया पर तब तक अनामिका वहाँ से डिसचार्ज हो चुकी थी|

मुझे अब कहीं भी चैन नहीं था| उस शाम मैं करीब दो साल बाद मंदिर गया....अनामिका की अच्छी सेहत क लिए ऊपर वाले से प्रार्थना करने| मंदिर जाने का सिलसिला अब रोज का हो गया था| मेरे हॉस्टिल के कमरे में अब अगरबत्ती की ख़ुश्बू महक़ने लगी थी | सिगरेट और चाय पर तो जैसे लगाम कस गयी थी|

करीब महीने भर में मैने खुद को पूरी तरह बदल दिया था|

एक दिन जब मैं हॉस्पिटल पोस्टिंग से लौट रहा था तो पीछे से किसी ने मुझे आवाज़ देकर रोका| मैनें पीछे मुड़कर देखा तो अनामिका सामने थी|

"हे!!! कैसी हो?" मैनें पूछा

आज वो पहले से काफ़ी कमज़ोर लग रही थी

" ठीक हूँ ".....ये आपकी नज़मों की बुकलेट...आपके काम आएगी" वो बुकलेट मेरे हाथों में थमा कर लौट गयी|

आज वो पहले से बिल्कुल अलग लग रही थी| पिछली दो मुलाक़ातों में मैने जहाँ उसे अल्हाड़पन और चंचलता से सराबोर पाया था, वहीं आज वो सादगी की मूरत लग रही थी| इस मुलाकात में उसने एक बार भी नज़र उठाकर नहीं देखा था| मुझे उसको "थैन्क यू" न बोल पाने का अफ़सोस था लेकिन अपनी ग़ज़लों, नज़मों की बुकलेट वापस पाकर मेरी मुश्किल आसान हो गयी थी| ये बुकलेट मेरी ग़ज़लों, नज़मों की उस डायरी की फोटोकॉपी थी जिसे आवेश में मैं जला चुका था|

अगली सुबह मैं कैंटीन पर बैठा चाय पी रहा था| शायद उस दिन मुझे अनामिका का इंतज़ार था| अनामिका ने कॉलेज के दूसरे गेट से एंटर किया और एनॅटमी पोर्च से होते हुए ऊपर चली गयी| इस बीच जो मेरे लिए ताज्जुब की बात हुई वो ये थी कि उसने कॉलेज की सीढ़ियाँ चढ़ने से पहले उन्हें छू कर प्रणाम किया किया था| अब मेरे लिए ये रोज का रुटीन हो गया था...कॉलेज से आते-जाते उसे ऑब्जर्व करना| मैं उसकी सादगी और संस्कारों का कायल हो गया था| यकीन नहीं हो रहा था कि....इतनी सादगी, इतनी शालीनता, इतने संस्कार, इतनी चंचलता....सिर्फ़ एक ही इंसान में, और वो भी उसमें जिसे ये भी नहीं पता कि अगले ही पल उसकी धड़कन उसका साथ देगी भी या नहीं|

ऐसे चलते-चलते सात महीने गुजर गये| मैने खुद को अब पूरी तरह बदल दिया था| कॉलेज से आते-जाते अनामिका से भी मुलाकात हो जाती थी| उसकी सेहत अब दिनों-दिन गिरती जा रही थी| उसके चेहरे पर भी अब पहले सी चमक नहीं रही थी पर उसकी सादगी और शालीनता ज्यों की त्यों बरकरार थी| उसके लिए मेरा मंदिर जाकर प्रार्थना करना अब भी बदस्तूर जारी था|

उस दिन शाम को मंदिर से आते वक्त विजय का मेसेज मेरे फ़ोन पर था|

"अनामिका हृदय रोग विभाग में एडमिट है"

विजय का मेसेज पड़ते ही मेरा मन किसी अनहोनी के डर से सिंहर गया| विजय की मेडिसिन पोस्टिंग कार्डियोलॉजी में ही लगी हुई थी|

मैं दौड़कर कार्डियोलॉजी पहुँचा| विजय अनामिका की वाइटल-चारटिंग में लगा हुआ था| अनामिका की हालत देखकर मेरा दिल पासीज रहा था| उसका फूल सा कोमल चेहरा ऐसे पीला पड़ गया था मानों खड़ी फसल को दावा मार गया हो| उसके सुर्ख गुलाबी होठ नीले पड़ गये थे|

"सब ठीक हो जाएगा" मैनें उसके हाथ पर हाथ रख सांत्वना देते हुए कहा|

मेरे हाथ के स्पर्श से उसके नीले होठ फूलों की पंखुड़ियों की तरह खिल उठे|

"नज़्म सुनाओगे? उसने काँपते होठों से धीरे से कहा| उसकी आवाज़ में आज एक अजीब सा ठहराव था|

मेरे हृदय का रूदन पलकों पर छलक पड़ा| मैं नि:शब्द था| एक यही तो चीज़ थी जिसे मैं अभी तक वापस हासिल नहीं कर पाया था| मैं बुत सा खामोश खड़ा रहा और फिर बिना कुछ बोले वापस हॉस्टल लौट आया| आज ना जाने क्यूँ मेरा ऊपर वाले से लड़ने का मन हो रहा था| इन सात महीनों में मैने जिस गति से खुद को सुधरा था, उसी गति से अनामिका की सेहत गिरी थी| मेरा दिल रो रहा था| पलकों से गिर रहे नमकीन पानी ने कब का कपोलों को भिगो दिया था, मुझे खबर भी नहीं थी| अनामिका का सारा दर्द मेरी आँखों में उतर आया| मैनें कलम उठाकर अपना सारा दर्द डायरी के कोरे पन्ने पर उतार दिया| हर्फ़ -दर- हर्फ़....सिर्फ़.... दर्द – ही - दर्द.....दर्द के सिवा कुछ नहीं|

मैं पन्ने को लेकर कार्डियो की ओर दौड़ा| पर अगले ही पल.....वहाँ का दृश्य देखकर मेरा शरीर ठंडा पड़ चुका था| बेड के बाजू में अनामिका की माँ बैठी रो रही थी| अनामिका को सफेद चादर ओढ़ा दी गयी थी| विजय डैथ रिपोर्ट तैयार कर रहा था|.......और........मेरे हाथों से नज़्म छूट कर गिर पड़ी थी|


*समाप्त*

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