मौसम में ठिठुरन बनी हुई थी। दोनों बच्चे और वन्दना भी खाना खाकर टीवी के सामने जम गए। कुछ लिखने का मन नहीं कर रहा था, मैं भी उनके साथ बैठ गया। उस समय ’भूतनाथ’ फिल्म चल रही थी। फिल्म के बीच में जब विज्ञापन जगत ने अपना वर्चस्व बढ़ाया तब बड़े वाले बच्चे ने पूछा- ’पापा! भूत होते हैं क्या? अगर होते हैं तो कैसे होते हैं? क्या अमिताभ बच्चन जैसे होते हैं...?’

एक के प्रष्नों का जवाब भी नहीं दे पाया की दूसरे ने प्रष्न किया -’ पापा! उस फिल्म में तो भूत कितना डरावना था, जो सबका खून पी गया। पापा, भूत क्या अलग-अलग किस्म के होते हैं ?’

बच्चों ने अपना भूत पुराण शुरू कर दिया था। बच्चे कहीं मन में वहम और डर न पाल लें, इसलिए उनकी जिज्ञासाओं को शान्त करना भी जरूरी था। मैंने उनका डर निकालने के लिए कह, ’भूत नाम की कोई चीज नहीं होती है, यह सब तो फिल्म बनाने वाले हमारे मनोरंजन के लिए एनिमेषन के द्वारा तरह-तरह की आकृतियां बनाते हैं। समझे बच्चों!’ ‘जी पापा।’

इधर फिल्म पुनः शुरू हो गई थी। सब ने अपनी नज़रें गडा लीं। पर मैं उठ कर बिस्तर पर आ गया। मैंने बच्चों को तो जैसे-तैसे समझा दिया, पर मेरा मन अतीत की उस घटना में चला गया जो वर्षों से जमी पड़ी थी मेरे मस्तिष्क में, जैसे गुलाब की पंखुड़ी दबी रह जाती है किसी बच्चे की किताब में। भूत नहीं होते हैं! तो फिर उस रात को वह क्या था? वह घटना मेरे लिए अब तक पहेली बनी हुई है। मुझे नींद नहीं आ रही थी। सोचा, अब कुछ लिख लूं।.......उस रात की घटना।

यह बात उन्नीसौ नब्बे की है। गांव से शहर तकरीबन दस किलोमीटर के फ़ासले पर था। पिछले दो हफ़्ते से शहर में मेला लगा हुआ था। मेले में कई तरह के झूले व हाट के साथ-साथ सर्कस भी आया हुआ था। सावन के दिन थे। सर्कस की खब़रें गांव में उड़-उड़ कर आ रही थीं। मुझे प्रेमचन्द की कहानी ’ईदगाह’ याद आ गई। गांव में बिल्कुल वही माहौल था, जो मेले को लेकर हामिद के गांव में था। फर्क इतना था कि वो कहानी आजादी के पहले की थी और यह घटना अभी गुजरे चौबीस वर्ष पूर्व की है।

गांव में वीरम मेरा प्रिय मित्र था। हम दोनां हम उम्र थे। शनिवार को ही हमने तय कर लिया था कि रविवार को मेले में चलना है। खेत से भी हम जल्दी घर लौट आए। घर के पास बाड़े में बंधे मवेषियों को चारा डालकर, मैं सात बजे तक खाना खाकर तैयार हो गया।

गांव में सभी लोग जल्दी खाना खाकर सो जाते थे, क्योंकि लाइटें कभी-भी जा सकती थी। और फिर मनोरंजन के नाम पर पूरे गांव में टीवी नाम की चीज एक ही घर में थी, प्रेमजी के घर में। वे पुलिस में दरोगा थे। अब न वे रहे न दरोगा। वहां पर भी एक ही चैनल आता था- दूरदर्षन। शहर की भांति ढे़र सारे चैनल देखने को नहीं मिलते थे। पूरे गांव की भीड़ वहां इकट्ठी हो जाती थी। उनकी पत्नी औरतों के बीच पैर पसारकर बैठ जाती थी। बच्चों में ’हम पंछी एक डाल के’ और बड़ों में ’रामायण’ धारावाहिक का क्रेज था। मैं और वीरम क्रिकेट के शौकीन थे। जिस दिन क्रिकेट आता बाकी सब लोग परेषान हो जाते और कहते कि यह खेल कितनी देर तक चलेगा। सब की अपनी-अपनी पसंद होती थी।

सांझ चारों और फैल चुकी थी, गांव के बीचो-बीच स्थित षिव मंदिर में नगाड़ों और मांदल पर पड़ने वाली थापें बंद हो चुकी थीं। सब कुछ शांत था, पर मंदिर प्रांगण में स्थित पेड़ पर बैठे मोर की पिऊऽ-पिऊऽ की ध्वनि बार-बार आ रही थी। रात उसकी यहीं गुजरती थी। दिन में यहां कठफोड़वा का अधिकार रहता था। वह दिन भर ठक्-ठक् करता रहता था। अंधेरा उगने ही वाला था। समय फुर्र हुआ जा रहा था। घर पर बापू को पता नहीं था। मां को बहला-फुसलाकर स्वीकृति ले ली। वीरम ने बताया कि पांच रुपये का टिकिट है, बीच में बैठने को मिलेगा। मां को थोड़ा और मसका लगाया तो, मां ने हांड़ी में हाथ डालकर एक-एक के दस सिक्के दो बार गिनने के बाद मेरे हाथ में रख दिए।

रात आठ बजे का शो था। उस वक्त आवागमन के साधनों की कमी और शहरी आबो-हवा के न छाने के कारण हमारे लिए गांव से शहर की दूरी ज्यादा थी। मैं और वीरम बड़ी उत्सुकता व विस्मय के साथ साइकिल से सर्कस देखने के लिए निकल रहे थे, कि बिजलियां चमकने लगीं। मुझे अंदेषा हुआ कि बरसात आ सकती है, सुविधा के लिए एक छतरी और दो सेल वाली बैटरी साथ ले ली।

’अरे मां! सुन, बापू पूछे तो कह देना वीरम के घर पढ़ने गया है। बारह बजे तक लौट आएंगे।’ बापू से स्वीकृति लेने का तो तब प्रष्न ही नहीं उठता था। यदि लेता तो, सर्कस वहीं शुरू हो जाता। ऐसे अवसर पर मां नाम का ब्रह्म अस्त्र ही काम आता है।

‘‘मां! कुंडी मत लगा देना। किंवाड़ अटकाकर रखना, मैं चुपके से आकर सो जाऊंगा।‘‘

हम दोनों निकल पड़े। वीरम अपनी मस्ती में साइकिल चला रहा था। हम मेले की रौनक और सर्कस के शेर तथा भालू की कलाबाजियों की चर्चा करते जा रहे थे।

‘‘क्यूं भुवन, सर्कस में इन जानवरों के सिवाय सुन्दर लड़कियां भी तो होती हैं। है ना! कैसे-कैसे करतब दिखाती हैं। अगर नीचे गिर जाये तो खत्म !‘‘

‘‘ऐसे कैसे गिर जाए, उनका रोज का काम है भाई।‘‘हम बातों में मषगूल थे कि अचानक एक सांप साइकिल के नीचे आ गया। वीरम घबरा गया तो साइकिल एक ओर गिर पड़ी। छतरी पहिए में फंस जाने से दो ताड़ी भी टूट गइंर्। दोनों के घुटने भी लाल हो गये। सांप मर गया था। मैंने उसे रोड़ के एक ओर वटवृक्ष के नीचे रख दिया। सोचा, कल दिन में आकर उसे जला देंगे।

मौसम सुहावना था। सिर पर आकाष उल्टे कटोरे के मानिंद लटक रहा था। जिसमें आज तारों की झिलमिल वाली छवि नज़र नहीं आ रही थी। ठण्डी बयार चल रही थी जो पेड़ों के पत्तों में सरसराहट उत्पन्न कर रही थी। बारिष कभी भी पड़ सकती थी। हम लेट होते जा रहे थे।

सांप की वज़ह से वीरम के चहरे पर डर की बूंदें जम गई थीं।

मैंने वीरम से कहा, ‘‘तुम पीछे बैठो, मैं चलाता हूं।‘‘

‘‘नहीं-नहीं, मुझे पीछे डर लगता है।‘‘

‘‘तो फिर आगे बैठो, पर जल्दी करो, देर हो रही है। और इतना भी क्या डरना, मैं हूं ना तुम्हारे साथ।‘‘

डर तो मुझे भी लग रहा था पर किसे बताता। डर ने साइकिल की रफ्तार बढ़ा दी। हम सर्कस शुरू होने के दस मिनट बाद पहुंचे, तब तक जोकर सब का मनोरंजन कर रहा था।

‘‘भुवन, अच्छा हुआ जो षेर और भालू का खेल नही निकला, वरना किए कराए पर पानी फिर जाता।‘‘ वीरम उत्सुक था शेर और भालू को देखने के लिए।

थोड़ी देर बाद जोकर अन्दर गया और अपने गले में सांप डाल लाया। वीरम सांप देखकर घबरा गया। जोकर ने सांप को हवा में उछाला तो उसकी लकड़ी की छड़ी बन गई। जिसके मुंह पर रंगीन फूल लगे हुए थे। मैंने कहा, ‘‘वीरम, यहां सब नजरबंद का खेल है, तुम सांप देखकर डरना मत, सब नकली है।‘‘

‘‘भुवन, अपने साथ कहीं कुछ गलत न हो जाए। वह सांप कहीं अपने से बदला तो नहीं लेगा ?‘‘

‘‘अरे! तुम भी ना। इस अंधविष्वास और डर को अपने अंदर से बाहर निकालो।’’

‘‘रात को वापस चलना ठीक न होगा। मेरी माने तो रात मेले में ही काट ली जाए। पौ फटने से पहले निकल चलेंगे।‘‘ वीरम ने कहा।

‘‘हां! निकल चलेंगे। बड़ा आया सुबह चलने वाला। मेरे बापू का लट्ठ देखा है? एक बार शुरू हो गए, सर्कस तो क्या मैं अपने आप को भूल जाऊंगा। अभी शांति से सर्कस देखो। वो देखो! तुम्हारे भालू और शेर दोनों आ गये।‘‘

वह जादुई छड़ी अभी तक जोकर के पास ही थी। वीरम की एक आँख उस छड़ी पर और दूसरी शेर तथा भालू पर टिकीं थी। कौतुहलपूर्ण तथा दिलचस्प कारनामें देखने को मिल रहे थे। शेर तथा भालू आपस में अठखेलियां कर रहे थे। दो लड़कियां रिंग और रस्सी के साथ हवा में अपना करतब दिखा रही थीं।

अचानक मेरी नजरें ऊपर की ओर उठ गईं। सर्कस को जिस कवर से ढककर तैयार किया गया था, वहां ऊपर एक छेद था। वहां से एक सांप बार-बार अपना मुंह निकाल रहा था। मैंने ऊपर की ओर नजरें थमाए रखीं। ध्यान रखा कि वीरम कहीं ऊपर न देख लें।

एकटक देखते रहने से सांप करीब-करीब मेरी आँखों के पास था। ऐसे, मानो मैं उसे हाथ से छू लूं। अगले ही पल उस सांप की जगह एक गौरवर्ण युवती का चेहरा प्रतिबिम्बित हुआ और पुनः खो गया। अब वहां सांप भी नहीं था और न ही युवती। अब तो मेरा भी डर गहरा होता जा रहा था। ऐसा लगा, जैसे मुझे किसी ने बर्फ की सिल्लियों से बांध दिया है, और मेरा शरीर गलता जा रहा है। मौत का साया ऊपर मंडरा रहा था। पर सोचा, वीरम को बताना उचित नहीं होगा।

अभी नौ ही बजे थे। जोकर के साथ वाला व्यक्ति मुंह से आग की लपटें निकाल रहा था। अचानक आग ने उस कवर को पकड़ लिया जिससे सर्कस की सारी जगह को ढका गया था। चारों ओर अफरा-तफरी फैल गई। हम तो सबसे पहले बाहर आ खड़े हुए। गनीमत तो यह रही की उसी समय बारिश ने अपनी दस्तक दे दी। आधे घण्टे तक जारी रही। आग बुझ गई थी, पर दस-पन्द्रह की टांगे जवाब दे गईं। बड़ी जन-हानि होने से बच गई। लेकिन एक गड़बड़ और हुई, जिसकी गूंज मेरे कानों में पड़ी, आग के डर से शेर तथा भालू भाग निकले।

अब क्या करें! सांप से पीछा छूटा भी नहीं कि ये दोनों भाग निकले। रात को कहीं रास्ते में मिल गए तो वे यह नहीं सोचेंगे कि हम सर्कस के पालतु जानवर हैं। एक मिनट में काम तमाम कर देंगे, हम दोनों का। पता नहीं, भूखे भी होंगे? मेरे मन में तो विचारों का अंबार लगा हुआ था। सोचा, यहीं रूक जाएं, फिर बापू का प्रकोप याद आया। एक ओर कुआं तो दूसरी ओर खाई वाला मामला था। अभी दस ही बजे हैं, निकल पड़ना ठीक होगा।

’’देख वीरम, अभी बारिष शांत है, तेजी से चलेंगे, आधे घण्टे में घर पर होंगे। तुम आगे बैटरी से रास्ता दिखाते रहना।’’

गांव आते वक्त हम उस जगह से कुछ ही फासले पर थे, जहां सांप साइकिल के नीचे आकर मर गया था, रिमझिम बारिष टपक पड़ी। मेरी नज़रें बारिष में रोषनी के साथ रोड़ पर जमी हुई थीं। अचानक एक सफेद पोषाक पहने युवती ने, जिसकी लम्बी केषराषि पीठ पर पड़ी हुई थी, हमारे सामने से रोड़ को क्रॉस किया। मुझे प्रतीत हुआ, जैसे-जैसे वो आगे जा रही थी; उसकी लम्बाई बढती जा रही थी। एकाएक वह वटवृक्ष में समा गई। मेरे कलेजे ने अपनी जगह छोड़ दी। वीरम की जुबान तालू से चिपक गई थी। हमारी घिग्घी बंध गई थी। हमने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा। तेज रफ्तार से घर आ गए। हमारी सांसे फूल गई थीं। घर आकर रजाई में दुबक गया, गठरी बनकर। पर आप सोच सकते हैं, क्या मुझे उस रात नींद आई होगी? इस घटना के बाद हम रात को वटवृक्ष की ओर तो क्या, चौपाल पर भी नहीं निकले......।

क्या वह भूत था ?, क्या वह चुडैल थी ? भूत और चुडैल इतने सुन्दर होते हैं? नहीं-नहीं, वह अवष्य ही कोई परी होगी, जो आसमान से आई होगी। कितना तेज था उसके चेहरे पर। उसने हमें नुकसान भी नहीं पहुंचाया। वह कोई परछाई तो नहीं थी ? हां, हो सकता है। सांप के डर से वहम की जो रेखाएं हमारे अन्दर घर कर गयी थीं, हमेंं बार-बार उसी का आभास हो रहा था। वह वटवृक्ष आज भी अपनी बाहें फैलाए खड़ा होगा। अबकी बार जब भी गांव जाना होगा, उस वटवृक्ष के पास रात को अवष्य जाऊंगा....।

’’भुवन! तुम अब तक सोए नहीं ? सब कुछ ठीक तो है, कोई परेषानी?’’

’’नहीं वंदना, तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था कि कब मैडम भूतनाथ से फ्री होकर आए....।

आज भूतनाथ ने मेरी स्मृति में जमी हुई झील की ऊपरी परत को तोड़ दिया था। खिड़की के बाहर झरता हुआ घना अंधेरा काली रात का अहसास करा रहा था, भीतर हमारे अर्न्तमन महक रहे थे। भोर का तारा गुरूत्वाकर्षण लिए मेरे स्नेह पाष में था।


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