वह विजय चौक पर व्याकुल खडा है। उसके सामने राष्ट्रपति भवन और पीछे इण्डिया गेट है।

उसके बायें-दायें बहुमँजिला इमारते है जिन पर राष्ट्रीय ध्वज फहरा रहे हैं। जहाँ तक उसकी दृष्टि जाती है चारों ओर दौडते वाहन और अपार भीड ही नजर आती है। इनमें से कौन दिल्ली वासी है और कौन बाहर से आया है यह जान पाना सरल नहीं है। किन्तु इस तेज रफ्तार विशाल जनसमूह को प्रत्यक्ष देख कर पहली बार दिल्ली गये भोले ग्रामीणों के हवाले से गाँव में सुनाए जाने वाले चुटकले ” अब तक तो दिल्ली खाली हो चुकी होगी।“ के सार तक वह सहज ही पहुँच गया और प्यास से शुष्क होंठों पर अनायास ही मुस्कान की लहर दौड गई।

उसने एक बार फिर इण्डिया गेट पर उचटती सी नजर डाली और रेल भवन के बस स्टाप की ओर बढ गया। जहाँ-तहाँ “ मशीन का ठण्डा पानी, दस पैसे गिलास ” की रेहडियाँ खडी हैं। “ देश की राजधानी में जब पानी तक मोल बिकता है, तो लोगों के खाने-पीने का क्या ठिकाना होगा? शायद ये चने-मूंगफली के खोमचे उसीलिए ज्यादा नजर आते हैँ। आठ ने के चने लो, एक गिलास मशीन का ठण्डा पानी पीओ और पैंट की पिछली जेब से कंघी निकाल सूखे बालों को संवार कर साहब बन जाओ।“ सोच कर ही उसका मन भारी हो गया। वह बस स्टाप पर ठगा सा खडा बस की प्रतीक्षा में कसमसाते लोगों को देखने लगा। कितनी विवशता है।

“ भाई साहब, कुतुब मीनार जाने के लिए यहाँ से बस मिल जाएगी क्या?” उसने हिम्मत करके एक साहब से पूछा।

“मालूम नहीं है भाई ।“ साहब ने लज्जित सा होते हुए विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया और फिर इस जटिल समस्या का समाधान जानने के लिए साथ खडे एक अन्य साहब की ओर आँखें उठा दी। किन्तु उसने भी बंद मुँह हँसने की क्रिया में मात्र होंठ फैलाकर सिर हिला दिया। शायद ऐसे निरर्थक प्रश्न पर शब्दों का अपव्यय उसने उचित नहीं समझा था। तभी एक बस आ कर रूकी और दोनों साहब उसमें सवार हो गये। वह अवाक खडा जाती हुई बस को देखता रह गया।

“क्यों भाई, यह मण्डी हाऊस कहाँ पडेगा?” एक ब्रीफकेस धारी अधेड ने उससे पूछा।

“किन्तु वह क्या बोले। वह तो स्वयं पहली बार दिल्ली आया है और अभी तक लालकिला और राष्ट्रपति भवन की दीवारों के अतिरिक्त केवल दौडते-हाँफते लोग ही देख पाया है।

“मण्डी हाऊस क्हाँ पडेगा ?” ब्रीफकेस धारी ने कुछ जोर से दोहराया।

“मुझे मालूम नहीं।“ उसने सहज भाव से उत्तर दिया।

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किन्तु अधेड ने उसे हेय दृष्टि से देखा और फिर अपना चश्मा ठीक कर दूसरी ओर देखने लगा। वह थोडा दूर जा कर खडा हो गया। कुछ सोच कर वह खोमचे वाले के पास गया और क्षण भर सोच कर बोला” भाई साहब, कुतुब मीनार जाने के लिए यहाँ से बस मिल जाएगी क्या ? ’

“भैया, किसी पढे- लिखे आदमी से पूछो तो ठीक रहेगा। हम तो नये आए हैं।“ खोमचे वाले ने उत्तर दिया।

“नये आए हैं और दुकान खोल कर बैठे हैं।“ उसने आश्चर्य से देखते हुए पूछा।

“भैया नये हीं हैं। चार साल मेंइतना ही जान पाए हैं कि इसे भोट कल्ब कहते हैं और उसे इण्डिया गेट। सामने के दफ्तर में चौकीदार साहब की मेहरबानी से रात काटने का जुगाड हो गया है।“खोमचे वाले ने निराश स्वर में कहा।

उसका मन करूणा से भर गया। कितना दुखी है बेचारा खोमचे वाला। क्या यहाँ लोगों ने सिर्फ रात काटने भर का जुगाड किया है? निराशा में उसकी आँखें संसद भवन के ऊपर अटके सूर्य की ओर उठ गई। दोपहर ढलने लगी थी। वोट कल्ब पर पुलिस की कई लारियां आकर रूकी और देखते ही देखते

चारो ओर खाकी वर्दियों का आतंक छा गया।

शायद कुछ लोग किसी व्यक्ति विशेष का जलसा करने अथवा उसका जलूस निकालने की तैयारी कर रहे थे। एकाएक वह खोमचे वाले को उसके भाग्य पर छोड कर फीछे मुडा और सामने खडी बस में चढ गया। बस के माथे पर “ जन्तर-मन्तर” की पट्टी लगी ती।***


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