पगला रसिक

कड़कती ठण्ड का मौसम था। शाम होते ही सड़कों पर अपनी ज़िंदगी बसर करने वाले सिर छुपाने की जगह तलाशने लगते थे। इधर -उधर कोई कोना ढूंढना उनका रोज़ का काम था। वह पगला पिछले दस दिनों से पनवाड़ी हरिओम के रहमो करम पर था। रात होते ही वह उसके पान, सिगरेट के खोखे के नीचे अपनी गुदड़ी में लिपट कर सो जाता था। गुदड़ी में एक लावारिस सड़क छाप कुत्ता भी अक्सर आ दुबकता था। उस दिन सुबह करीब दस बजे जब हरिओम अपनी दुकान खोलने आया। चारों तरफ धुंध छाई हुई थी। तब दोनों पगला और कुत्ता एक -दूसरे का साथ देते हुए चैन से सोये हुए थे। उसे इतनी देर तक सोता देख कर हरिओम बिदक गया। पैर से ठोकर मारता हुआ बोला।

"चल उठ बे .....बाप…कब तक सोएगा? कतई नेस्तीपना फैला रखा है। कितनी बार समझाया है तुझे दुकानदारी शुरू होने से पहले यहाँ से अपना बोरिया -बिस्तर समेट लिया कर।" पगला थोड़ा सा कसमसाया और ठण्ड से गुदड़ी में और ज्यादा सिमट गया।

"ऐसी नींद लोगों को डनलप के नरम गद्दों पर भी न आए। जैसी बेफिक्री की नींद में पट्ठा यहाँ सोया रहता है।" बुदबुदाता हुआ वह एक लात कुत्ते के भी जड़ देता है। कुत्ता कूँ -कूँ करता हुआ फ़ौरन वहाँ से भाग जाता है। परन्तु पगला अपनी आँखे मलता और अलसाता हुआ ऐसे अंगड़ाई लेता है जैसे उसने पूरी रात किसी ख़ास कार्य को अंजाम देते हुए तमाम कर दी हो। और अब जैसे ही आँख लगी तो ये पनवाड़ी आकर सिर पर बैठ गया। वह अपने चीकट बालों को खुजलाता हुआ चीथड़े कोट और गले में पड़े फटे स्वेटर को सहला लेता है। गोया देख रहा हो सब कुछ अपनी जगह पर ठीक से है या नहीं।

"ओए रसिक खबरदार......कल से यदि तू मुझे इस वक्त यहाँ पर सोते हुए नज़र आया न तो कहे देता हूँ, फिर नहीं सोने दुँगा। आगे से अपना जुगाड़ कहीं और ढूंढ लेना। कमबख्त दया का तो ज़माना ही नहीं है। पागल समझ कर ज़रा सा हमदर्दी क्या दिखाई कि लगे लोग सिर पर नाचने।" हरिओम पगले पर फिर गरजा।

पगले को उसकी धमकी का कोई फर्क नहीं पड़ा। वह उसी तरह धीरे -धीरे उठा और एक ओर को ऐसे चला गया मानो उससे किसी ने कुछ कहा ही न हो। वह किसी से एक भी शब्द कहता- बोलता नहीं था। ज्यादा समय वह सुध - बुध खोया हुआ अपनी ही दुनिया में मगन रहता था। इसीलिये हरिओम ने दयावश उसे रात को अपने खोखे के नीचे सोने के लिए आश्रय दे दिया था। वर्ना चौकीदार उसे कब वहां रहने देता। डंडा मार कर भगा नहीं देता।

मुँह खोलने के नाम पर पगला सिर्फ गीत गाता था। वो भी गर्दन हिलाता हुआ मधुर आवाज में और खूब रस लेकर। यही देख कर हरिओम ने उसका नाम रसिक रख दिया था। वर्ना पगला कहाँ अपना नाम बताने लायक होश में था। दुकान पर पान, सिगरेट के लिए आने वाले नियमित ग्राहक भी उसको इसी नाम से बुलाने लगे थे। हरिओम की यह दुकान, रात करीब बारह बजे तक खुली रहती। जब उसके सामने के ग्लोब सिनेमा हॉल में रात का आखिरी शो छूटता और लोग पान, सिगरेट आदि लेते हुए घर चले जाते थे। तब हरिओम रात की ड्यूटी वाले चौकीदार को उसका कोटा सिगरेट और पान का थमा कर दुकान बढ़ा लेता। ऐसे ही लेन - देन से चलती है दुनिया। चौकीदार न देखे तो चोर कब का उसके खोखे को बेच खाएं। पनवाड़ी के वहाँ से जाते ही आस -पास मंडराता हुआ पगला जल्दी से उसके नीचे अपनी गुदड़ी में लिपट कर पसर जाता था।

कुछ दिन पहले धुंध भरी एक सुबह पगला अपने चिथड़े कम्बल में लिपटा हरिओम के पान -सिगरेट के खोखे के आगे सिकुड़ा बैठा था। आँखें बंद किए, दीवार से टेक लगाए हुए। बढ़ी हुई दाढ़ी, महीनों से नहीं नहाया हुआ बदन। चीकट बालों और फटे कम्बल वाला बदहाल आदमी। उससे पूछे गए सारे सवालों के उत्तर उसने सिर्फ मौन रख कर अपनी हैरान आँखों से दिए थे। उसके चेहरे पर ऐसा न जाने क्या भाव था कि हरिओम को उस पर रहम आ गया। दुकान खोलने और धूप बत्ती करने के बाद उसने एक पाँच का सिक्का पगले की तरफ उछाल दिया था।

उस समय पागल चुपचाप सिक्के को लेकर कहीं चला गया था। देर शाम को जब वापस आया तो उसी जगह पर फिर बैठ गया। वहाँ से वह चुपचाप बिना किसी बात का जवाब दिए खोजी निगाहों से इधर -उधर हर आने -जाने वाले को देखता रहता था। शहर में सुधाकर मास्टर जी की सभी बहुत इज्जत करते थे। कोई भी मुद्दा उनके राय -मश्वरे के बग़ैर हल नहीं होता था। पगले पर संदेह करते हुए सुधाकर मास्टर ने हरिओम को दुनियादारी समझाई।

"हरिओम भाई ये जमाना है क्या किसी पर दया करने का? जब कहीं फंस जाओगे तब पता चलेगा।"

"मास्टरजी कह तो आप सही रहे हैं। परन्तु इसकी शक्ल और आँखों की चमक की तरफ तो देखो। कितनी सरलता और उम्मीद दिखती है इन आँखों में कि बस अच्छे -अच्छों का मन पसीज जाए।" हरिओम दुविधा में पड़ कर असमंजस के साथ बोला।

"अब जैसी तुम्हारी मर्ज़ी भाई। समझाना मेरा फ़र्ज़ था। अपना भला -बुरा तुम खूब समझते हो।" मास्टरजी ने गहरी सांस ले कर कहा।

"अरे हरिओम भाई ये क्या मुसीबत पाल ली है? अब कोई भरोसा है इन लोगों का? न जाने इस भेष में कौन है, कहाँ से आया है? अरे इसे पुलिस को सौंप दो, सारा झमेला ही खतम हो।" श्याम भाई उसे सिगरेट के पैसे पकड़ाता हुआ बोला।

"जाने भी दो श्याम भाई......तुम तो जानते हो न, पुलिस शक के आधार पर बेमतलब इसका जो हाल करेगी। ये कुछ परेशान थोड़े ही कर रहा है हमें। पड़ा रहेगा कुछ दिन, फिर चलता बनेगा। इतनी ही इसे अपनी सुध होती तो किसी काम- धंधे से न लगा होता?" हरिओम दया से बोला।

पहली बार जिस दिन पगला उसके खोखे के पास बैठा था। उस दिन पनवाड़ी की इतनी ज्यादा बिक्री हुई कि उसे बहुत आश्चर्य हुआ। हनुमान भक्त हरिओम ने इसका श्रेय पगले को दे दिया। उसने रात दुकान बढ़ाने से पहले पगले की तरफ देखा। वह सड़क के एक कोने में ठिठुरता और ठंडी हवाओं के थपेड़ों से उलझता हुआ बैठा था। हरिओम ने उसे उठाया। एक सिगरेट थमाई और उसे अपने खोखे के नीचे की थोड़ी सी जगह पर सोने के लिए कह दिया। उसका खोखा दो तरफ से अन्य छोटी दुकानों से घिरा हुआ था और पीछे से उसमें पहाड़ी की आड़ लगी थी। उसने सोचा इसके नीचे रहने से ये कमसकम सरसराती ठंडी हवा से काफी हद तक बच सकता है। तब से अब दस दिन होने को हैं पगले का रात सोने का ठिकाना वही था।

धीरे- धीरे दूकान पर आने वाले पान, तम्बाकू और सिगरेट के नियमित ग्राहक भी उस पगले को पहचानने लगे थे। वे उसे पसंद भी करने लगे थे। गीत गाना एक ऐसी कला है जो सभी को बाँध कर रख देता है। लोग पगले से रोज़ ही कई सवाल करते परन्तु वह उन पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देता था। परन्तु रात होते ही न जाने उसमे इतना उत्त्साह कहाँ से आ जाता था, कि लोग उससे गाने की फरमाइश करते और वह खुशी से तान छेड़ देता। गाना, शब्द उसे खूब समझ में आता था। इस शब्द के कानों में पड़ते ही उसकी आँखों में चमक दिखाई पड़ने लगती थी।

कभी....'बिन बदरा के बिजुरिया कैसे चमकी....' गाता हुआ मस्ती में अपनी गर्दन हिलाता था तो कभी 'सजनवा बैरी हो गए हमार......' का दर्द भरा नगमा सुनाता हुआ मायूस हो जाता था। ऐसी रसीली तान छेड़ता कि सब मंत्रमुग्ध हो जाते। धीरे -धीरे वहाँ पर शामें संगीतमय होने लगी। रंग जमने पर कई और सुर उसके सुर में जुड़ जाते थे। और सभी मस्ती में गाते, बजाते थे। इससे पनवाड़ी की बिक्री बट्टा खूब बढ़ने लगा था।

सिगरेट, तम्बाकू एक ऐसी लत है कि लाख चेतावनी के बावजूद भी कोई नहीं समझता। ये शौक नहीं छोड़ पाता। गज़ब का नशा है इसका। मौत को आमंत्रण देना मंज़ूर है परन्तु इन व्यसनों को अलविदा कहना नहीं। हरिओम के इस अड्डे पर कई तरह की बातें होती रहती थीं। अमूमन ऐसी पान -सिगरेट की दुकानों पर हर तरह के लोग आते हैं। हर तरह की बातें हुआ करती हैं। राजनीति की, गाँव -देहात की, दंगे -फसाद की, पुलिस की, आतंकवाद की, सरकारी महकमे की, रिश्वत की, साजिशों की, इश्क -मोहोब्बत की और अत्याचारों आदि जैसी कई बातें।

जब सब बातों का आनंद लेते तब पगला रसिक अपने गंदले, चीकट बढे और बुरी तरह उलझे हुए बालों को खुजलाता, बदन के कपड़ों से जुएँ बीनता और ज़मीन पर लकड़ी के टुकड़े से आड़ी -तिरछी लकीरें खींचता था। कुछ हिसाब लगाता हुआ सा वह अपने आप में इस क़दर मगन रहता था जैसे दीन -दुनिया से, और अपने आस -पास से उसे कोई लेना -देना ही नहीं हो। कभी उसके चहेरे पर लम्बी रहस्यमयी मुस्कान तैर जाती तो कभी माथे पर ढेरों बल पड़ जाते। कभी वह उस सड़क के लावारिस कुत्ते को सहलाते हुए रो पड़ता था जो रोज़ ही उसके फटे कम्बल में आकर दुबक जाता था। पगले की आँखों में बहुत कुछ पढ़ा जा सकता था। परन्तु अपनी चटपटी बातों और किस्सों के बीच पगले रसिक के हाव -भाव की तरफ ध्यान देने का वक्त किसी के पास नहीं था। किस्सागोही और बतकही का आनंद उसे करने वाले और सुनने वाले दोनों ही जानते हैं।

पगला दिन भर शहर भर में डोलता रहता था और देर शाम इधर पनवाड़ी की दुकान पर पहुँच जाता था। अक्सर यही पगला आधी रात को शहर भर में भटकता हुआ भी नज़र आ जाता था। पुलिस वाले शक करते हुए उसे मारते और सवाल पूछते। परन्तु जल्दि ही उसकी हरकतों और पागलपन से आश्वस्त हो जाते थे और उसे रिहा कर दिया जाता था। नहीं तो कोई उसे पहचानने वाला मिल जाता था तो वह पुलिस वालों को समझा देता था कि ये एक नेक पगला है, देश को इससे कोई ख़तरा नहीं है।

एक दिन देर रात उसे पुलिस चौकी के अंदर कुछ पेपर और फाइल पलटते हुए देखा गया। झपकी लेते हुए पहरेदारों की नज़रों से बच कर वह बहुत सफाई से भीतर पहुँच गया था। देखे जाने पर, उस रात वह जान बचा कर ऐसा भागा कि पलट कर उस शहर में फिर कभी नहीं दिखाई दिया। उसके सामान में सिगरेट और टॉफी की पन्नियाँ, बोतलों के ढक्कन और कुछ ब्लेड के टुकड़े मिले। इसके अलावा कई तह लगा कर छोटे किए हुए दो कागज़ के पुर्जे भी मिले। जिनमे अजीब सी सांकेतिक भाषा में कुछ अंकित था। यह देख कर लोगों में उसके बारे में बातचीत का विषय ही बदल गया। पागल आदमी का पुलिस की फाइलों से क्या सम्बन्ध? क्या लिखा है इन कागज़ के टुकड़ों पर? चर्चाएं गर्म होने लगी। कौन था आखिर वह? पागल था भी या नहीं?

पगले रसिक के भाग जाने के कुछ ही दिन बाद अखबारों और टेलीविजन में खबरे आईं। लोगों ने देखा कि एक 'सी आई डी ऑफिसर को देश के कई आतंवादी गिरोहों का पर्दाफाश करने के एवज में पुरुस्कृत किया जा रहा है। उनके बारे में बताया जा रहा था।

"वे एक काबिल और हिम्मत वाले जांबांज ऑफिसर हैं। उन्होंने गाँव और शहरों की धूल फांकते हुए कई आतंकवादी गिरोहों का पता लगाया है। देश को कई बार बहुत बड़ी साजिशों से बचाया था। वे वेश बदल -बदल कर इन आतंकी ठिकानों का भेद लेते थे। कभी फ़कीर का वेश धरते, गीत गाते और लोगों को आशीर्वाद देते। कभी गांव की औरत का वेश धरते तो कभी उच्च वर्ग की आधुनिक महिला बनते। कभी व्यापारी तो कभी गरीब किसान का वेश रख लेते थे। यहाँ तक की सुध -बुध खोए हुए पागल बनकर टॉफी और सिगरेट की पन्नियाँ समेटते हुए भी वे दर - दर भटके हैं। देश ऐसे काबिल ऑफीसर की हिम्मत और ज़ज़्बे को सलाम करता है।"

"अरे ये तो अपना रसिक है......" उसकी फोटो अखबारों और टेलीविज़न में देखकर लोगों को घोर आश्चर्य हुआ। अब उसके बारे में नए सिरे से बातें होने लगीं। पहले चर्चा होती थी।

"पता नहीं इसके साथ ज़िंदगी में क्या हुआ होगा, कि बेचारा अपने आप को ही भूल गया है।"

"अरे कोई गहरा सदमा लगा होगा, या फिर किसी हादसे का शिकार होकर इसका दीमाग हिल गया है।"

"कितना मासूम सा लगता है। जरूर प्यार में धोखा खाया हुआ है। दिल टूट गया होगा बेचारे का। कमबख्त ये महोब्बत है ही ऐसी बला। करे तो और न करे तो भी, दोनों ही हाल में इंसान का चैन और सुकून खो जाता हैं।" कुछ उसे जब संवेदनशील होकर रोते हुए और दर्द भरे गीत गाते हुए सुनते थे तो अनुमान लगाने लग जाते थे।

"क्या पता इसे गबन के केस में फंसाया गया होगा। कैसा अच्छा सा चेहरा -मोहरा है। बहुत ईमानदार अफसर रहा होगा। ईमानदारी का हमारे देश में यही तो हस्र है।" सभी अपनी -अपनी राय रखते थे।

इस खबर के आने के बाद से सभी अपने आप को समझदार साबित करने में लग गए। जैसे कि उन्हें उसकी सच्चाईयाँ पहले से ही मालूम थीं। अब उनकी बातों का सुर कुछ इस तरह था।

"कसम से, मुझे तो तभी शक हो गया था जब वह रात -आधी रात भी इधर - उधर घूमा करता था।"

"अरे उसकी आँखें नहीं देखी? जासूसों सी गहरी आँखें थीं। न जाने खोजी निगाहों से क्या ढूंढता रहता था।"

"भाई मैं न कहता था। जब गा सकता है तो बोल कैसे नहीं सकता? तुम लोग मेरी बात मानते ही नहीं थे।"

"जब नीचे ज़मीन पर रेखाएं खींचता था न तब मैंने देखा था। वह कई बार मुट्ठियाँ भींच लेता था और उसके माथे पर गहरी सोच और चिंता की लकीरें खिंच जाती थीं। मैं तो जानता था इसका मतलब। उसके दिमाग में उस समय कुछ योजनाएं चलती रहती थीं।"

"अरे मैं तो......" लोगों की बातों का कोई अंत ही नहीं था।

एक पागल इन सब को पागल बना गया। और उन्हें पता तक नहीं चला। भला ये कोई कैसे बर्दाश्त कर लेता.....इंसानी फितरत।

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