पास तक फ़ासले

कमलानाथ


लिछमा जब गौना करके आई, मुश्किल से सोलह बरस की थी। पर अपनी बहनों में सबसे देर से वही परण कर सासरे आई थी। वैसे ब्याह तो उसका तभी होगया था जब वह तेरह-चौदह बरस की थी, पर उसकी माँ बीरम बाई ने उसका गौना सोलह बरस की होने तक हरगिज़ नहीं होने दिया। इसके लिए वो लिछमा के बाप से भी लड़ पड़ी थी और अपने सास ससुर से भी। लिछमा तीनों बहनों में छोटी भी थी, लाड़ली भी और होशियार भी। बीरम बाई उसे पढ़ाना चाहती थी। गोगावास के छिन्तर जाट के बेटे भैंरू से उसका लगन हुआ था। गाँव वाले जानते थे बीरम बाई उपसरपंच बनी उससे पहले से ही बात सही भी करती थी और उस पर अड़ भी जाती थी। इस लड़ाई में वे किसी के साथ नहीं थे। लेकिन आखिर में जीत बीरम बाई की ही हुई। कई दिन तक उससे लिछमा का बाप और सास ससुर नहीं बोले थे। बीरम बाई जानती थी बेचारे सास ससुर तो बूढ़े हो चले हैं सो वैसे ही बड़प्पन की भभकी दे रहे हैं और लिछमा का बाप पांच-सात दिन हुए नहीं कि किसी दिन अपने आप रात को उसकी सोड़-गूदड़ी में घुस आएगा।

भरी आँखों से जब बीरम बाई ने गौने के बाद लिछमा को भैंरू की सजी-धजी बैलगाड़ी में बैठाया, उसने सिर्फ़ यही कहा – “अपणे बाप के इस घर में अब तू जब भी आएगी, पावणे की तरह ही आएगी। तेरा सासरा ही अब तेरा सब कुछ है, अच्छा बुरा जैसा भी है।”

लिछमा गौने के बाद जब मोटा बोरला, नथ, रखड़ी, बंगड़ी, और चांदी की हंसली पहने, मोटा मोटा काजल लगाये, तेल चुपड़े बालों में लाल हरे चुटीले से कस कर गुंथी हुई चोटी बाँध कर, पीठ से पूरी खुली हुई डोरियों से कसी कांचली, छींट की हरी-लाल लूगड़ी, लाल-काला घाघरा और कढ़ाईदार जूती पहन के जब भैंरू की बैलगाड़ी से उतरी, तो उसका लंहगा पिंडलियों तक सरक गया। उसकी गोरी गोरी पिंडलियाँ गाँव के गबरू जवानों के हिया में एक साथ सौ सौ छुरियाँ उतार गयीं। पर उनमें से कई भैंरू के दोस्त भी थे जो अपने दिल की कसक अंदर ही अंदर दबा कर सिर्फ़ उसके भाग पर रश्क करते रहे।

भैंरू घर का बड़ा बेटा था सो उसी का ब्याह सबसे पहले हुआ था। छिन्तर अब थोड़ा बूढ़ा तो क्या, कमज़ोर हो चला था इसलिए धीरे धीरे अपने काम भैंरू को सम्हलाता जा रहा था। भैंरू की माँ दो तीन बरस पहले चल बसी थी सो घर में कोई औरत जात अब थी ही नहीं। मरद लोग किसी तरह गुड़-भूंगड़ा खाकर गुज़ारा कर रहे थे, पर सारा घर कबाड़खाने की मानिंद हो गया था। कहीं बैलगाड़ी का टूटा पहिया पड़ा है, तो कहीं मूंज की जेवड़ी का गट्ठर, तो कहीं अनाज की बोरियां, कहीं छाणे (उपले) और कहीं लोहलक्कड़। इसीलिए छिन्तर जल्दी से जल्दी भैंरू का ब्याह करके बींदणी घर लाना चाहता था जो घर-बार सम्हाल ले। पर बीरम बाई ने हरगिज़ नहीं माना और लिछमा का गौना सोलह बरस की होने के बाद ही किया। भैंरू के छोटे भाई गुल्या और मगण्या हालाँकि उससे एक एक दो दो बरस ही छोटे थे, पर ज़िम्मेदारी सब भैंरू ही ले रहा था। छिन्तर की एक दूर की बहन भूरी भुआजी और छिन्तर के भाई की विधवा ग्यारसी काकी घर के सब मामलों में सलाह ज़रूर देती थीं, या कहें टांग अड़ाती थीं, पर कभी कभार घर आकर घर को व्यवस्थित करने का उनको मन कभी नहीं हुआ।

गौने के बाद अपने सासरे आते ही लिछमा घर की हालत देख कर घबरा गई थी। पर उसे घर की बड़ी बींदणी होने का ग़रूर भी था और उसकी ज़िम्मेदारी का अहसास भी। भैंरू लिछमा को बहुत प्यार करता था। दो बार उसको शहर भी घुमा लाया, एक बार बड़े थियेटर में सिनेमा भी दिखा लाया और उसके लिए कई तरह के ‘अंग्रेज़ी’ कपड़े भी ले आया जिन्हें चुपचाप रात को लिछमा अकेले में भैंरू के सामने पहनती थी। भैंरू कहता था- “तू पहले जणम में अंग्रेजण थी और इस जणम में वैसा ही गोरा रंग लेके पैदा हुई है। मेरे सामणे तू अंग्रेजण की तरह ही रहा कर।“ तब लिछमा शरमा जाती थी और लूगड़ी से मुंह छिपा कर हँसती थी। उसने शहर से अपनी पसंद की कई जोड़ रंगीन कांच की चूड़ियाँ भी ख़रीदी थीं जिन्हें वह हाथीदांत और लाख के मोटे चूड़ों को उतार कर पहनती थी। भैंरू के कहने पर लाल ‘लिपिश्टिक’ लगा के जब लिछमा सिनेमा की हीरोइन की माफ़िक मटक के चलती थी तो भैंरू का दिल मचल उठता था और वो लिछमा को बाँहों में भर कर प्यार करने लगता था। चार बरस मौज मस्ती में कैसे निकल गए पता ही नहीं चला, पर लिछमा की गोद हरी नहीं हुई। भैंरू कहता था “तू खुद अभी बच्ची ही है, घर सम्हाळ रही है ये ही बहोत है। अच्छा है, बच्चों का बोझ अभी नहीं पड़ा तेरे पर।” और तब लिछमा खुश होजाती। उसके पास भैंरू था तो सात लोक की खुशियाँ उसके दामन में बंधी रहती थीं।

छिन्तर लिछमा को कहता था – “बींदणी, तू साच्छात लछमी ही है। तेरे आणे के बाद घर-बारणे की कदर और बाळबच्चों की सम्हाळ हो गयी। तेरे भाग से ही घर की बरकत है।” लिछमा लंबा घूंघट काढ़ के बस खड़ी रहती। सोचती, भले ही ज़्यादा कामकाज से थक जाती हो, पर उसको भी तो घर-गिरस्ती का सच्चा सुख मिल रहा था। भैंरू का प्यार ही जैसे सारी तकलीफ़ भुला देता था।

“तेरे कूँ कोई तकलीफ तो नईं है नै? हमारे यहाँ भैंरू ने सब माडरन कर दिया। उसकी माँ तो चूळ्हे में ही रोटी बणाती थी। अब भैंरू इश्टोव खरीद ल्याया है। काम जळदी निबट जाता होगा। अब वो भी तो टिफन में रोटी खाता है” – छिन्तर ने बड़े गर्व से कहा। लिछमा ससुर के सामने कैसे कुछ बोलती? वह वैसे ही खड़ी खड़ी अपने भाग पर इतराती रही।

अपने दोनों बैलों को लेकर भैंरू सुबह खेत पर निकल जाता था। ये बैल ही सब काम आते थे। भैंरू इनको बैलगाड़ी में भी जोतता था, बरसात से पहले सारे खेत में पहले हल चला कर फिर बुवाई करता था, और चरस के मोटे लाव को जूड़ी से बाँध कर खेत के कुएं से पानी निकाल कर क्यारियों में छोड़ता था। छिन्तर और भैंरू के भाई हालाँकि तब उसकी मदद करते थे। घर का काम ही इतना हो जाता था कि लिछमा को भैंरू के लिए अलग से दोपहर का खाना देने जाने का वक़्त ही नहीं मिलता था, हालाँकि वो चाहती थी कि ऐसा करे। इस बहाने दुपहर में भी वो थोड़ा वक़्त भैंरू के साथ बिता सकती थी। उसकी जगह भैंरू का छोटा भाई गुल्या उसके लिए दुपहरी की रोटी लेजाता था। पहले गुल्या छोटा था तो वो ही मीठे कुएँ से पानी खींच कर लाता था, पर अब जब से थोड़ा जवान हुआ है और मूंछों की कलाई होठों के ऊपर गहराने लगी है, उसे औरतों के साथ कुएँ से पानी खींचना अच्छा नहीं लगता। ये काम भी अब लिछमा के ज़िम्मे ही आगया। पर उसके बदले भैंरू के लिए दोपहर का खाना लेजाने में उसे कोई गुरेज़ नहीं था। लिछमा सुबह इतने सारे कामों में उलझी रहती थी कि दोपहर बाद शाम ढलने से कुछ पहले ही उसको कुएँ से पानी लाने का वक़्त मिलता था। पिछली बार शहर से लिछमा खास तौर से भैंरू के लिए एक टिफ़िन ख़रीद कर लाई थी ताकि वो हमेशा की तरह कपड़े में बाँध कर ले जाने की बजाय अच्छी तरह टिफ़िन में रोटी ले जा सके। अब लिछमा गुड़ और कांदे के अलावा टिफ़िन के एक कटोरदान में कभी कभी खाटा भी रख देती थी, जो भैंरू को खूब पसंद था।

लिछमा के आने के बाद घर जैसे घर लगने लगा था। कभी कभी भैंरू के दोस्तों का जमावड़ा भी होजाता था, हालाँकि जो छिन्तर को पसंद नहीं था। भैंरू जानता था, गाँव के छोरे भी जिनसे उसकी कोई खास दोस्ती नहीं थी, क्यों आजकल घर पर मँडराने लगे हैं। गांव में लिछमा जैसी सुन्दर लड़की कोई थी ही नहीं। उनके हावभाव देख कर लिछमा भी सब जान जाती थी और रात को भैंरू के साथ उनकी बात याद करके खूब हँसा करती थी। छिन्तर दारू पी पी कर ही कमज़ोर होगया था। अब लिछमा ने धीरे धीरे उसकी लत छुड़ा दी थी। अच्छे खाने से उसकी तंदुरुस्ती भी सुधरने लगी थी और वो भैंरू की ज़्यादा मदद करने लगा था, जो लिछमा को अच्छा लगता था।

“दाज्जी, आपके हाड़-गोड़ों में ताकत होय तो ही खेत में आया करो, नहीं तो घर में ही आराम करो” – भैंरू बाप से सहानुभूति जताता था और छिन्तर ऐसा बेटा पाकर न्ह्याळ होजाता था।

गुल्या आठवीं की पढ़ाई कर रहा था और स्कूल जाता था। छोटा मगण्या चौथी में था। लिछमा उसको स्कूल में खेलघंटी में खाने के लिए गुड़-रोटी बाँध कर दे देती थी और गुल्या टिक्कड़ के साथ कैरी का अचार लेजाता था। फिर जब तक घर में समेटा समेटी पूरी होती थी और वह मीठे कुएँ से पानी खींच कर लाती, तब तक भैंरू के आने का वक़्त होजाता। उसके आते ही जैसे लिछमा की सारी थकान फिर से काफ़ूर होजाती।

गाँव की ज़्यादातर औरतें सुबह ही कुएँ से पानी भरती थीं। दोपहर के पहले तक वहाँ काफ़ी चहलपहल रहती थी। शाम को कुआँ करीब करीब सुनसान होजाता था। बस, चरने के बाद लौटते ढोर-ढांढे कुएँ के पास बनी खेळी में पानी पीने रुकते थे। लिछमा को पानी खींचने के लिए अपनी बारी का इंतज़ार नहीं करना पड़ता था, जैसा सुबह हुआ करता था। कुएँ की मुंडेर के ऊपर एक तरफ़ एक घिरनी पर मोटी रस्सी पड़ी रहती थी जिस में अपनी चरी या बाल्टी बाँध कर औरतें पानी खींचती थीं। दूसरी तरफ़ ऊंची एक और घिरनी लगी थी जिस पर एक रस्सी में मोटे कैनवास की एक डोलची बंधी रहती थी। गाँव वाले, रास्ते के मुसाफ़िर, या भेड़-बकरियों, बळद-डांगर के साथ आये ग्वाले कुएँ की मुंडेर पर चढ़ कर डोलची से पानी खींचते थे और एक हाथ में डोलची से पानी गिरा कर दूसरे हाथ की ओक से पानी पी लेते थे। पर ऐसा वे ही लोग कर सकते थे जो ‘ऊंची जात’ के हों। बाकी के लिए एक पत्थर की कुण्डी से लगी लकड़ी की एक नळकी होती थी। कुएँ की मुंडेर पर से कोई कुण्डी में पानी डालता था और ‘नीची जात’ वाला नळकी से ओक लगा कर नीचे खड़े होकर पानी पी सकता था। यही वहाँ का अनलिखा नियम था, जो सब जानते थे और सब लोगों को अपनी अपनी सीमाओं का भान था।

लिछमा जब शाम को कुएँ से पानी भर कर जाने वाली होती थी या भर रही होती थी, लगभग तभी तीन ऊंटों को लेकर एक रैबारी उस रास्ते से अपने गाँव लौटता था। उसके ऊँट खेळी से पानी पीते थे और फिर थोड़ी देर सुस्ताने के लिए पास ही बैठ जाते थे। उस समय जो भी कुएँ पर मौजूद होता था, गोरधन नळकी के पास खड़ा होकर उसी को पानी पिलाने के लिए कहता था। अगर कोई नहीं होता था तो वो कुएँ पर किसी के आने का इंतज़ार करता हुआ पास के नीम की छाँव में बैठ जाता था और मन बहलाने को झोली से अलगोज़ा निकाल कर बजाने लग जाता था।

जब पहली बार रैबारी ने लिछमा से पानी पिलाने को कहा था, लिछमा अपनी चरी से ही उंडेल कर पिलाने लगी थी। पर रैबारी पीछे हट गया था – ‘नहीं नहीं, क्या कर रही है? किसी ने देख लिया तो मेरे को तो ओळम्भा देंगे ही, तेरे को भी परेसाणी हो जायगी। सारे बरतन-भांडे मांजणे पड़ेंगे।”

लिछमा चौंकी, पर तुरंत समझ गयी। उसको तो पहली बार में वो रैबारी बड़ा अच्छा लगा था और पूरा की का पूरा उसकी आँखों में उतर गया था – गबरू मोट्यार, गेंहुआ रंग, पतली धारदार मूँछ, काजल लगाया हुआ, मोटी लंबी पलकें, आगे का एक दांत सोने का, सफ़ेद अंगरखी, ऊंची सी धोती, चमड़े की मोजड़ी पहने, चुन्दड़ी वाली लाल पगड़ी बंधी हुई, शकल सूरत में लुभावना और बोलने चालने में भला। हाथी की तरह चलता था और ठसक से ऊँट लेकर आया था। लेकिन गाँव में ऊँट तो कई जाटों के पास भी थे। पर तब रैबारी को लिछमा ने नळकी से पानी पिला दिया था और फिर उसका नाम पूछा था।

“गोरधण” - उसने बड़े आत्मविश्वास से जवाब दिया था।

“क्या करता है तू?”

ऊंटों की खरीद फरोखत।”

“वो क्या होता है?”

“ऊँट खरीदता हूँ और ऊंचे भाव पर बेच देता हूँ। मेरी ऊंटणियां बच्चे भी जणती हैं। बड़े होते हैं तो वो भी बिक जाते हैं”।

“रोज तू ऊंटों को कहाँ ले जाता है?”

“ऊँट चराणे लेजाता हूँ, लोगों को दिखाणे भी और ऊंटणियों को...” – फिर वह संकोच से चुप होगया।

पर लिछमा शरमा गयी थी और उसने लूगड़ी से अपना चेहरा ढांप लिया।

उसके बाद तो कई बार रैबारी को लिछमा ने पानी पिलाया था। ओक से पानी पीते हुए जब वह नळकी की धार की तरफ़ आँख के गट्टे ऊपर करके देखता था तो लिछमा को लगता था वो उसी को निहार रहा है। पर चिढ़ने की बजाय लिछमा का दिल जोर से धड़कने लगता था और एक कसक सी उठने लगती थी। वह भी जी भर के उसको देखती थी। सचमुच कितना सुन्दर था वो रैबारी।

एक दिन गोरधन ने भी उसका नाम पूछ लिया।

“लिछमा” – उसने कहा। गोरधन कुछ बोला नहीं। सिर्फ़ मुस्कुरा दिया। पता नहीं क्यों।

गोरधन को मुस्कुराते देख कर वह भी मुस्कुराई थी और फिर पानी से भरा कलसा उठा कर घर चल दी थी। उसको पता नहीं गोरधन क्यों अच्छा लगा था। वो भैंरू को बहोत प्यार करती थी और उसके मन में कभी किसी और आदमी का ख़याल भी नहीं आया था। बस उसको गोरधन अच्छा लगने लगा था। सीधा सा, जिससे वो सब बात कर सकती थी। यह कैसा अजीब आकर्षण सा था!

आज लिछमा को पानी के लिए आने में कुछ देर हो गयी थी। पर दूर से उसने कुएँ की तरफ़ से अलगोज़े की वही मीठी सी धुन सुनी। लिछमा ने अलगोज़े की आवाज़ कई बार पहले भी सुनी थी और उसे हर बार बहुत अच्छा लगा था। कभी वो पणिहारी बजाता था, कभी गोरबन्द और कभी मांड में कोई धुन। वो खिड़की से झांकती भी थी पर घर के बाहर पेड़ की आड़ से कुएँ के आसपास का बहुत सा हिस्सा छुप जाता था, इसलिए उसे पता नहीं चल सका इतना मधुर कौन बजा रहा था। आज जब वो खुद उधर आई तो उसे रोमांच हो आया। यह तो गोरधन ही दूर नीम के नीचे बैठ कर अलगोज़ा बजा रहा था! उसने अपने क़दम धीमे कर दिए कि कहीं उसको देख कर वो बजाना बंद न कर दे। वह चाहती थी गोरधन बजाता रहे और वो सुनती रहे, बस सुनती ही रहे। पर ये बात वह उससे कह नहीं सकती थी। जब गोरधन ने लिछमा को आते हुए देखा तो उसने सचमुच बजाना बंद कर दिया और अलगोज़े को झोले में डाल लिया। उसके ऊँट पानी पीकर सुस्ता भी चुके थे और घर जाने के लिए तैयार खड़े थे।

“आज इधर काणा कागळा तक नहीं आया। मैं जाणे ही वाळा था, प्यासा ही।” – रैबारी ने कहा। यह सुन कर लिछमा के हिया में अचानक प्यार उमड़ आया।

लिछमा के मुंह से निकल पड़ा - “मैं तुझे प्यासा कैसे जाने....”, पर वाक्य पूरा नहीं कर सकी। कहीं रैबारी कुछ और न समझने लगे। कहाँ ये रैबारी और कहाँ वो ब्याहता जाटणी! फिर खुद ही अपनी इस बेतुकी सोच पर मुस्कुरा पड़ी।

“तूने अलगोज़ा बजाना बंद क्यों कर दिया?”

“मैं तो वैसे ही बैठा बैठा किसी के आणे की बाट जोह रहा था।”

“मेरे आने की?”

“हाँ, तेरे भी आणे की। ये तेरे आणे का भी तो टैम है।”

“मुझको अलगोज़ा नहीं सुनाएगा?”

सुणाऊँगा, पर आज नहीं। अभी तो देर होगई। ऊँट घर जाणे को बे-सबरे हो रहे हैं।”

“ऊँट हो रहे हैं कि तू? घर पे तेरी कोई बाट जोह रही है?”

“मेरी बाट जो’णे वाळी अभी कोई नहीं है।”

“तेरा ब्याह नहीं हुआ अब तलक?”

“हुआ था, जब मैं छः सात बरस का था। मेरे को तो पता भी नहीं है किसके साथ। और जिसके साथ हुआ होगा, वो अभी तक भी नहीं आई घर में रहणे, ना अब आणे वाळी है।”

“तूने मालूम नहीं किया कौन थी?”

“कोई बताता ही नहीं है।”

“फिर कौन हैं तेरे घर में?”

“बस, मा बाप, बूढ़ी दादी और मैं।”

”ब्याह नहीं करेगा दुबारा?”

“करूँगा क्यों नहीं? उसी बखत कर ळूँगा जब तेरी जैसी कोई सातवें आसमाण की परी मिळ जायगी। आँख-हिवड़े में बसा कर रखूंगा।”

लिछमा बेहद शरमा गयी, पर बात बदल कर बोली - “फिर कब सुनावेगा तेरा अलगोज़ा?”

“तू कहेगी जभी।”

गोरधन अपने ऊंटों को लेकर चला गया और लिछमा उसको देर तक जाते हुए देखती रही।

घर पहुँचने को हुई तो दूर से भैंरू भी आता दिखाई दिया। वो वहीँ रुक गयी और भैंरू के साथ हो ली। भैंरू ने इधर उधर देख कर उसकी गलबैंया भर ली और लिछमा शरमा कर दूर खिसक कर चलने लगी।

“किसी ने अंग्रेजण को कुएँ से पाणी भरते नहीं देखा हो तो हमारे गाँव आजावै” – भैंरू प्यार से बोला।

“किसी ने अंग्रेजण की लावण में गोखरू, भरभूंटे चिपके नहीं देखे हों तो हमारे गाँव में आजावै” – लिछमा ने तीर छोड़ा।

भैंरू तुरत ही बैठ गया और लिछमा की लावण से चुन चुन कर भरभूंटे और गोखरू के काँटे निकाल कर फेंकने लगा। बीच बीच में वह शरारत से हाथ ऊपर खिसका कर लिछमा की पिंडली भी पकड़ लेता था और लिछमा पैर झिटक देती थी। लिछमा को बड़ा मज़ा आरहा था और वो सिर के ऊपर इण्डुणी पर रखी चरी को सम्हालती हुई कमर पर रखी पानी से भरी चरी से भैंरू पर छींटे मार रही थी। सामने गुल्या को आता देख कर वह सम्हल गयी, पर गुल्या बाण कस ही गया – “क्या दादा, रस्ते में ही भौजाई की चरण मालिस कर रया हो?”

“चल हट, बेसरम” – भैंरू झेंप सा गया और खड़ा होगया। लिछमा की हंसी छूट गयी। खिसियाते हुए वह लिछमा की इधर उधर च्यूँटी काटने लगा और लिछमा उसको दूर करने के लिए कलसे में से घर आने तक छपाक छपाक पानी मारती रही।

अगले दिन लिछमा भैंरू के लिए दुपहर को टिफ़िन तैयार कर रही थी कि एक आदमी चिल्ला चिल्ला कर छिन्तर को बाहर बुला रहा था। छिन्तर बाहर भागा और उसके साथ ही गुल्या भी। फिर वे तीनों बदहवासी में खेत की तरफ़ दौड़ने लगे। लिछमा भौंचक्की सी बाहर निकली और उनको दौड़ता देखती रही। उसको समझ में नहीं आया गुल्या खाना क्यों नहीं ले गया? कोई एक घंटे बाद बहुत सारे लोग इकठ्ठा होकर उसके घर की तरफ़ आते दिखाई दिए। छिन्तर और गुल्या चीख चीख कर छाती पीट रहे थे और पीछे एक आदमी भैंरू की लाश को कंधे पर लाद कर ला रहा था।

सड़क चलती किसी गाड़ी के तेज भोंपू से चमक कर लल्डी-छाळियों (भेड़-बकरियों) के झुण्ड का एक मेमना भैंरू के खेत के कुएं में गिर गया था। उसी को निकालने भैंरू भी कुएं में उतर गया, पर पता नहीं कैसे औसाण चूक गया। बहुत देर तक नहीं निकला तब चरवाहे ने शोर मचाया और लोगों को इकट्ठा किया। कुछ लोगों ने कुएं में उतर कर रस्सी से उसे बाहर निकाला पर तब तक उसकी साँसें बंद हो चुकी थीं।

जैसे एक हरा भरा पेड़ बिजली गिरने के बाद सूखे ठूंठ की तरह होजाता है, लिछमा पर अचानक वैसी ही बिजली गिरी। उसका सारा संसार कांच के बर्तन की तरह ज़मीन में गिर कर चकनाचूर हो गया। उसकी आँख के आगे अँधेरा छाने लगा और वो भैंरू को आँगन में उस तरह पड़ा देख कर बेहोश होगई।

देखते ही देखते सारा गाँव इकट्ठा होगया था। बुज़ुर्गों ने सूरज ढलने से पहले उसकी अंतिम क्रिया करने की तैयारी शुरू कर दी।

बीच बीच में ग्यारसी काकी और भूरी भुआजी लिछमा के मुंह पर पानी के छींटे मार कर उसे होश में लाने की कोशिश कर रही थीं। उसका होश में आना ज़रूरी था। जब तक भैंरू के नाम का उसका चूड़ा नहीं तोड़ेंगे, अर्थी उठ नहीं सकती। ग्यारसी काकी उसका सिंगार उतारने लगीं। गुवाड़ी की तीन चार औरतें उसे जैसे तैसे उठा कर एक बड़े पत्थर के पास लाईं और उसका हाथ वहाँ रख कर दूसरे छोटे पत्थर से उसकी चूड़ियाँ तोड़ने लगीं। रात को ही बड़े प्यार से भैंरू ने पहली वाली बदल कर शहर से खरीदी वे नई चूड़ियाँ पहनाई थीं। लिछमा चीख कर फिर बेहोश होगई।

अगले एक महीने तक भी लिछमा लगभग नीम-बेहोशी की हालत में ही रही। कौन क्या बोल गया, क्या शिक्षा दे गया, मां-बाप क्या कह गए, उसे कुछ भी याद नहीं था। एक यंत्र की तरह वह घर का सब काम कर देती थी, पर उसको न अपना, न अपने इर्दगिर्द किसी और चीज़ का ही कोई भान था।

इस बीच ग्यारसी काकी, भूरी भुआजी और दूसरी औरतों की भूमिका बढ़ गयी थी। वे लगभग रोज़ ही आपस में और फिर छिन्तर के साथ घर और लिछमा के भविष्य के बारे में बात करती थीं। वे छिन्तर पर ज़ोर डाल रही थीं कि अब गुल्या की चादर लिछमा को उढ़ा देनी चाहिए।

“छोरी देखी-भाळी है, गुल्या के साथ नाते में बैठ जायेगी और बींदणी घर की घर में रही आवेगी। पूछणा उसके मा-बाप को। खुस ही होंगे।”- गांव के बड़े बुज़ुर्गों की आपस में यही सलाह थी।

लिछमा भी कोशिश कर रही थी सम्हलने की, पर जैसे अब उसमें सोचने समझने की शक्ति ही नहीं बची थी। लेकिन अपने आपसे कहती उसको अपने बारे में कुछ सोचना ही होगा। सचमुच, इस तरह कब तक चल सकता था। इस घर पर अब क्या उसका कोई अधिकार रह गया है, या अब सिर्फ़ कर्तव्य ही बच रहा है?

एक दिन छिन्तर ने हिम्मत जुटा कर लिछमा से कहा - “घर में अनरथ होगया है। देख बींदणी, सुघड़ नार जब परण कर आती है तो उसके बाद उसके लिए सासरा ही उसका संसार होजाता है। सयाणों ने गहरी बात बताई है – घर की लुगाई भले ही परदेस का चक्कर लगा आय, पण बारणा पार ना करे और डूंगर चढ़ जाय, पण घर की देहळी ना लांघे। बींदणी, ये समझणे की महीण बात है। चार कांधों की डोळी पर बैठ कर बींदणी मायके सैं भले ही आवै, पर चार कांधों पे सासरे सैं उसकी लास ही जावै है।” - ये कह कर छिन्तर धीरे धीरे वापस चला गया।

बीस की होते होते पिछले चार पांच बरस में ही लिछमा ने वह सब कुछ देख और झेल लिया था जो भरी पूरी ज़िंदगी में बीत सकता है। उसको लगा कहीं जीवन भर उसे इस चहारदीवारी-नुमा जेल में रखने की साज़िश तो नहीं हो रही? किसके भरोसे वह यहाँ रहे? जिसके भरोसे वो यहाँ परण कर आई थी, भाग ने उसे छीन लिया और अकेले ही इस जीवन से संघर्ष करने के लिए छोड़ दिया। अब उसे अपने बारे में निर्णय लेने का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए?

कुछ दिन बाद छिन्तर ने फिर कहा - “बींदणी, झून्झळ मत खाणा। मैं फेर कहता हूँ तू लाज हया छोड़ और मेरे कूँ सुसरा नहीं, अपणा बाप ही समझ। अब बोळैगी नहीं तो पता कैसे चळैगा तू क्या बिचार कर रही है.... अभी तेरी उमर ही क्या है! डूंगर जैसी जिंदगाणी कैसे काटेगी?... सोचणा तो पड़ेगा ही, आज नहीं तो कल।”

लिछमा ने आज तक छिन्तर से बात नहीं की थी। लंबा घूंघट निकाले हुए ही उसने हिम्मत जुटाई और बोली – “दाज्जी, यहाँ आने के बाद मैंने आपको बाप ही समझा है और इसीलिए आपसे बात करने की बेसरमी कर रही हूँ। आपने जो सिच्छा दी उसकी मैं कदर करती हूँ। आप ही बताओ जिसके साथ बाँध कर आप मुझको यहाँ लाये, जब वो ही नहीं रहा तो अब मेरा क्या तो यहाँ हक-हकूक रहा, क्या इज्जत रही, क्या ओहदा रहा? जात बिरादरी तो मुझको रांड ही कहेगी न?”

छिन्तर ने कहा - “बींदणी देख, बामण बाण्याओं की बिरादरी में तो रांड की दुर्दसा ही होवै, पण जाटों में और कुछ नहीं तो नाता करके बापड़ी लुगाई नई गिरस्ती तो बसा ळे है।”

लिछमा बोली – “दाज्जी, नए घर में आने के बाद लुगाई का घर के सारे लोगों से एक खास रिस्ता नाता बन जाता है। जब उन रिस्तों में कोई भी फेर बदल होने लगता है तो सारी की सारी बात ही बदल जाती है। पुराने लोगों से नए रिस्ते बनाना बहुत मुसकिल होता है। जात बिरादरी ने जो भी कायदे कानून बनाये हैं, सोच विचार के ही बनाये होंगे। पर अभी तक सारी कुरबानी औरत जात ही देती आई है। घर की, बिरादरी की, समाज की, सबकी मरजादा उसी के जिम्मे धकेल दी जाती है और वो बापड़ी चाहते हुए, ना चाहते हुए भी उनको निभाने की कोसिस करती रहती है। फिर कोई गलती हो जाए तो कलंक का ठीकरा भी उसके माथे ही फूटता है।”

कुछ क्षण रुक कर वह फिर बोली – “आप ही सोचो, अगर किसी चिड़कली के जिसके नए नए पाँख उगे हों, और जो उड़ान भरना चाहती हो, उसके पाँख काट कर कोई कहे अब तू यहीं आराम से रह, खा, पी, मौज कर, तो दाज्जी, उसको कैसा लगेगा? क्या उसकी जिन्दगी वैसी ही रह पायेगी? क्या वो उड़ पायेगी? क्या वो खुस रह पायेगी?”

छिन्तर ने जाते जाते मन मार कर कहा - “तू सही कह रही है, बींदणी। अब मैं क्या कहूँ? तेरा जैसा मण करै वैसा ही तू कर। अभी घर के माण्डणे भी नहीं मिटे थे कि ये अनरथ होगया। ये तो भाग की ही बात है, आदमी का कोई बस नहीं है। हम सब तेरे साथ हैं। तू जिसमें हामळ भरेगी, हम वो ही माण लेंगे। तेरा मण करे तो तू तेरे मा-बाप से भी सळाह कर ळे।”

लिछमा बोली - “आपका बड़प्पन ही है दाज्जी जो आपने मुझको इतना भी मान दिया, नहीं तो कौन पूछता है लुगाइयों को वे क्या चाहती हैं। अब आपने कहा है तो मैं वैसा ही करूंगी जो मेरे को वाजिब लगेगा। पण अगर मेरा फैसला आप लोगों को ठीक ना लगे तो मुझको माफ कर देना।”

लिछमा को पहली बार लगा, उसे अपने हित में कोई ठोस निर्णय लेना होगा, चाहे वो परिवार की इच्छाओं के अनुरूप न हो या समाज की मर्यादा या रीति-रिवाज़ के खिलाफ़ ही हो। उसका अपना भी जीवन है, आकांक्षाएं हैं, खुशियाँ हैं, जिनके बारे में वो ही खुद फ़ैसला कर सकती है।

वह अपने बारे में सोचती रही।

इतने दिन बाद शाम को उसके पैर बरबस ही उसको फिर मीठे कुएं की तरफ़ खींच ले गए। वहाँ कोई नहीं था। वह नीम के नीचे बैठ गयी। थोड़ी देर बाद ही दूर से रैबारी अपने ऊंटों के साथ आता दिखाई पड़ा। उसने अपने ऊंटों को खेळी पर पानी पीने के लिए छोड़ा और कुएं पर किसी को नहीं देख कर नीम की तरफ़ बढ़ा। लिछमा को देखते ही उसकी आँखों में चमक आगई।

“अरे, ये कैसे बेस में बैठी है? मुंह उतरा हुआ लग रहा है। किसी से लड़ाई हो गयी क्या? इतणे दिणों से कहाँ थी?”

लिछमा फफक पड़ी और उसकी आँखों से आंसू झरने लगे। फिर अपने आपको संयत करते हुए लड़खड़ाती आवाज़ में बोली – “गोरधन, तू कहता था न कि मेरे जैसी सातवें आसमान की परी मिल जायगी तो तू ब्याह कर लेगा और उसको आँख-हिवड़े में बसा कर रखेगा। याद है?”

“याद क्यों नहीं है? कहीं दिखी तेरे को वैसी परी?”

“मुझसे नाता करेगा? मैं तैयार हूँ। बोल, तू क्या कहता है?”

गोरधन चौंक गया। उसको जैसे विश्वास ही नहीं हुआ – “भांग अफीम खाकर आई है क्या? क्या बोळ रही है, कुछ होस है?”

“मैंने वही बोला जो तूने सुना। क्या तू मुझसे लगण करेगा? जवाब दे, हाँ या ना।”

“तू सोच समझ कर बोळ रही है? जात-बिरादरी, गाँव-गुवाड़ी सब का बिचार कर ळिया?”

“हाँ, कर लिया। बोल, तैयार है मुझको साथ ले चलने को? हमेसा के लिए, ऐसे ही, अभी, तुरत।”

“तू तैयार है तो ये मेरा भाग है। चळ, अभी ही चळ।”

गोरधन ने ऊंटों को पानी पीते ही खींच लिया – “मेरे साथ बैठेगी अक दूसरे ऊँट पर?”

उसके उत्तर का इंतज़ार किये बिना उसने दो ऊंटों को रस्सी खींच कर बैठाया और सहारा देकर एक ऊँट पर उसने लिछमा को बैठा दिया। दूसरे पर तेज़ी से चढ़ कर वो खुद बैठ गया और ऊंटों को हांकने लगा।

आखिरकार...

लिछमा ने सारे संबंधों के मायने एक झटके में बदल दिए थे। उसने समय को अपनी मुट्ठी में समेट लिया था। उसने निश्चय किया, अब से सही ग़लत का फ़ैसला भी वह खुद ही करेगी। पर अब भी वह समझ नहीं पा रही थी वह क्या कर रही है। क्या इतना बड़ा फ़ैसला वो बिना किसी से सलाह लिए ले सकती है? क्यों नहीं? अपने भविष्य का फ़ैसला किसी और के हाथों में वो क्यों दे? क्या वह अचानक पागल होगई? क्या अत्यधिक वेदना इस तरह की क्रियात्मकता को जन्म दे सकती है? क्या जो वो कर रही है, सही है? व्यावहारिकता क्या परम्पराओं और मान्यताओं पर इस कदर हावी हो सकती है? मानसिक उद्वेलन क्या व्यावहारिकता की सीमायें इस तरह लाँघ सकता है?

उसके मन में एक के बाद एक सवाल उठ रहे थे और उसके हाथ पाँव एक अनजानी सर्द जकड़न की गिरफ़्त में आते जा रहे थे।

उसे अपने सामने अपनी माँ का चेहरा उभरता दिखाई दिया जिसने गौने के बाद बिदाई के वक़्त शिक्षा दी थी। फिर छिन्तर का चेहरा सामने आया जो उसे औरत की मरजादा के बारे में कह रहा था। उसे वो सब भी याद आया जो उसने अपने ससुर को कहा था। उसका सिर चकराने लगा। उसको लगा वह अपने भाग्य से प्रतिशोध लेने के लिए ही यह सब कर रही है, या हो सकता है समाज में चले आरहे रिवाज़ों के खिलाफ़ उठ खड़ी हुई है या शायद अपने आप से विद्रोह कर रही है। अभी तक माँ-बाप ने जिससे भी उसकी शादी कर दी थी उसने उसी से बेहद प्यार किया। अब वह जिससे प्यार करना चाहती है, क्या उससे शादी नहीं कर सकती? क्या जात-गोत की लम्बी-चौड़ी खाई वह एक छलाँग में ही पार कर पायेगी या फिर कतरा कतरा खिर खिर के एक दिन उसी में समा जायगी? उसे लगने लगा वह सब बंधनों से मुक्त होकर स्वच्छंद उड़ रही है। अब से वह सिर्फ़ वही करेगी जो उसकी अंतरात्मा कहेगी। लेकिन वह गोरधन को जानती ही कितना है?

यकायक न जाने क्यों उसकी मुट्ठी से गाँव की बालू रेत की तरह समय फिर फिसलने लगा।

अचानक वह चिल्लाई – “गोरधन, रुक जा। ऊँट को बैठा।”

गोरधन को कुछ समझ में नहीं आया। भौंचक्का सा वह रुका और जल्दी से आकर उसने लिछमा के ऊँट को बैठाया। लिछमा ऊँट पर से कूद पड़ी।

“गोरधन, तू तेरे गाँव चला जा।”

वह पलटी और वापस तेज़ी से घर की ओर दौड़ने लगी।

गोरधन स्थिर होकर हक्का बक्का सा उसे दौड़ते देखता रहा। पर थोड़ी दूर जाकर ही लिछमा अचानक बुत बन गयी। उसके पैर ज़रूर रुक गए थे पर विचारों का मंथन और दिमाग की उलझन अब भी उसे जकड़े हुए थे। उसका सारा संसार जैसे सहसा थम सा गया था।

वह सोचने लगी क्या वह हर क़दम पर जल्दबाज़ी नहीं कर रही? क्या इस तरह के उसके क़दम हर किसी की भावनाओं को क्रूरता से झकझोर देना नहीं है? उसे लगा, परिस्थितियाँ इतनी प्रतिकूल भी तो नहीं हैं।

एक बार वह फिर पलटी और धीमे क़दमों से गोरधन की तरफ़ लौटी।


“गोरधन, तू मेरे लिए जो भी कह रहा था, क्या सचमुच अपने हियड़े से कह रहा था?” – उसने पूछा।

“तेरे को शक-शुबहा है क्या मेरे कहणे पर?”

“नहीं, ऐसे ही पूछ रही थी। ...पर...” – वह बोलते हुए झिझकी।

“पण क्या? तेरा मण पलट गया है क्या?” – गोरधन ने पूछा।

“अभी मेरे को कुछ नहीं पता चल रहा। पर तेरे बारे में मेरी सोच नहीं बदली है।” – लिछमा ने कहा।


गोरधन लिछमा की तरफ़ सिर्फ़ देखता रहा, कुछ भी नहीं बोला। इस समय उसके पास बोलने को कुछ था भी नहीं। सारा निर्णय तो लिछमा को ही लेना था। उसे तो वह पहली नज़र में ही भा गयी थी। पर उस समय वह बोलता भी कैसे?

“गोरधन, तू बुरा तो नहीं मान गया, मैंने इस तरह अचानक ऊँट रुकवाया और वापस दौड़ पड़ी?”

“नहीं तो। मैं क्यों बुरा माणता? तेरी मण-मर्जी है।” – उसने कहा।

“क्या तू मेरी मन-मर्जी का मान रखेगा?”

“तेरी मण-मर्जी मेरे सिर-आँखों पर।”

“तो क्या तू मेरी थोड़ी और बाट जोह सकता है?”

गोरधन सिर्फ़ मुस्कुरा दिया, कुछ बोला नहीं।

“तू यहाँ रोज आता रहेगा न? हमेसा की तरह?” – लिछमा ने पूछा।

“यह तो मेरा रस्ता है। आऊँगा क्यों नहीं?” – गोरधन बोला।

“तो ठीक है। मेरे को भूलना मत। मैं फिर मिलूंगी।” – लिछमा ने धीरे से कहा और अपने गाँव की तरफ़ मुड़ गयी।


वह आश्वस्त हो गयी थी। उसे जल्दबाज़ी में कोई भी निर्णय लेने की अब ज़रूरत नहीं थी। उसे लगा समय उसके हाथ से अभी फ़िसला नहीं था।

लिछमा के मन में छिन्तर के वे ही शब्द घुमड़ने लगे - “...मेरे कूँ सुसरा नहीं, अपणा बाप ही समझ।....अभी तेरी उमर ही क्या है! डूंगर जैसी जिंदगाणी कैसे काटेगी?... हम सब तेरे साथ हैं। तू जिसमें हामळ भरेगी, हम वो ही माण लेंगे.. ।”


***

(साभार: पूर्व प्रकाशित- ‘परिकथा’ में)


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