प्यार, त्याग और समर्पण से घर संसार बनाया जाता है । ये शब्द कूट-कूटकर भर दिए जाते हैं बचपन से ही स्त्री के मन में । राधा भी इन्ही शब्दों और भावनाओं के साथ ज़िन्दगी गुजार रही थी मगर इन शब्दों का खोखलापन उसके ह्रदय को बींध जाता था । सारी ज़िन्दगी उसने इसी पाठ के सहारे गुजार दी थी मगर क्या मिला उसे? आज मुड़कर देखती है तो अपना वजूद कहीं दिखाई ही नही देता। पति के लिए तो पत्नी ही थी उससे आगे कभी वो जान ही नही पाए। मन के भीतर तो कभी झांक ही न पाए। पत्नी में ऐसे गुण होने चाहिए कि पति को घर गृहस्थी की सभी जिम्मेदारियों से मुक्त रखे। घर की हर छोटी बड़ी परेशानी जो अकेले ढोना जानती हो । हर मुश्किल का सामना करने की हिम्मत हो मगर अपने हक़ के लिए या अपनी चाहत के लिए जो कभी जुबान न खोले। एक भावनाविहीन कठपुतली सी जो सबके इशारों पर नाचती चली जाए। ऐसी सर्वगुन्सम्पन्ना स्त्री ही वास्तव में पत्नी का दर्जा पाने की हक़दार होती है----ये तो उसकी पति की सोच थी । मगर अब तो बच्चे भी बड़े हो चुके थे । दो बेटों और एक बेटी की माँ होने के नाते उसे अब उनके हिसाब से जीना पड़ता था। बेटों का विवाह तो वो कर चुकी थी मगर बेटी के लिए उसके दिल में कुछ सपने थे। वो नही चाहती थी कि जो वो ज़िन्दगी भर सहती रही उसकी बेटी भी वो सब सहे। इसलिए उसने एक संकल्प ले लिया था कि जब तक उसे लड़का पसंद नहीं आएगा वो अपनी बेटी की शादी नही करेगी। अपने विचारों से उसने घर में भी सबको अवगत करा दिया था और सबने यही सोचकर हाँ भी कर दी कि एक माँ का बेटी से कुछ खास लगाव होता है इसलिए जो करना चाहती हैं करने दो वरना उसे कब ऐसा अधिकार मिला था ।

अब तो राधा अपनी बेटी अंतरा के लिए रिश्ते खोजने में जुट गई। जब भी कोई रिश्ता आता तो लड़के से अकेले में बैठकर कुछ प्रश्न करती । उसके प्रश्न थे या उसके मन का डर मगर वो अपने प्रश्नों का जवाब एक संयत और उच्च सोच से संपन्न चाहती थी । उसके प्रश्न कुछ ऐसे होते थे जैसे---

उस लड़के की नज़र में स्त्री का क्या स्थान है ?

स्त्री को आप महान सिर्फ़ कहने के लिए कहते हैं या उसे उसकी स्वतंत्रता देकर आगे बढ़ने के लिए भी प्रेरित कर सकेंगे।

आप अपने जीवन में पत्नी से क्या अपेक्षा रखते हैं ?

आपके जीवन में पत्नी का क्या दर्जा है ?

वो सिर्फ़ माँ, बहन,बेटी और पत्नी ही है या उससे अलग भी उसका अपना कोई अस्तित्व भी है?

क्या निर्णय लेने की स्त्री की क्षमता को आप उचित सम्मान दे सकेंगे? उसके निर्णय आपको स्वीकार्य होंगे?

एक पत्नी का मान सम्मान आपके मान सम्मान से ऊंचा दर्जा रखता है या नही आपके जीवन में।

जमीन जायदाद में उसका अधिकार क्या समझते हैं

और

पत्नी की कमाई पर किसका हक़ समझते हैं ---------पत्नी का , स्वयं का या दोनों का?

ऐसे अनगिनत प्रश्न जो उसके दिमाग में कौंधते वो पूछती चली जाती । कोई भी लड़का उसके सभी प्रश्नों का वैसा उत्तर नही दे पाता जैसा वो चाहती थी या कहो उसे संतुष्ट नही कर पाता अपने जवाबों से। कहीं न कहीं कोई न कोई कमी रह ही जाती और रिश्ता नकार दिया जाता। इस प्रकार एक से एक अच्छे रिश्ते हाथ से छूटते जा रहे थे मगर वो अपनी सोच से बाहर निकल ही नही पा रही थी। घर वाले चाहे कितना समझाते मगर इस बार तो राधा ने जैसे कमर कस ली थी कि वो अपनी सर्वगुण सम्पन्ना , पढीलिखी , उच्च पद पर कार्यरत बेटी के लिए एक सर्वगुण सम्पन्न उच्च सोच वाला लड़का ही ढूंढकर लाकर देगी जिसकी निगाह में स्त्री का दर्ज़ा सबसे ऊपर हो , तभी उसका ब्याह करेगी।

वक्त खिसकता जा रहा था और अंतरा की उम्र भी बढती जा रही थी । अब तो धीरे -धीरे लोगों ने रिश्ते बताने बंद ही कर दिए थे। कभी- कोई भूले भटके रिश्ता आ ही जाता तो वो भी राधा की सोच की बलि चढ़ जाता। और इस तरह साल पर साल गुजर गए मगर राधा को अपनी बेटी के लिए वैसा लड़का नही मिला जैसा वो चाहती थी। अंतरा की उम्र उस मोड़ पर आ गई थी जहाँ उसके ऊपर बालों में भी सफेदी चमकने लगी थी । अपनी माँ की इच्छा का सम्मान करते करते एक उम्र गुजर गई उसकी। और राधा भी अपनी बेटी के लिए लड़का ढूंढते -ढूंढते थक चुकी थी। अब उसे भी अहसास होने लगा था मगर अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत। वो समझ नही पा रही थी कि उससे चूक कहाँ हो गई । क्या अपनी बेटी का भविष्य सँवारना गुनाह है?क्या एक माँ का ये कर्तव्य नही कि वो अपनी बेटी जिसके लिए पल -पल मर -मरकर जीती रही ,उसके बारे में उचित निर्णय ले सके या शायद इस संसार में ऐसे लोग बचे ही नही थे जो स्त्री मन की भावनाओं को उचित सम्मान दे सकें। शायद सभी संवेदनहीन दोहरी ज़िन्दगी जीते लोग हैं इस दुनिया में --जिनकी कहने और करने की बातों में गहन अन्तर होता है ।

शायद आज भी कहीं न कहीं पुरूष मन में वो भावनाएं अब भी नही पनपीं या कहो वो अपने अधिकार अभी बाँटने में सक्षम नही हुआ है या शायद उसे अभी किसी का हुक्म मानना अपना अपमान लगता है । जो भी है सिर्फ़ कागज़ी है---भावनाशून्य। वरना क्या इतने बड़े जहान में कोई भी एक ऐसा उच्च सोच वाला लड़का उसे अपनी बेटी के लिए नही मिलता।आज राधा भी राजा जनक की तरह इस समाज से , इसके चलन से और शायद इस समाज के पुरूष ठेकेदारों से हार गई थी . आज भी पुरूष का वर्चस्व कायम था---------बेशक दुनिया आगे बढ़ रही थी , तरक्की के नए आयाम पेश कर रही थी मगर पुरूष की कुंठाग्रस्त सोच के आगे आज भी एक स्त्री विवश थी अपने अधिकार पाने के लिए। आज फिर एक स्त्री अपनी बेबसी से लड़ रही थी

 

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