ईद मुबारक़ कहकर अब गल लग जाओ जी
अपनी अपनी कदूरत को आज जलाओ जी

पवित्र रमजान का यह महीना कहता सबसे
तहज़ीब भारत में मिलकर नई सिखाओ जी

है इल्तज़ा की हामिद तू फिर से आना मेले में
अपनी दादी माँ के लिये चिमटा ले जाओ जी

विट्टल जी की यात्रा तो माँ के गुप्त नवरात्रि है
स्वागत करों सबका मिलके त्योहार मनाओ जी

ख़ुदा तूने बक्शी जिंदगी तो दे रहमदिल सबको
दिल से मिले दिल दुश्मन को गले लगाओ जी

अशोक लब पर दुआ लाया की ईद मुबारक हो
याद आये हमारी तो थोड़ा अब मुस्कुराओ जी

मत काटो ताल्लूकआत अपने रिश्तों के यारों तुम
अपने बुढ़े माँ बाप को वृद्धआश्रम से घर लाओ जी

गिरते गिरते मत इतना नीचे गिरो मानवता से तुम
हिदनुस्तानी ना होकर हिन्दू मुस्लिम कहलाओ जी

मैं तेरा हूँ ख़ुदा तू खुद मुझमें बसता है तो दूर क्यों
आजा गले लगकर कह दें मुझसे ईद बनाओ जी

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