भोज का बोझ

रामकली इक्यासी वर्ष की हो चली थी। बुढ़ापे का शरीर शनैः शनैः कमजोर हो ही जाता है। तिस पर सितम अगर बीमारी ढाए तो कृषकाय होना लाजिमी है। सो उसकी हालत हो रही थी। दो -दो पूत थे। वह छोटे बेटे के साथ रह रही थी। बड़ी बहूजी ने तो जैसे पल्ला ही झाड़ लिया था, कहती- अय, बुढ़िया ने सब कुछ तो छोटे पे लुटा दिया हम का जाने, वही करे सेवा-हारी-माँदी और का। बेचारी रामकली दोनों बहुओं की रस्साकसी में फँसी थी। एक घर पति ने उसके नाम छोड़ा था तो छोटी ने सेवा का उलाहना दे-दे कर वह भी अपने नाम करवा लिया था। वो दिन था और आज का दिन, बेचारी को भोजन के भी लाले पड़ गए थे। रूखा-सूखा परोस दिया जाता। कभी चटनी से तो कभी प्याज के साथ , ज्यादा हुआ तो लस्सी दे दी जाती रोटी निगलने के लिए, जिठानी के साथ इस बात के ढेले के साथ कि ऐ जीज्जी! तरकारी कितनी महँगी हो गई है न...कहाँ से रोज- रोज भाजी बनाऊँ , खर्चे इतने हैं कि पूछो मत...।

रामकली का स्वास्थ्य दिन पे दिन बिगड़ता जा रहा था। रात में लगातार खाँसती रहती। कोई पूछने वाला नहीं। छोटा बेटा कमल कहता, माँ अपना ध्यान रखा कर, सोने भी नहीं देती है। बहू और उसमें जोड़ देती, "हाँ और आज तो दो गिलास छाछ पी गई अम्मा! वाई ते कफ है गयो है।"
पोती विमला ने माँ को चेताया, "एक बार इन्हें डॉ. को भी दिखा दो न, शायद आराम पड़ जाए।" वह झिड़क देती, "तोय का खबर पैसा कैसे कमता है, तोहरे व्याह खातिर भी घना धन इकट्ठा करना पड़े है और जै कित्ते दिन जीवेगी?" इनके भोज का बोझ का कम है क्या..!
रामकली की सब इच्छा मर चुकी थीं, ठीक होने की भी, बस एक प्रार्थना लवों पर होती -"हे माता रानी अब उठा ले, अब सहन न होवे, अपनी बेबसी पर जी कब तक रोवे... " और एक दिन रामकली चल बसी... उसने ज्यादा तकलीफ़ किसी को नहीं दी। सभी फूट-फूट कर बहुत रोए। कमल ने तेरहवीं पर पानी की तरह पैसा बहाया। बड़े ने सब कायदा किया। सब रिश्तेदार भोज पर बुलाए। सभी गाँव वाले आए और जीमकर बेटों की तारीफ़ के पुल बाँधते जाते-" बेटे हों तो ऐसे, क्या शानदार भोज दिया है, माँ का कितना ध्यान रखा इन्होंने! कोई सीखे तो इनसे सीखे..।
उधर छोटी बहू महिला मंडली में नं. बटोरने में लगी हुई थी- " चाची और न तो का, जै सारा भोज का बोझ इन्होंने ही तो उठाया है और बोझ ही का, ये तो रीत है, हमऊँ निभा रहे हैं पूरे मन ते, माँ तो माँ ही होवे है न आखिर....

© डॉ. बीना राघव

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