द्रोण का सपना

स्नातक की उपाधि प्राप्त करते ही राज्य सरकार ने धर्मपाल को राजकीय प्राथमिक संस्कृत विधालय का प्रभारी नियुक्त कर दिया था। पढाई समाप्त होते ही सरकारी नौकरी मिल जाने से धर्मपाल और उसके परिजनों की खुशी का पारावार न था। नियुक्ति पत्र मिलते ही वह गन्तव्य की ओर चल दिया।

किन्तु आकांक्षापुर पहुँच कर जब उसने राजकीय प्राथमिक संस्कृत विधालय का पता जानना चाहा, तो गाँव वाले उसे पागल समझने लगे । अच्छा भला पोने छः फुट का डिग्रीधारी स्वस्थ युवक उपहास का पात्र बन गया। उसने एक-दो व्यक्तियों को राज्य सरकार की मुहर से जारी अपना नियुक्ति पत्र भी दिखाया।लेकिन बावले गाँव में ऊँट आ जाने जैसी स्थिति में धर्मपाल छटपटा कर रह गया। निराश हो कर वह किसी तरह सरपंच के घर पहुँचा, लेकिन रावण की लंका में सब बावन गजे। सरपंच स्वयं धर्मपाल की बात पर हंसे बिना न रह सका। वह बोला “ कहाँ का संस्कृत विधालय मास्टर साहब। आकांक्षापुर में आज से पहले तो कभी ऐसा नाम नहीं सुना। हाँ, पिछले साल आपकी ही तरह आयुर्वेद के एक वैध जी पधारे थे। हमने उन्हें हमारे उजाड पडे एक पुराने छप्पर में औषधालय बनाने की इजाजत दे दी थी। अगर आप चाहें,तों हमारे जानवरों के बाडे में अपना संस्कृत विधालय खोल सकते हैं। और तो हम क्या कर सकते हैं। आप राज्य कर्मचारी हैं और हम भी किसी न किसी रूप में सरकार से जुडे हैं। “

“जानवरों के बाडे में.........? “

“और क्या संस्कृत विधालय के लिए रावला (हवेली) खाली करवा दें ? ”सरपंच ने खीजते हुए कहा ।

“आप तो बुरा मान गये सरपंच साहब ! “

‘हमारे बुरा-भला मानने की बात नहीं है।हम आपको असलियत बता रहे हैं। “

“मेरा मतलब था कि संस्कृत विधालय तो गुरूकुल परम्परानुसार किसी खुले और शांत स्थान पर होना चाहिए ।“

“अजी आप गुरूकुल बनाओ या विधापीठ, आपको मना किसने किया है? आप विश्वामित्र

बनो या द्रोणाचार्य, हमें इससे भी सरोकार नहीं। लेकिन गुरूकुल के लिए किसी दशरथ या शांतनु को अवशय ढूँढ लेना । वैधराज जी ने खुद अपने हाथों दिन-रात मेहनत करके छप्पर को उठने-बैठने लायक बनाया है मतलब यह कि औषधालय खुद बनाया है और आज भी भगवान धन्वन्तरी के सामने बैठे अपने मोटे-मोटे ग्रंथो में च्यवनप्राश के नुस्खे देखते रहते हैं। साल भर से गाँववालों को तोते की तरह आयुर्वेद का राम-नाम रटाते रहने पर भी कभी भूले-भटके एक-आध मरीज ही आया होगा। सुई लगवाकर फटाफट काम पर जाने वाले मजदूर किसान, आयुर्वेद की इंतजार में हफ्तों चारपाई पर पडे नहीं रह सकते। आप भी अपना भाग्य आजमा कर देख लीजिए । “

“सरकार तो अपनी संस्कृति की प्राचीन परम्पराओं को पुनः स्थापित करना चाहती है और लोग........

“सरकार की आपने भली चलाई। सरकार तो न जाने क्या –क्या चाहती है।सरकार की नीतियां तो ऐसी हैं कि उन्हें उन्हीं अर्थों में लागू किया जाए तो यह देश फिर से स्वर्ग बन जाए। फिर से जगतगुरू कहलाने लगे। क्या नीति बनाने वाले और उन्हें लागू करने वाले स्वयं उन नीतियों पर अमल करते हैं ? आपको इस छोटे से गाँव में संस्कृत तो क्या, हिन्दी के सरकारी स्कूल के इलावा दूसरा मिल जाए तो बताना । “

धर्मपाल निरूत्तर हो गया। सच ही तो कह रहे थे सरपंच जी। शहर में रहने वाले बडे लोगों की तो बात ही क्या,यहां गाँव में रह रहे छोटे- मोटे अधिकारी तक अपने बच्चों को अँग्रेजी स्कूल में पढाना चाहते हैं। यदि निष्ठापूर्र्वक राजभाषा नीति को क्रार्यान्वित किया गया होता, तो आज पैंसठ साल बाद देश में राजभाषा लागू करने के लिए राजभाषा अधिकारियों की आवश्यकता न होती।

धर्मपाल के मन को ठेस लगी थी। आचार्य बनने के उसके सपने तार-तार हो गये थे। भीनी-भीनी सुगन्धित वल्लरियों से आच्छादित सुन्दर उद्धान के मध्य स्थित उसकी कल्पना का संस्कृत गुरूकुल ताश के महल सा धराशायी होगया था। उसने मुरझाए स्वर में कहा “आप की बात तो सही है,लेकिन जानवरों के बाडे में संस्कृत विधालय शुरू करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं जान पडता। आप कुछ दिनों के लिए मेरे ठहरने की व्यवस्था करवा दें। मैं किसी अन्य स्थान के लिए प्रयास कर देखना चाहता हूँ। “

“रावले में पाँच-पच्चीस लोग रोज टिके रहते हैं। आप भी अपनी अटेची पौल (ड्योढी) में रख लो। जहाँ सौ लोग जीमते (खाते) हैं, वहाँ एक-दो और सही। लेकिन स्नान-ध्यान के लिए आपको कुएँ पर ही जाना होगा। “

“उसके लिए मैं आपको कष्ट न दूँगा। “

“अजी इसमें कष्ट माने तो क्या और न माने तो क्या। बडा आदमी होना कोई छोटी बात है? रावले की तो सदियों से यह परम्परा चली आ रही है कि जब तक सौ-दो सौ पत्तलें जूठी न हों, तो जीमना क्या हुआ ? हाथियों के शौकिन चारे-भूसे का हिसाब नहीं रखते । ” सरपंच जी ने गर्वपूर्वक कहा।

“बडो हुकूम ।“ धर्मपाल ने स्वीकार में सिर झुकाते हुए कहा। शायद वह उनके अहम के बिन्दु तक पहुँच गया था।

सरपंच साहब खुश हो गये थे। उन्होंने तत्काल एक व्यक्ति को बुला कर धर्मपाल के ठहरने की व्यवस्था करवा दी। परिस्थितियों से विवश धर्मपाल ने समय का तमाचा सिर झुका कर सहन कर लिया।

कई दिनों की भाग-दौड के बाद गाँव के अन्तिम छोर पर स्थित समाज विशेष के मंदिर में संस्कृत विधालय आरम्भ करने का जुगाड हो पाया। मंदिर के साथ ही एक छोटा सा क्च्चा कमरा भी था, लेकिन खिडकी-रोशनदान के अभाव में उसमें स्थायी रूप से अँधेरा और घुटन थी। मंदिर और कमरे के बीच कोई दो सौ वर्ग गज खाली मैदान था। जानवरों के बाडे की अपेक्षा धर्मपाल ने यह स्थान अधिक उपयुक्त समझा। कुछ उत्साही व्यक्तियों के आर्थिक सहयोग से मेज-कुर्सी, श्यामपट्ट,बच्चों के बैठने के लिए टाट तथा उपस्थिति पंजिका की व्यवस्था की और एक मीटर पीले कपडे पर नील से “राजकीय प्राथमिक संस्कृत विधालय” स्वयं लिख कर इमली के पेड के नीचे पाँच शिशयों को पढाना प्रारम्भ कर दिया।

गाँव के किशोरों की सहायता से उसने खाली पडी जगह के दो ओर कंटीली झाडियों की बाड लगा कर मंदिर तथा कमरे के बीच का स्थान घेर लिया था। कमरे में गोबर-मीट्टी की पुताई करके सामान रखने तथा स्वयं के रहने की व्यवस्था की और फिर विधार्थियों की संख्या वृद्धि में जुट गया। वह घर-घर जाकर लोगों को समझाता और पाँच-सात नये विधार्थी प्रति दिन पकड लाता था। अगले दिन उनमें से कई भाग भी जाते, लेकिन वह निराश नहीं हुआ। छः महीनों में ही विधार्थियों की संख्या साठ तक पहुंच गई थी।अधिकारियों के भी एक-दो बच्चे वह झटक लाया था जो उसके लिए गौरव की बात थी।

विधालय में अधिकारियों के बच्चे आने से अधिकारियों का भी आना-जाना हो गया था। कई बार ऐसे भी अवसर आये जब धर्मपाल को दूसरी कुर्सी के अभाव में झेंप का सामना करना पडा। बच्चों के बैठने के लिए टाट कम पड गई थी। चाक-डस्टर स्वयं धर्मपाल को अपनी जेब से खरीद कर लाना पडता था।प्रशासन को उसने कितने ही पत्र लिखे,किंतु कोई सुनता ही न था और तो और उसे अब तक वेतन भी नहीं मिला था। वह कई बार खीज उठता और प्रशासन को कोसने लगता। वह सोचता यह कैसी नौकरी है? विधालय की व्यवस्था स्वयं करो, आवश्यक सामान लोगों से चँदा लेकर जुटाओ और अपरिचित स्थान पर बिना वेतन काम करो। इससे तो अच्छा होता यदि वह अपना प्राइवेट अँग्रेजी स्कूल खोल कर बैठ जाता। गाँव में उसे मान-सम्मान, रूपया-पैसा सब मिलता।

बरसात के दिनों में तो धर्मपाल अपना डेरा-डम्मा समेट कर भागने को तैयार हो गया था। घुटन और सीलन भरे अँधेरे कमरे में बच्चों को बैठना अमानवीय व्यवहार था और दस फुट के मंदिर में साठ बच्चों को ठूँस पाना असम्भव था। मूसलाधार वर्षा में इमली का वृक्ष बच्चों की रक्षा करने में असमर्थ था और धर्मपाल सब ओर से विवश था। नन्हें-नन्हें अबोध बालक वर्षा में भीग कर जब कंपकंपाने लगते,तो उसका कलेजा मुँह को आता । विवशता में छुट्टी की घोषणा कर वह वहीं अपनी कुर्सी पर बैठा सत्याग्रह पर दृढ रहता।

लेकिन वर्षा ऋतु कोई एक-दो दिन में समाप्त होने वाली तो थी नहीं। रोज-रोज भीगने से धर्मपाल को ज्वर आ गया । उसकी उठने-बैठने की हिम्मत न रही । ज्वर से बेसुध वह अपने अँधेरे कमरे में पडा रहता। छोटे-छोटे विधार्थी रोज विधालय आते और असहाय पडे गुरूजी को देख कर लौट जाते। हरीश तो उनकी हालत देख कर विह्व्ल हो उठता और अपने कोमल हाथों से उनका माथा सहलाता। आज उसके नियंत्रण का बाँध टूट गया। वह रोता हुआ अपने घर की ओर दौड पडा।

वैधराज जी औषधालय बंद करके कहीं जाने की तैयारी में थे । उन्होंने बच्चे को रोता देखा तो पूछ लिया “ क्या हुआ बेटा ! किसी ने मारा तुम्हेँ ? “

“नहीं, हमारे गुरूजी को तेज बुखार है।“ हरीश ने हिचकियों के बीच कहा और ऊँचे स्वर में रो पडा।

“बहादुर बच्चे रोते नहीं। गुरू जी का बुखार अभी उतर जायेगा। बुखार कब से है ? “

“दो-तीन दिन हो गये। रोज बारिश में भीगते थे।“

“तुमने पहले क्यौं नहीं बताया। रोज तो तुम इधर से घर जाते हो।“

“मुझे आपका तो ध्यान ही नहीं रहा। मैने मेरे पिता जी को बताया था। वे कम्पाउंडर साहब को लेकर भी गये थे। लेकिन गुरूजी तो वैसे ही पडे हैं।“

“चलो मैं देखता हूँ । “ उन्होंने कहा और औषधालय से कुछ औषधि लेकर उसके साथ विधालय की ओर चले।

धर्मपाल अपने छोटे से अँधेरे कमरे में जमीन पर बिस्तर लगाए बेसुध पडा था। एक नन्हीं सी बच्ची उसके सिरहाने बैठी उसे टुकुर-टुकुर देख रही थी।

वैधराज जी ने उनकी हालत देखते ही अपनी कार्यवाही शुरू कर दी। उन्होंने पडौस के घर से एक गिलास ताजा पानी मंगवाकर धर्मपाल को औषधि खिलाई और फिर हरीश को दुकान से एक कप चाय लाने को भेजा। हरीश,शैलजा और वैधराज जी की सेवा सुश्रुषा से धर्मपाल शीघ्र ही पुनः चलने-फिरने लायक हो गया। वह संध्या समय नियमित रूप वैध जी के पास जाता। यदि किसी दिन वह न जा पाता, तो वैधराज जी स्वयं उसे देखने आ जाते थे। विश्व की प्राचीनतम संस्कृति के दो समर्पित पोषकों की मित्रता प्रगाढ होती गई और वे एक-दूसरे के पूरक बन गये।

प्रशासन से दुखी धर्मपाल आर या पार का निर्णय ले कर उच्चाधिकारियों के सम्मुख उपस्थित हुआ और उन्हें अपनी कठिनाइयों तथा विधालय की प्रगति का विवरण दिया तो उनकी ऩींद खुली। निदेशक महोदय धर्मपाल की कर्तव्यनिष्ठा से अभिभूत हो गये थे। उन्होंने आकाँक्षापुर संस्कृत विधालय के लिए आवश्यक सुविधाएं तत्काल उपलब्ध करवाने की कारगर व्यवस्था करवाई तो धर्मपाल भी नव स्फूर्ति लेकर लौटा।सहायक अध्यापिका की नियुक्ति से धर्मपाल को कुछ राहत मिली। उसने विधार्थियों की संख्या बढाने के लिये दिन-रात एक कर दिया। नया सत्र आरम्भ होते ही वह दूसरी पाठशालाओं के बच्चे भी खींच लाया। उधर वैधराज जी भी संस्कृत विधालय के लाभ गिनाते न थकते थे। आजकल उनका औषधालय भी खूब चल निकला था। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र तो अपने निर्धारित समय पर ही खुलता और बंद होता था, किंतु आयुर्वेद औषधालय का कोई समय न था । दिन भर रोगियों का तांता लगा रहता । बल्कि बहुत से रोगियों को देखने के लिये तो वैधराज जी को आस-पास के गाँवों में जाना पडता था।

विधार्थियों की संख्या डेढ सौ से ऊपर पहुँच गई थी। कक्षा पाँच तक के बालक-बालिकाओं को दो भागों में बाँट दिया गया था। प्रथम तथा पाँचवीं की कक्षाएं धर्मपाल सम्भालता था और बीच की तीन कक्षाएं सहायक अध्यापिका । प्रथम बार पाठसाला आए बच्चों को वह छोटी-छोटी दिलचस्प कहानियां सुनाता, उन्हें खूब खिलाता,उनके लिए वह कभी ऊँट,कभी घोडा,कभी भालू और कभी बंदर बनता। उसे वे बच्चे अपने लगते थे। बच्चे भी उसे बहुत प्यार करते थे।वह छोटे-छोटे बच्चों के घेरे में बैठा उनके साथ खेल रहा था। तभी वहाँ ढलती उम्र का एक सूट-बूट धारी साहब आया। गाँव के एक लडके ने उसका सूटकेस और बिस्तरबंद अपने सिर पर उठा रखा था। बच्चे सहमें से उसे देखने लगे।

“यहाँ का इंचार्ज कौन है ? “ उसने धर्मपाल से पूछा। काले चश्में में उसकी आँखों की प्रतिक्रिया दिखाई न पडती थी किंतु चेहरे से वह काफी परेशान लग रहा था।

“जी मैं ही इंचार्ज हूँ । “ धर्मपाल ने खडे होकर अपने कपडे झाडते हुए शालीनतापूर्वक उत्तर दिया।

“यू.....! फिर क्या स्कूल चलता होगा ।एनी वे,आई हैव बीन अपांटेड प्रिंसिपल हीयर ।“ उसने कोट की जेब से एक कागज निकाला। किंतु धर्मपाल की ओर देख कर उसे पुनः जेब में डाल लिया।

“आपका स्वागत है श्रीमान, पधारिये ।“ धर्मपाल ने इमली के पेड नीचे श्यामपट्ट के पास रखी कुर्सी की ओर बढते हुए कहा ।

“आई एम सारी टू इन्फार्म, दट यू हैव बीन ट्राँसफर्ड टू उपेक्षापुर वीद इमिजियेट इफेकट ।“

उसने कहा और आगे बढ कर कुर्सी पर बैठ गया ।

धर्मपाल अवाक खडा रह गया।बच्चों को कुछ समझ नहीं आया। वे कभी कुर्सी पर बैठे साहब की ओर और कभी उसके सामने अपराधी समान मौन खडे गुरूजी को टुकुर-टुकुर देख रहे थे। उनसे कुछ दूर मंदिर के सामने बच्चों को पढा रही सहायक अध्यापिका गुमसुम बैठी उन्हें देख रही थी। ***


--प्रभु मंढइय़ा “विकल”

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