हमारी अधूरी कहानी…

अर्जुन एक कन्सट्रक्शन कम्पनी में पी एम था लेकिन आज थोड़ा परेशान था हो भी क्यों न आखिर उसे डाँट जो पड़ी थी वो भी जी एम सर से । हुआ कुछ यूँ दो दिन पहले ही उसे जो रिर्पोट सबमिट करनी थी वो आज भी न हो पाई थी और उसकी वजह थी अरनव । अरनव उसी कम्पनी में साइट इंजीनियर था और सारे काम का लिखित उसी के पास था और तो और जनाब कल से आए भी न थे । खैर बिना बताए छुट्टी मारने और अपनी डाँट का बदला लेने के लिए उसके पास कल तक का इंतजार करने के सिवा कुछ न था....बस फिर क्या जैसे ही अरनव जी आए उन्हें पेश होना पड़ा। हालांकि अब तक गुस्सा ठंडा हो चुका था तो तसल्ली से इस गुस्ताख़ी की वजह पूँछी और वजह सुन के न जाने क्या हुआ कि अर्जुन ख्यालों के घेरों में गुम हो गया । अरनव ने तो सिर्फ फरवरी की उस १४ तारीख का जिक्र मात्र ही किया था जिसका न जाने कितने प्रेमी जोड़े साल भर का इंतजार करते हैं पर अर्जुन के लिए कभी ये किसी त्यौहार से कम नहीं था उसकी अपनी "अलिफ्जा" का वर्थ डे जो होता था उस दिन ।

अलिफ्जा से उसकी न भूलने वाली मुलाक़ात कुछ पाँच साल पहले हुई थी और भूला भी कैसे जा सकता है जनाब जो वक्त पर काम आया हो । सिविल इंजीनियरिंग से बी टेक करने के बाद सरकारी नौकरी भूत सवार था| इसी सिलसिले मे रेलवे के एक्जाम का सेन्टर पडा "इलाहाबाद" सन्गम तट यानी कई नदियों के मिलने का स्थान तो भला दिल कैसे पीछे रहते । लेकिन भारतीय रेल की आदत इतनी मशहूर है जाहिर है उस दिन भी एसा ही हुआ "ट्रेन अपने निर्धारित समय से ४ घंटे विलम्ब से पहुँची है" कम्पयूटर की इस मधुर आवाज ने एहसास दिलाया कि बेटा अब तो बहुत लेट हो चुके हो तुम । घड़ी पर नजर के बाद तो होश ही उड गए १०:२० यानी सिर्फ ४० मिनट बचे हैं और हम बेचारे इंजीनियर साहब को ये भी नहीं पता कि जाना किस दिशा में है खैर जैसे तैसे बैग ले के बाहर निकले और अपना एडमिट कार्ड लिए कभी इस से तो कभी उस से ऐसे पूँछ रहे मानो किसी कम्पनी के सेल्समैन हो और अपने प्रोडक्ट के लिए डोर टू डोर भटक के पूँछ रहे हो । फिर एक मिठाई की दुकान पर पूँछने गया कि भैया ये कॅालेज कहाँ पडेगा...तभी उसी के पास स्कूटी पर बैठी मोहतरमा ने हाथ से इशारा कर के एडमिट कार्ड माँग लिया पूरा एड्रेस पढने के बाद रास्ता बता दिया ... पर तब तक हमारे १५ मिनट से भी ज्यादा पूँछताछ की भेंट चढ चुके थे उनके मुताबिक रास्ता ३० मिनट का था आटो से..... अगर वो भी मिल जाए टाइम पर तो फिर मैंने उनसे शार्टकट रास्ता पूँछा जिससे जल्दी पहुच सके ......बताया कि ११:०० से एक्जाम स्टार्ट है और मैं पहले से ही लेट हूँ अगर......बस इतना ही बोल पाया होगा मैंने कि-- बोल पडी चलो आजाओ पीछे बैठ जाओ.... मुझे भी उसी तरफ जाना है थोडा और छोड दूँगी !! उसका अन्दाज देख मैं तो देखता ही रह गया...इतना हेल्पिंग नेचर ..!!

इतनी हड़बड़ी में था कि उसका चेहरा अब जाके देखा था गौर से ..... काले लम्बे बाल, ठोडा लम्बा चेहरा, बड़ी बड़ी आँखे और उस पर बड़ि ही नजाकत से यूज किया हुआ "आई लाइनर" मजाल जो एक इन्च भी इधर उधर हुआ हो - अगर आर्ट सब्जेक्ट लिया होगा तो १०० नं० ही आए होंगे । सोचते हुए मैं पीछे बैठ लिया .... बाइक का मुझे बहुत पहले से शौक था और फिर जब कोई पीछे बैठा हुआ हो तो स्टंट करके उसे डराना क्या कहना -- लेकिन आज मुझे उन व्यक्तियों की चीखों का प्रायोगिक अनुभव होने लगा था । स्कूटी कभी इस कोने से कभी उस गली से कभी उस ट्रक के करीब से तो कभी तेजी से ब्रेक मारती हुई आगे बढ रही थी और हम अपना बैलेंस बना के डटे हुए थे खैर सारी बाधाओ को पार कर आखिर हम अपनी मंजिल पर थे । १५ मिनट में पहुंच कर अब हम खुश थे । मैंने हाथ बढाकर कहा हैलो मैं अर्जुन थैंक्स आज आपकी वजह से ......मेरी बात एक बार फिर अधूरी रह गई बीच में ही हाथ थाम कर कहा मैं "अलिफ्जा" और थैक्स की क्या जरुरत हमने इसके लिए थोडे न तुम्हारी मदद की उसका यह स्पर्श मुझे अन्दर तक हिला गया था व बेबाकी भरा अन्दाज दिल को । हमेशा कि तरह इस बार भी लडकियो के सामने घबराने वाला अर्जुन आज फिर वही कहानी दोहरा गया । जब तक होश में आते जनाब तब देर हो चुकी थी वह जा चुकी थी लेकिन उसकी स्कूटी का नं०-यूपी ७० -ऐ एल ७०*६ उसके दिमाग में उतर चुका था ।वो तो जा चुकी थी पर उसको दोबारा मिलने की ख्वाहिस लिए जैसे तैसे मैंने पेपर पूरा किया जब सुबह की मुलाकात इतनी खूबसूरत हो चुकी हो तो भला पेपर कैसा गया होगा आप लोग अंदाज़ा लगा ही सकते है।

अपने भारत मैं एक बात अच्छी है रूपए से आप सारा काम करवा सकते है तो फिर हम भला क्यों पीछे रहते। अपने एक इलाहबाद के मित्र अरुन चौधरी से हमने स्कूटी के नं ० का पूरा ब्यौरा आर टी ओ दफ्तर के बाबू को चढ़ावा देकर निकलवा लिया। अब जरुरत थी तो बस उसके बारे मैं जानने की वो भी कोई कठिन काम न था....... जब तक आपके पास सर्च इंजन जैसे दोस्त हो तब तक आपको कोई दिक्कत नहीं हो सकती। कमीनो को मुझसे ज्यादा दिलचस्पी थी उसमे सो.... बिना समय गंवाए दो तीन दिन में पता लगा लिया ..... जैसे इलाहबाद यूनिवर्सिटी में आर्ट डिपार्टमेंट की स्टूडेंट है, यूनिवर्सिटी में भी सिर्फ गिने चुने लोगो का ग्रुप है जिसमे अवंतिका , अनन्या ,श्रुति जैसी दो चार शांत स्वाभाव की लडकियां रहती है खैर अब सवाल ये था की मुलाकात कैसे की जाए इसीलिए तो हमने अरुण के यहाँ रुकने का फैसला किया फिर काफी हिम्मत करके मैडम को यूनिवर्सिटी के बहार एक दिन मिल ही लिया |

हैलो :में अर्जुन पहचाना

वो :नही

मैं : अरे यार याद नहीं हम एक महीने पहले मिले थे आपने हमें लिफ्ट दे कर एग्जाम सेंटर तक पहुँचाया था ?

अल्फीजा : हाँ हाँ याद आया। और कैसे हो ? यहाँ कैसे फिर कोई एग्जाम है क्या ??

मैं : अरे नहीं अब में यहीं रहता हूँ। एक कस्ट्रक्शन कंपनी में जॉब मिली है।.......

वो : चलो ठीक अच्छा है। और एग्जाम अच्छा गया था।

मैं : मैंने कहा क्या ख़ाक अच्छा गया आपने एक एहसान करके मेरी तो किस्मत ही बदल दी......... आपके चेहरे के आगे तो पेपर दिखाई ही नहीं दिया

........वो बोली अच्छा जी तो आपका मतलब हमे उस दिन मदद नहीं करनी चाहिए थी।

मैंने मौका पर चौका जड़ने का पूरा प्रयास किया .......मेरा ऐसा मतलब नहीं था चलो एक कप कॉफी हो जाए वहीँ बैठ के डिसकस करते है।

लेकिन उसने अपने पारवारिक कारणों का हवाला देकर उस दिन हमसे पीछा छूटा लिया।

हम भी ठहरे ढीट इंसान ....पूरे चार दिनो तक यूनिवर्सिटी के गेट पर रोज़ चक्कर व हेलो हाय से एक दिन उसे मना ही लिया।

और हम "आज मैं ऊपर आसमा नीचे " गीत जैसी फीलिंग्स लेकर पास के ही एक रेस्त्रां में थे।

इधर उधर की बाते करते हुए मैंने उसे बताया की किस तरह मैंने तुम्हारे बारे मैं पता लगाया क्या क्या किया नहीं किया तुमसे मिलने के लिए और मैं यहाँ कोई जॉब नहीं करता हूँ सिर्फ तुमसे मिलने आया था। मैं तुमसे पसंद करने लगा था उसी दिन से तुम्हारे उस अंदाज़ से तुम्हारी उस व्यवहार से। हँसते हुए बोली बस हो गया आशिक़ जी। ख्याली दुनिया से बहार आओ जनाब ये फिल्म नहीं की सब वैसा हो जाए जैसा सोचा है…हमे प्यार करने की इज़ाज़त नहीं है हम एक नहीं हो सकते क्यूंकि हम अलग हैं तुम हिन्दू मैं मुस्लिम ….और वैसे भी प्यार तुमने किया है मैंने तो नहीं। चलो अब चले … बहुत लेट हूँ पहले से ही… मैं भी मौका गवाना नहीं चाहता था आखिर जिसके लिए इतनी महनत की उसी को ऐसे कैसे कैसे जाने देता। फिल्मे बचपन से पसंद थी तो किसी फिल्म का डायलॉग भी मार दिया .... मैडम दोस्त तो बन सकते है एक मौका दो समझने का हमे यकीं दिलाता हूँ खुद को भूल जाओगी। पीछे मुड़कर बोली अच्छा जाओ दिया ..और सिर्फ एक कागज पर अपना ऍफ़ बी एड्रेस लिख के पकड़ा दिया |

फिर आये दिन फेसबुक पर बात हो जाती थी मिनटों से सुरु हुए इन बातो का सफर अब घंटो और न जाने कब रातो में ..रातो का सफर जज्बातों में और जज्बात .... कयानातों में बदल चुके थे। हमारा ये सफर अगस्त की गर्मी से जनवरी के जाड़े तक दस्तक दे चूका था और मेरा प्यार भी बढ़ चूका था। अब फरबरी आ रही थी और उसका जन्मदिन भी हमको भी मिलने का बहाना मिल गया.... हम दोनों दूसरी बार मिल रहे थे लेकिन पिछली बार से अलग मैं दिल में थोड़ा सा प्यार लिए…. वो चाहत का अधिकार लिए । हमने भी खास तयारी की थी... खास मैरून रंग की चेकशर्ट ..नयी गहरे नीले रंग की जीन्स की पतलून और हाँ लोकल रीबॉक के शू जो एक महीने के बाद ही फट गए खैर उससे क्या .. इम्प्रैशन बनना चाहिए था और वैसे भी पैसे गिफ्ट्स खरीदना था उसके लिए | अब बारी थी उसके गिफ्ट की ......तो एक ब्रांडेड घडी और एक पिंक कलर का हैंड बैग लिए था गिफ्ट में...वो भी पूरे दो दिन सोचने के बाद यही दो चीज़ सही लगी शॉपकीपर के आईडिया से साथ में एक ग्रीटिंग कार्ड क्यूंकि मैं इस हर एक लम्हे को खास बनाना चाहता था आखिर मोह्हबत का इज़हार जो करना था अपनी पहली मोहब्बत का ||

हम लोग इलाहाबाद के एक रेस्त्रां में मिले फिर उसको गिफ्ट देने के बाद मैंने उसको ग्रीटिंग पकड़ा दिया जिसमे मेरे जज्बात लिखे थे जो २७ राते और पूरे २०० पेज फाड़ने के बाद लिखने लायक बन पाये थे। वो उसको पड़ती उससे पहले ही मैंने उसका हाथ थाम लिया .....घुटनो के बल बैठ कर सब के सामने कांपती हुयी आवाज़ से अपने प्यार का इज़हार कर दिया।

पहले वो इस अचानक की घटना से घबराई पर थोड़ी देर बाद सम्हल कर आँखों में आंसू ले कर बोली तुम क्यों नहीं समझते अर्जुन इतनी छोटी सी बात हम सिर्फ एक अच्छे दोस्त हैं पर कभी एक नहीं हो सकते हमारा तुम्हारा -धर्म अलग है ,तौर तरीका अलग है, खान-पान अलग है, रीति-रिवाज़ अलग है, और हमारी फैमिली की मानसिकता भी। तुम नहीं जानते अर्जुन आज मैं यहाँ तुम्हारे सामने ऐसे कैसे खड़ी हूँ यहाँ पर आने के लिए क्या क्या नहीं सहा मैंने ... मेरे अब्बा कभी नहीं मानेगे प्लीज बेहतर होगा ये बात तुम भी समझ जाओ... मैंने भी भरोसे में लेते हुए कहा जानता हूँ हम अलग हैं लेकिन हम एक होंगे बस तुम साथ दो मेरा ....खैर आज की मुलाकात आंसुओ की भेंट चढ़ चुकी थी जैसे तैसे स्थति नार्मल करके हम लोग फिर से मुस्कान लिए वापस निकले और अब वादा हो चूका था की जल्दी से जल्दी अपनी फैमिली को मनाना है। उसके सामने ताक़त दिखाने वाला मैं कमजोर था जिसने अपने पिताजी से कभी आँख नहीं मिलायी उसी को किसी लड़की का हाथ मागने का जिक्र करना था। और इसी इतेज़ार मैं की कब सही टाइम मिले पांच महीने बीत गए पता ही नहीं पर हमे यकीं था हम उन्हें ममाँ ही लेंगे इसी बीच मैंने प्राइवेट सेक्टर में जॉब भी ज्वाइन कर ली। लेकिन हमारे बातो का सिलसिला जारी रहा महीने भर में मुलाकात भी हो जाती थी कभी कभार तो दो बार भी। तभी एक दिन उसने बताया की उसके निकाह की बाते हो रही थी घर मैं एक अज़हर नाम के लड़के के साथ. ..उसके अब्बा के दोस्त का लड़का है। ज्यादा पता नहीं पर छोटी बहिन से मालूम चला अगले हफ्ते देखने भी आ रहे है वो लोग ..मैं एकदम सुन्न पड़ गया ज्यादा वक्त नहीं बचा था हम दोनों के पास मैंने जैसे तैसे हिम्मत बंधा कर उसको घर पर बताने के लिए राज़ी किया.... पर शायद हम दोनों की ये सबसे बड़ी भूल थी .उस दिन के बाद से तो मानो उस पर कहर के पहाड़ टूटने लगे उसको घर से न निकलने किसी से बात न करने फ़ोन न रखने और भी कई सारे फतवे जारी कर दिए गए .....बड़ी मुश्किल से उसकी छोटी बहिन से मालूम पड़ा की उसका कॉलेज भी बंद करा दिया उसकी शादी भी दिसंबर मैं फिक्स कर दी गई है।

... कोई क्यों नहीं समझ पाता आसानी से दो प्यार करने वालो को क्यूँ प्यार करने वालो के बीच मैं धर्म , जाती पाती उंच नीच आती ... क्यों सिर्फ इंसानियत नहीं आती। हमने उसके घर वालो से मिलने का फैसला किया नतीजा कुछ नहीं निकला बल्कि कछ मुक्के और लात खा कर उलटे वापस आना पड़ा। उसकी छुटकी के फ़ोन से बात हो जाती थी कभी कभी सिर्फ हाल मिल जाया करते थे। छुटकी ने किसी काम के बहाने से एक दिन अपने फैमिली को मनाकर मुझसे मिलवा दिया कौन जनता था ये मेरी उससे आखिरी मुलाकात थी। चेहरा मुरझाया हुआ आँखे सूजी हुयी जिन पर कभी बड़ी ही बारीकी से किसी आर्टिस्ट की तरह आईलाइनर हुआ करता था आज उन्ही पर एक छोटे बच्चे की आर्ट की बुक की तरह काजल इधर उधर बिखरा हुआ था लम्बा चेहरा अब सूज के गोल सा लगने लगा था। मैंने ही बात सुरु की कैसी हो ... कुछ ना कहा बस एक टक देखती रही ..कुछ देर बाद .... रोते हुए बोली मैंने कहा था तुमसे तुम भी समझ जाओ हम एक नहीं हो सकते उस दिन मान जाते तो आज ये दिन नहीं आता जिसके बिन एक पल नहीं कटता उसके बिन सारी जिंदगी .... कैसे अर्जुन कैसे। मैंने उसके सामने एक ऑप्शन भी रखा हम लोग कहीं दूर जाके शादी कर लेंगे फिर तो उन्हें मानना पड़ेगा। लेकिन नहीं उसने मना कर दिया अपनी खुसी के लिए किसी और को तकलीफ नहीं दे सकती उसकी छोटी बहिन भी है समाज में इज़्ज़त नहीं रह जाएगी उसके पापा की ...उसके पापा इलाहाबाद हाई कोर्ट में वकील थे।

हम मजबूर थे हमने सोचा भी न था की हमारी लव स्टोरी सिर्फ इसलिए फेल होगी क्यूंकि हम एक धर्म एक जाती के नहीं थे। काश मैं समाज़ के इन नियमो को पहले समझ पता पर क्या करता दिल किसी पर पूछ कर तो नहीं आता ना। वो जाने लगी और एक बात जिससे मुझे आशंकित कर दिया बोल के गयी थी "अगर हम एक दूसरे के न हो सके तो किसी दूसरे के भी न होंगे ". बहुत बार फ़ोन पर भी समझाया पर नहीं ... अपनी सारी कोशिश जोर आज़मा कर भी जब अंतिम समय तक किसी घरवाले का दिल नहीं पिघला तो उसने अपनी निकाह के दो दिन पहले किसी नशीली चीज़ को खाकर अपनी जान दे दी।

ये खबर जैसे ही हमे पता चली पैरों तले से ज़मीन खिसक गयी ये सब मेरी वजह से ही हुआ था न मैं प्यार करता और न वो अपनी जान देती पर अब क्यासिवय पछतावे के… इतनी सुलझी हुयी इतनी समझदार हमारी अल्फ़िज़ा आखिर ऐसा कर सकती थी हमेशा मुस्कराने वाली आज न जाने कितनो के चेहरे पर उदाशि दे गयी थी समाज के नियमो की हमारी झूटी शान और इज़्ज़त ने एक और जान ले ली थी।

और इस तरह अल्फ़िज़ा और अर्जुन की प्यार की कहानी अधूरी भी रह गयी थी

अर्जुन ने भी साडी जिंदगी अकेले रहने का फैसला लेकर -----उसकी यादो को , उसकी इच्छा को ---“अगर हम एक दूसरे के न हो सके तो किसी दूसरे के भी न होंगे ” सदा अपने जेहन में जिन्दा रखने का फैसला लिया…और जीवन भर किसी से शादी न करने का खुद से वादा किया ||

दो साल पहले हुयी इस कभी न भूलने वाली घटना को सोचते हुए अर्जुन की आँख भर आई और आँशु पोछते हुए अपने केबिन से बाहर निकल कर फिर से काम में लग गया ||

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