पहला परिच्छेद - तैयारी

नम्बुल नदी की टेढ़ी-मेढ़ी जल-धारा दक्षिण दिशा की ओर बहते हुए काँची पर्वत की तलहटी में जहाँ क्षण-भर को विश्राम करती है, वहाँ से पश्चिमी दिशा में एक साफ-सुथरा छोटा-सा घर था। सन्ध्या के सयम एक विद्यार्थी दीया जलाकर बरामदे के एक कोने में अध्ययन कर रहा था। ''राजकुमार विरेन्द्र सिंह वारुणी (वारुणी : एक स्थानीय धार्मिक पर्व। यह पर्व मणिपुरी वर्ष के अन्तिम माह 'लम्दा' के कृष्ण-पक्ष की त्रयोदशी को मणिपुर के मैदानी क्षेत्र के पूर्व में स्थित नोङ् माइजिङ् नामक पहाड़ पर मनाया जाता है। इस दिन लोग नोङ माइजिङ् पर्वत पर स्थित महादेव के मन्दिर और गुफा में देव-दर्शन को जाते हैं।) दर्शन को चलें!'' कहते-कहते एक अनपढ़ युवक उस विद्यार्थी के समीप आकर बगल में बैठने को हुआ। वह, सन्ध्या को कोलाहल बीत जाने और पढ़ने वाले बच्चों का ध्यान रसोईघर की ओर खींचने का समय था। विद्यार्थी ध्यानपूर्वक पढ़ रहा था, किन्तु उस कर्कश आवाज को सुनकर उसने आँखें उठाकर देखा पास में उसका मित्र शशि बैठा दिखाई दिया; शशि के अलावा अन्य चार-पाँच युवक भी उसे घेरे बैठे थे। ''वारुणी-दर्शन को चलने के लिए पूछा था, शायद जाना नहीं चाहते, उत्तर तक नहीं दिया'' कहते हुए शशि ने वीरेन् के सामने खुली पड़ी किताब उठाकर उसके पन्ने पलटने शुरू किए और यह कहते हुए कि इसमें तो एक भी चित्र नहीं है, दूर फेंक दी। वीरेन् सिंह निरुपाय होकर गुद्धी खुजलाते हुए बोला, ''मित्र! हमारी परीक्षा नजदीक आ रही है, इस बार देव-दर्शन को नहीं जा सकूँगा।'' शशि ने कहा, ''तुम तो सदा ही बोलते रहते हो 'परखा होनेवाली है', घूमने-फिरने में साथ नहीं देते हो, पर्व-त्योहारों में भी भाग नहीं लेते हो।' देखो, परखा भी होगी, देव-दर्शन को भी जाओगे, घूमने-फिरने में भी साथ दोगे; संसार के इन पर्वों-त्योहारों में शामिल हुए बिना तुम्हारा फूल-सा जीवन व्यर्थ में ही कुम्हला जाएगा।'' दूसरे युवकों ने भी शशि का समर्थन करते हुए बक-बक करना शुरू किया-किसी युवक ने उसके हाथ से पेंसिल छीनकर उसकी साफ-सुथरी नोट-बुक पर लकीरें खींच दीं, किसी ने 'अंग्रेजी की है' कहते हुए अनपढ़ होने के कारण किताब को उलट-पलटकर गलत-सलत पढ़ना शुरू कर दिया।

वीरेन्द्र ने सोचा, ''अगर मैं न जाने की जिद पर अड़ा रहूँगा, तो इन अनपढ़ लोगों से जान नहीं छूटेगी।'' यह सोचते हुए बोला, ''ठीक है, मैं भी देव-दर्शन् को चलूँगा, अब तो मुझे भूख लगी है, खाने चलता हूँ, तुम लोग भी जाओ, परसों जाते समय मुझे भी जरूर बुला लेना।'' यह कहते हुए वह किताबें और दीया उठाकर घर के अन्दर चला आया। वे भी 'हुक्का पीना है' कहते हुए वीरेन् के पीछे-पीछे आ गए। दरवाजा खुलते ही, अलाव के पास चार-पाँच बुजुर्गों को बैठा देख वे 'वापस चलते हैं' कहकर चुपचाप चले गए। वीरेन् को मुश्किल से छुट्टी मिली। खाना खाने गया तो खाना तैयार नहीं था। छोटी बहन थम्बाल्सना खाना पका रही थी। वह धीरे-धीरे आग जलाते हुए बरामदे में होनेवाली देव-दर्शन की बातें ध्यानपूर्वक सुन रही थी और अपनी माँ शिज (शिज : राज-घराने या राजवंश में ब्याही औरतों के लिए आदरसूचक सम्बोधन-शब्द) से देव-दर्शन को जाने की अनुमति माँग रही थी। माँ शिज ने कहा-''तुम्हारा बड़ा भैया जाएगा, तो तुम भी चली जाना।" यह सुनते ही वह खुश होकर चूल्हे की आग तेज करने लगी, ताकि खाना जल्दी पका सके। वीरेन् यह सोचकर कि खाने की प्रतीक्षा करते हुए किताब ही पढ़े, बिस्तर पर चित लेटकर चुपचाप 'फोक-टेल्स ऑफ बंगाल' पलटने लगा। अलाव के पास बैठे बुजुर्गों के बीच से एक ने अंग्रेजी पढ़ने की आवाज सुनने की इच्छा से कहा, ''किताब चुपचाप पढ़ी जाती है क्या? जोर से, जोर से पढ़ो।'' यह कहते हुए प्रोक्-प्रोक् (प्रोक्-प्रोक् : हुक्का पीने की गुड़गुड़ाहट का ध्वन्यात्मक शब्द) हुक्का पीने लगा। वीरेन् ने देखा, ''बाघ के डर से भागा तो भालू से जा टकराया।'' बुजुर्ग की बात न मानी तो कहेगा, ''चिलम की आगे ठंडी पड़ गई, भर कर लाओ।'' इसलिए मजबूरीवश जोर से अंग्रेजी पढ़ने लगा, किन्तु मन-ही-मन हँसी भी आ रही थी। थोड़ी देर तक सुनने के बाद वह बुजुर्ग खुश होते हुए बोला, ''भाषा तो काफी आ गई है, लेकिन नौकरी नहीं मिलती, इससे कुछ होगा नहीं, पढ़ाई छोड़ दो, कहीं के नहीं रह जाओगे। हमने अपने तोमाल् को भी काम-वाम छुड़वाकर पूरे तीन साल तक स्कूल में पढ़ने भेजा, किन्तु एक पैसा तक नहीं मिलता, हारकर अब तो पढ़ाई छुड़वा दी।'' उसके बाद, स्कूली बच्चों के मुँहजोरी करने, कामचोर होने, छल-फरेब आदि की बातें चलने लगीं। चाहे जहाँ जाए, किसी भी जगह वीरेन् का कोई पक्षधर नहीं मिलता। बस, उसका पक्षधर है तो मात्र उसका पिता।

वीरेन्द्र सिंह के पिता सनाख्या (सनाख्या : राज-परिवार तथा राजवंश में जन्मे पुरुषों के लिए आदर सूचक सम्बोधन-शब्द) गाँव में पैदा होते हुए भी उतने बुद्धू नहीं थे, दूसरों की भाँति फालतू बातें नहीं करते थे, हमेशा यही सोचते रहते थे कि बेटे की शिक्षा कैसे आगे बढ़ाई जाए। इसलिए इतनी सारी बाधाओं को पार करके वीरेन् शिक्षा पा सका। उस दिन सनाख्या किसी काम से बाहर गए थे, उसी अवसर का फायदा उठाते हुए सभी लोग मिलकर वीरेन् की पढ़ाई छुड़वाने का प्रयास कर रहे थे। उन लोगों की बातों से वीरेन् का सिर चकरा गया और वह रसोई में चला गया। खाना परोसना पूरा भी नहीं हुआ कि थाली अपनी ओर खींची और गरम भात को फू-फा फू-फा फूँकते हुए खाना शुरू कर दिया। थम्बालसना थोड़ी-थोड़ी सब्जी परोसते हुए कहने लगी, ''भैया, मुझे भी देव-दर्शन को ले जाइए ना!'' वीरेन् ने थोड़ा-सा क्रोधित होकर, बड़े से कौर से मुँह भरे-भरे उत्तर दिया, ''मुझे जाना ही नहीं, तुम व्यर्थ में क्यों हल्ला करती हो?'' दूसरे लोगों की बक-बक का गुस्सा अपनी निर्दोष छोटी बहन पर उतार दिया। छोटी बहन का भोर के कमल-सा प्रफुल्लित चेहरा पल-भर में ही कुम्हला गया।

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