बेज़ुबान दोस्‍त

पापा का दूसरे शहर में ट्रांसफ़र हो गया था। आज शाम को हमें ट्रेन से निकलना था।

शाम को ट्रेन के इन्‍तज़ार में हम रेलवे स्‍टेशन पर खड़े थे। माँ मुझे उदास देखकर चिन्तित थी। मेरी निगाहें किसी को ढूंढ रही थीं। अचानक से जाने कहाँ से आकर शेरू मेरे पैरों को चाटने लगा। माँ उसे भगाना चाहती थी, लेकिन मैंने माँ को रोक दिया। मैंने माँ से कहा, ''माँ, तुम पूछा करती थीं न मुझसे कि आजकल मैं खाने में 2 की जगह 3 रोटी क्‍यों ले जाने लगा हूँ ? तुम्‍हें लगता था कि मेरी भूख अब बढ़ गयी है। लेकिन सच ये है माँ कि एक रोज़ स्‍कूल में खाने के समय मुझे नाली के पास से एक पिल्‍ले के रोने की आवाज़ आई। मैंने पास जाकर देखा तो ये नाली में गिरा हुआ था। मैंने इसे बाहर निकाला और अपने हिस्‍से के खाने में से एक रोटी खिलाई। अगले दिन से ये हर रोज़ खाने के समय वहाँ आने लगा। मुझे भी इसके साथ खाना बांटकर खाना अच्‍छा लगता था। इसलिए मैं इसके लिए एक रोटी ज़्यादा लेकर जाता था। स्‍कूल की हर छुट्टी के अगले दिन ये बड़ी मिन्‍नतों से रोटी खाता था। ऐसा लगता था जैसे छुट्टी के दिन मेरे न आने पर मुझसे नाराज़ हो। जानती हो माँ, ये शाम को छुट्टी के बाद मुझे गली के नुक्‍कड़ तक छोड़ने भी आता था।''

माँ फटी आँखों से मेरी बातें सुन रही थीं। उन्‍होंने धीरे से सफ़र के लिए पैक किए गए टिफिन में से एक रोटी निकालकर शेरू को दी। लेकिन शेरू ने उसे सूंघा तक नहीं।

अचानक ट्रेन की सीटी सुनाई दी। मैंने पलटकर शेरू को देखा। वो अभी भी मेरा पैर चाट रहा था। पापा ने हम सब का सामान ट्रेन में रखा और हम भी ट्रेन में बैठ गए। धीरे-धीरे ट्रेन चलने लगी। मैंने खिड़की से बाहर झांककर देखा। शेरू ट्रेन के डिब्‍बे के साथ-साथ दौड़ रहा था। ट्रेन की गति के साथ उसकी रफ़्तार कम पड़ती गयी और मेरे आँसू बढ़ते गए। माँ जानती थी कि मैं अपने आँसुओं को छुपा रहा हूँ। लेकिन सच ये था कि मैं अपने एक बेज़ुबान दोस्‍त को अकेला छोड़कर जा रहा था।

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