क्या पता था यूँ रुला देगा मुझे ।

अपना साया ही दगा देगा मुझे ।।

आदमी तेरी भला क्या हैसियत ;

जो भी देना है खुदा देगा मुझे ।

कल हवाओं में हुई है गुफ़्तगू ;

एक झोंका ही बुझा देगा मुझे ।

एक पौधा रोप देता हूँ यहीं ;

जब भी देखेगा दुआ देगा मुझे ।

बाँट लेता हूँ किसी के गम मगर ;

जानता हूँ कल भुला देगा मुझे ।

हक है उसको जिसने दी थी रौशनी ;

जब भी चाहेगा बुझा देगा मुझे ।

चार दिन का जिस्म है मेरा फ़क़त ;

फिर खुदा मिट्टी बना देगा मुझे ।

दिल मे लाखों जख्म हैं, ओ बेवफा ;

ज़ख्म देकर क्या नया देगा मुझे ।

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