मासूम सबक

हर दिन की तरह आज फिर सब खाने की मेज़ पर इकट्ठा थे। उनका छोटा सा परिवार था। पति-पत्नी के अलावा घर में दो लोग और थे- उनका बेटा राहुल तथा दादा जी। राहुल दस वर्ष का बालक था। वे यूँ तो खुशहाल परिवार में ही आते थे , किसी बात की कमी नहीं थी किंतु कहीं न कहीं दिल की संवेदनाएंँ कमजो़र पड़ रहीं थीं।"

ओहो पापा जी! आप कैसे खाना खाते हो? आज फिर गिरा दिया। समीर देखो न।" सुरभि लगभग चिल्लाकर बोली। समीर ने उखड़ी निगाहों से दादाजी को देखा। दादाजी ने खुद को कंपकपाते हाथों से संभालने की बहुत कोशिश की मगर बुढ़ापे का शरीर... लाचारी का नाम है...बूढ़ा बाप जो किसी समय अच्छा खासा नौजवान हुआ करता था, आज बुढ़ापे से हार गया था। हाथ से खाना छूट जाता था, चलते समय लड़खड़ाते पैर लाठी का आसरा तकते..। एक ज़माने में कितनों की चाहतों का आस रहा आज वो ही चेहरा झुर्रियों से आच्छादित था।

"यह तो समीर रोज- रोज की बात हो गई है मैं कहाँ तक सफाई करूँ?" दादाजी के बूढ़े हाथों से सुरभि बहू की आवाज़ से आतंकित हो पूरी थाली ही छूट गई, वो जैसे सहम कर सिमट गए। वे उठकर जाने लगे। " पापाजी! कुछ तो ख्याल करो।" समीर बहू के साथ घिनियाते हुए बोला। "सुनो जी, क्यों न इन्हें अलग ही कमरे में खाने को दे दिया करें।"- सुरभि ने लगभग फैसला सुनाते हुए कहा। बेटे ने भी सिर इस तरह हिला दिया जैसे सहमति दे दी हो। राहुल बड़े ध्यान से यह देख रहा था। उसे दादाजी के साथ जो हो रहा था शायद अच्छा नहीं लग रहा था।

अगले दिन पिता का भोजन उनके कमरे के एक कोने में नीचे रख दिया गया। सब अपने खाने की मेज़ पर चले गए। ऑफिस से थका मांदा आया समीर खाने पर टूट पड़ा। बहू भी खाने में मगन हो गई थी मगर राहुल नहीं खा रहा था। वह उठकर दादाजी के पास चला गया। पीछे-पीछे सुरभि भी आ गई। "चलो तुम यहाँ क्या कर रहे हो? अपना खाना खाओ।" उसने राहुल से कहा। राहुल बड़ी ही मासूमियत से बोला, " मैं देख रहा हूँ कि बड़ों के साथ कैसा बर्ताब किया जाता है। जब मैं बड़ा हो जाऊँगा तो आपके साथ भी ऐसे ही करूँगा। ठीक है मॉम- डैड! आप अकेले खाना खाना और खबरदार कुछ गिराया तो.."
बच्चे के मुख से ऐसे बोल सुनकर बेटा-बहू के हाथों के तोते उड़ गए। तुरंत उसे गले लगाकर बोले -"न मेरे राजा बाबू ये तो दादाजी की मर्जी थी, हम थोड़े ही न इन्हें कुछ कह रहे हैं।" बेटे ने फटाफट अपने पिता को आदर देते हुए उठाया और प्यार से खाने की मेज पर ले गया। सुरभि पिता के लिए पानी लाने दौड़ गई। वह इस जुगत में तत्पर हो गई कि अब दादा जी को कोई तकलीफ़ न हो।

मासूमियत में ही सही पर बच्चे ने मासूम सबक देकर सिखा दिया था कि जो आप अपने माता-पिता के साथ कर रहे हो वही कहीं तुम्हारे साथ न हो जाए...। माँ-बाप से बढ़कर कोई पूँजी नहीं है। आप कितने ही धनवान- नामवान बन जाएँ किंतु माँ-बाप खुश नहीं तो सब धन बेकार है। माँ-बाप से बड़ा धन इस दुनिया में है ही नहीं।

डॉ. बीना राघव

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