मजहब

शाम का शुरुर मैखाने में फैले शराब के खुशबू के तरह अपने चरम के तरफ बढ़ रहा था, और सड़क से लोगों के पाँव की तथा गाड़ियों की आवाज़, कुकर में पकते हुए दाल की पहली सीटी के तरह धीरे धीरे सुनाई देना शुरू हो गयी थी

हेल्लो आरिफ़

हा भाई जां कौन

अरे मैं जुनैद, अम्मा यार कन्हा हो तुम, कौनो खबर वबर नाही है तुमहरा सुबह से,

अमां मियाँ थोड़ा अम्मी और रजिया (बहन) के साथ बाजार चले गए थे

अच्छा उ सब रहेन दो, तुम इक़बाल और सूर्यभान को लेके 7, 8 बजे यादव पर मिलो सुट्टा फूंकते है और कुछ पार्टी सार्टि का पिलान करते है

अच्छा मियाँ ठीक है

शाम 7 बजे के आस पास यादव पर

जुनैद- अमां मियाँ कन्हा हो तुम सब मिलते उलते नही हो लोग

आरिफ़- अब का बताएं मियाँ, थोड़ा काम धंदे पर नजर गड़ाये है, अब्बू बहुत बिगड़ रहे थे, चिल्लाने लगे की थोड़ा कुछ कर वर लो नही तो बकरे के लीद के तरह किसी सड़क पे पड़े रहोगे कौनो पूछेगा भी नही और बेगम के दीदार के लिए तरश जाओगे

इक़बाल- हा मियाँ बात तो एक दम फतह की किये है चचा जान

आरिफ़- अरे सूर्यभान भाई तुम बहुत शांत शांत हो का हुआ

सूर्यभान- अरे कुछ नही भाई लोग फाईनल सेमेस्टर का पेपर कपार पर है और उधर वकालत (एलएलबी) का प्रवेश परीक्षा भी एक महीने बाद है, दिमाग ठनका है समझे नहीं आ रहा है की का करें

जुनैद- अम्मा मियाँ आज अब्बू, पेपर और सारा टेंसन को आराम लेने दो , एक मस्त पिलान है मेरे पास, अपनी चरपहिया उठाते है और चलते है थोड़ा शबाब और कबाब का मजा लेने

तीनों आश्चर्य से एक दूसरे का मुंह बकुला के तरह देखते हुए ,

सूर्यभान- भाई लोग तुम सब जाओ हम चलते है हॉस्टल ,मूड वैसे भी सही नही है

आरिफ़, जुनैद और इकबाल सभी एक स्वर में अमा यार चलो मजा आयेगा, आज भर सब अपने महादेव के चिलम पर छोड़ दो बस मजा लेने दो

सूर्यभान- ठीक है ठीक है पर मैं दारू नही पियूँगा

सभी एक स्वर में जैसे महादेव का उद्घोस हो, चलो चलो ठीक है

दारू पिने और टंगड़ी(मुर्गा) तोड़ने के बाद सब एक दम, मस्ती में चूर थे, और कौनो चीज का होस हवास नही था

सूर्यभान - तुम सब बैठो मैं गाड़ी चलाऊंगा ,क्यों की तुम सब टुन्न हो , मुगलशराय से गाड़ी पड़ाव के तरफ सुनसान सड़क पे आते ही सरपट दौड़ रही थी रोड के दोनों तरफ कुछ नही था सिवाय बोर्ड और पेड़ के अलावा

आरिफ़- अबे अबे सूर्यभान भाई गाड़ी धीरे कर, धीरे कर देख सामने मस्त सी आईटम खड़ी है हुस्न उसका तो ऐसे लदा है जैसे अंगूर के गुच्छो से पेड़,

सूर्यभान- अबे काँहे को तुम सब नया लफड़ा पाल रहे हो

जुनैद- कुछ नही होगा भाई बस थोड़ी देर मस्ती कर छोड़ देंगे

आरिफ़- गाड़ी का दरवाजा खोलते हुये, मैडम कन्हा जाना है, सुनसान सड़क पे अकेले खड़ी है, नई लगती है इस शहर में

हा वो मैं ऑटो का वेट कर रही हूँ सिगरा जाना,

आरिफ़- मैडम हम भी वंही जा रहे आइये आपको छोड़ देते है, और वैसे भी आपको कोई सवारी सुबह तक नही मिलने वाली है,

मैडम- अच्छा ? गहरी साँस लेके देर तक सोचते हुए, ठीक है

आरिफ़- अबे जुनैद गाड़ी का फाटक खोल और बैठा मेहमान को अपने

पतली गली में (पीलीकोठी) ले लियो, भाई राजघाट पुल से (सूर्यभान के कान में)

अचानक सन्नाटे को चीरती हुई मधुर स्वर स्फुटित हुआ, आप लोग कन्हा जा रहे है कब से ये सफर कब तक चलता रहेगा

आरिफ़- बस बस मैडम कुछ देर और पंहुचने ही वाले है

गाड़ी का ब्रेक से जोर की आवाज़ जैसे छोटे बच्चे के चीखने की आवज़ निकल रही हो ,सभी हिल जाते है पिली कोठी पे अचानक से रूकती है गाड़ी

आरिफ़- चलिए उतरिये मैडम यंहा थोड़ा आराम कर लेते है फिर चलते है क्यों की आगे का रास्ता थोड़ा कच्चा है

ये कौन सी जगह है, यंहा क्यों रुके एकदम भरभराती हुई आवाज़ में जैसे उसे ये महसूस हो चूका था की उसकी इज्जत तार तार होने वाली है कुछ देर में

जुनैद- मैडम आप घबराइये मत अंदर तो आइये( जबरदस्ती हाँथ पकड़ के खींचते हुए)

जुनैद उसे अंदर ढकेल के बाहर से दरवाजा बन्द करते हुए, एक कामुक और हवसी भरे मुश्कान के साथ और भाई लोग तो आज कौन पहले बकरा हलाल करेगा

आरिफ़- अरे आज अपने भविष्य के जज साहब (सूर्यभान भाई के तरफ इशारा करते हुए) ॐ गड़ेशाय करेंगे, और वैसे भी इनका मूड सही नही है

और सूर्यभान को अंदर ढकेल देते है

कुछ देर बाद दरवाजा खुलता है और सूर्यभान के बाहर आते ही सवाल के ऐसे बौछार होते है जैसे एम एम जी में लगे पट्टे से गोलियां निकल रही हो

भाई कुछ भी मुड़ फ्रेश हो गया, दिमाग की सारी बत्ती जला दी उसने, क्या आईटम है भाई (सूर्यभान तीनों से)

इकबाल- ललचाई हुई लोमड़ी के तरह, भाई वैसे नाम वाम पूछा

सूर्यभान- नाम वाम पूछ के का करेंगे, कौन कुंडली मिलवाना है, वैसे उ अम्मी अम्मी चीख रही थी, हाँ याद आया शाजिया नाम है

आरिफ़, जुनैद और इक़बाल के शरीर में 440 बोल्ट झटके की सुनामी उस समय आ गयी और उन तीनों का नशा काफूर हो गया था, और माथे पर अजीब सी सिकन आ गयी थी, होंठ सुख गये थे

सूर्यभान- अरे तुम तीनों को लकवा काँहे मार गया, जुनैद जाओ मजे लो, अरे आरिफ़ तू तो जा और इक़बाल तू क्यों खामोश है ( तीनों को झकझोरते हुए)

क्यों भाई क्या हुआ ,कौम एक निकल गयी तो मन बदल गया क्या उसकी मासूमियत को रौंदने से, उसके इज्जत को नीलाम करने से

भाई ये कौम की और मजहब की जो बागडोर कुछ लोकतंत्र के दल्ले सम्भाल कर बंटवारा कर रहे है न वो उन्हें ही करने दो और हमे इसे एक मुट्ठी बन कर रोकना है

आज अगर उस लड़की की इज्जत नीलाम होती तो कल इस शहर से मातम का जुलुस कंधो पर निकलता, शहर जल रहा होता मजहबी तपिश में और उसपे ये लोकतंत्र के कुछ दल्ले अपनी चुनावी रोटियां सेकना शुरू कर देते

(तीनों के आँख में पश्चाताप के आंसू थे)

जा उस लड़की को बाइज्जत उसके घर तक छोड़ के आ!

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