आओ तरुणी क्या गायी हो तुम स्वतंत्र राग,

द्रवित हो तुम क्यों तरुणी,

क्या डँसा नहीं तुम्हे माया जाल ?

क्यों रुकते नहीं अश्रु तुम्हारे,

क्या कहते हैं ये खण्डित भाल ?

सात दशक बीते कुछ सीख इस शोषित वसुन्धरा से,

देख हरण होते हैं चीर स्वजनित पुत्रों से,

मिट गए उपवन, सो गयीं नदियाँ,

विशाल अट्टालिकाएँ लहलहाती हैं,

विवश देख जननी को हर पल,

दानवता अट्टहास लगाती हैं ।

नहीं तरुणी, रुको नहीं,

गाओ पुनः तुम स्वतंत्र राग ।

किन्तु ध्यान रहे .....हैं रक्तरंजित नख दन्त नाग ।।


भ्रमित हूँ मैं प्रकृति अचम्भित,

'स्वयं' की गाथा, 'स्वयं' का लय,

आज मानव गाथा महिमामंडित।

रोको मत, बह जाने दो,

अश्रु हैं, रहे क्षणभर लम्बित ।।

है दंभ तुम्हे एकलौते वंशज तुम्ही थे शेष,

क्यों ग्रसित हुए काल को अन्य जाति विशेष।

क्यों क़ैद किया रश्मि को,

मिटा वसुंधरा राजमहिषी को ।।


नहीं तरुणी, रुको नहीं,

गाओ पुनः तुम स्वतंत्र राग ।

हाँ हूँ जननी भ्रममात्र यह अहम् बाकी है,

मानव ने एक माँ के दूध की यही क़ीमत आंकी है ।

लील गए तुम सागर नदियाँ,

खा गए माँस निरीह जीवों का,

जान बाक़ी है, दे दो संज्ञा मुझे निर्जिवों का ।।


तुम जाओ तरुणी, क्रन्दन रोको,

युग बीते, आता था ना टोह लेने,

भूला भटका सुर, असुर, पक्षी औ प्राणी,

रुक जाओ, साँस तो लो, क्षण भर सुनो मेरी भी कहानी ।

भरा-भरा है सर्वस्व मेरा, अन्तःमन खाली है,

जागेगी मानवता यह भ्रममात्र किन्तु एक विश्वास पाली है ।

जागेगी मानवता यह भ्रममात्र किन्तु एक विश्वास पाली है ।।


.............................................................................................................................................................................................





hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.