न जाने क्यों

हर जनम में

दो क़दम

साथ चलने के बाद ही

नज़र आने लगता है

तुम्हें कोई

खूबसूरत मोड़

और तुम

मचल उठते हो

उस मोड़ को देखकर

तुम्हारे क़दम

खुद-ब-खुद

उठने लगते हैं

कुछ और तेज़ी से

पर मैं

अपने बेड़ियों से जकड़े

पांवों को

विवशता से निहारता

तुम्हें स्वयं से दूर होते

महसूस करता हूँ .

हर बार

मैं छूट जाता हूँ

कहीं बहोत पीछे.

मैं जानता हूँ

मुझसे कटकर भी

कट नहीं पाओगे तुम

पूरी तरह से

फिर भी

न जाने तुम

किस मोहपाश में बंधे

मुड़ जाते हो

और खो जाते हो

उस बियाबान में

मैं

तुम्हें ढूँढ़ने का

प्रयास करके भी

नहीं ढूँढ़ पाता हूँ.

और इंतज़ार करने लगता हूँ

अगले जन्म का

इसी उम्मीद के साथ

कि शायद

अगला जन्म तो

कर सकूं

पूरा का पूरा

तुम्हारे नाम

शायद काट सकूं

अपने पांवों में पड़ी बेड़ियाँ

और चल सकूं

तुम्हारे कदम से

कदम मिलाकर.

लेकिन हर बार

गहराए सन्नाटों में

रह जाता हूँ मैं

फिर अकेला

शापित सा

अपनी विवशता पर

कोसते हुए स्वयं को

देखता रहता हूँ

तुम्हारे और मेरे मध्य

टूटते सेतु को

आखिर कब तक?

कब तक मैं

तुम्हें

पाकर खोने के लिए

और खोकर

फिर पाने के इंतज़ार में

यूंही जन्म लेता रहूँगा

और तुम यूंही

अपनी पदचाप की

अनुगूंज का

उपहार

मेरे लिए छोड़

आगे बढते रहोगे?

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