सत्य या स्वप्न

सारे बच्चे एक अरसे बाद इकट्ठा हुए है घर में।सारा घर गुंजायमान है उन सबके हंसी ठहाकों से बातो से ।रसोई भी सुगन्धित है विभिंन्न ब्यञ्जनो से ।नमिता को वापस देहरादूनअपनी ससुराल जाना था ।नमिता ने कहा क्यों न सब साथ चले दो दिन मसूरी में घूमेंगे एक साथ ।दिव्या बोली वाह सही है , पता नहीं कब हम चारो भाई-बहन एक साथ इकठ्ठा हो पाएंगे ,माँ सही है ना । मैंने कहा ठीक है । सब नमिताके घर रूककर मसूरी चलेंगें। बेटे से मैंने कहा शक्ति होटल की बुकिंग करा लो ,सुइट करा लेना जिससे हम एक साथ ही रहे ।

मैं और मेरे चारो बच्चे बेटी की सुन्दर नटखट बेटी हम सब मसूरी पहुचे ।मैंने बेटे से पूछा कौन सा होटल है ।शक्ति बोला एक हैरिटेज होटल है ।माँ चिंता न करो , बहुत ही अच्छा है।होटल की गाड़ी तब तक लेने आ गई । ये कितनी पुरानी गाड़ी है ,ये भी हैरिटेज है क्या ?मैं बोली । कार तथा ड्राईवर दोनों ही किसी दूसरी दुनिया के लग रहे थे । चक्करदार मार्ग से होते हुए खैर होटल पहुचे गए ,तो मासाअल्लाह होटल वास्तव में सही अर्थो में हैरिटेज ही था ।अंग्रेजो के पुराने बंगलो को नया कलेवर दिया गया था नाम था .......अंदर प्रवेश करते रिसेप्शन भी वैसा ही अनोखा रिसेप्शन बाला भी अलग सी लग रही थी ।घुमावदार जीना लाल कारपेट से ढका हुआ ।जीने से ऊपर पहुँच कर चौड़ा कॉरिडॉर दोनों तरफ कमरे थे ।ये क्या रूम के दरवाज़े के ऊपर पीतल की चमकती नेमप्लेट लगी थी उन पर अंग्रेजो के नाम लिखे थे ।चलिए रूम का लॉक खोला गया ,ओह माय गॉड यहा का नजारा भी अलग भुतहा सा हॉल में अंग्रेजो के समय का सोफे टेबल लैंप ।दीवारो पर नेमप्लेट वाले अंग्रेज और उसकी मेम् फॅमिली की फोटोग्राफ्स साथ ही उनका इतिहास भी बैडरूम ,बाथरूम सब जगह एक सा नजारा ।मैं गुस्से से बेटे से बोली कैसा होटल कराया है रे!लग रहा है सब अभी तस्वीरो से निकल नाचने लगेंगे ।शेवोय के बारे में भी इतना सुना है,ये तो उससे भी दो कदम आगे लग रहा है ,तभी पीहू ने बेड की साइड टेबल की दराज खोल दी ये क्या "हनुमान चालीसा " ये क्यों रखी है होटल वालो ने ।क्या माजरा है ।घोस्ट वाला चक्कर तो नही ।सब हँसने लगे रिलैक्स करो माँ ।आप तो हर जगह स्टोरी बना लेती हो ।हैरिटेज है इसीलिए ऐसी साज-सज्जा है ।पर मेरे मन को सुकून कहा था ।लंच के लिए लान में गए तो मुझे वेटर भी भूत नजर आ रहा था पर अपने डर को खुद में ही समेटे सबका साथ दे रही थी । शाम को घूम घाम कर जब रात को लौटे ,दिल मेरा धकधक करने लगा । लग रहा था बस हम लोग ही होटल में है ।

रात को बेड पर लेट कर मन ही मन हनुमान चालीसा जपने लगी। तभी अजीब सी आवाज आई धीरे से आँखे खोली कही कुछ नहीं ,मोबाइल पर किसी गेम का नोटिफिकेशन था ।या रब जल्दी से सुबह हो जॉय मई नहीं रुकूँगी यहाँ ।नींद आ रही थी पर मई उसे कोसो दूर किये हुई थी । तभी कुछ शोर सा सुना जैसे कोई डांस पार्टी हो रही है , शैम्पेन की बोतल खुलने की आवाजे म्यूजिक ।पदाचापे ...मैं तो रजाई कस कर लपेट औंधे मुह पड़ी रही ।नींद की खुमारी थी लगा सुबह हो गई ।सब सुखनिद्रा में डूबे थे ।मैं रूम का दरवाजा खोल होटल के गलियारे में निकली ,उसके छोर पर बड़ी विशाल खिड़की थी । उसके दोनों तरफ दो चेयर्स और एक टेबल थी ।वह से मसूरी की पहाड़ियो का नजारा बहुत खूबसूरत दीखता था ।मैं वहाँ पहुची तो देखा एक अंग्रेज कपल बैठ हुआ था ।चाय का साजो सामान टेबल पर था । लेडी ने स्माइल करते हुए गूडमॉर्निंग बोला । मैं भी मुस्कराई और खिड़की के पास खड़ी हो गई ।तभी सुर्यदेव की हलकी सी लाली पहाड़ियों के पीछे से चमकी ।हाउ ब्यूटीफुल कह कर मै पलटी तो देखा कपल ओझल न चाय का सरंजाम ।पलक झपकते ये कहा गए ।सारा गलियारा खाली ,सिर्फ भोर की लाली मुस्करा रही थी ।मुझे काटो तो खून नहीं सत् की सुन्न मैं चेयर पर गिर गई ।थोड़ी देर में सांस में सांस आई ,मई रूम की तरफ भागी ,अंदर पहुच सबको जगाया और सारा वाकया सुनाया ।बच्चे कहाँ मानने वाले माँ का वहम है कह कर हंसी में उड़ा दिया ।मैं अब न रुकूँगी यहाँ । सब तैयार हो जाओ ब्रेकफास्ट के बाद चलते है । हम सब नीचे हॉल में बुफे के लिए पहुचे ।जो होटल मुझे शाम खली लग रहा था ।बहुत सारे टूरिस्ट से भरा हुआ था ।और मैं काफी सिप करते हुए विचारमग्न थी सत्य था सब या स्वप्न ?।

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