ट्रेन एक स्टेशन पर रुकी, वह बोतल लेकर पानी भरने के लिए नीचे उतरा! पानी भर ही रहा था कि अचानक कुछ सरसराहट -सी सुनाई दी, आसपास कुछ हलचल हुई! सिर घुमाकर देखा -तो ट्रेन पटरी पर रेंगने लगी थी! वह हड़बड़ाकर, बोतल फेंककर अपने डिब्बे की तरफ़ दौड़ा! डिब्बे के दरवाज़े पर बाऊजी हैरान-परेशान –से खड़े, इधर-उधर देख रहे थे! उनकी चिंतित निगाहें उसी को ढूँढ़ रही थीं! उसपर नज़र पड़ते ही उन्होंने अपना कँपकँपाता हुआ हाथ उसकी तरफ़ बढ़ा दिया और घबराए हुए स्वर में बोले, “आ जा! बेटा ! आ जा!”

किसी तरह वह बाबूजी का हाथ पकडकर और दरवाज़े के हैंडल का सहारा लेकर कूदकर ऊपर चढ़ा! उसके इस प्रकार छलाँग लगाकर चढ़ने से एकबारगी वह ख़ुद भी लड़खड़ा गया और झटका लगने से बाबूजी भी गिरने वाले थे कि उन्हें संभालते हुए वह चिल्ला पड़ा, “बाऊजी...!”

-इसके साथ ही उसकी आँख खुल गई! उसकी साँसें तेज़-तेज़ चल रही थीं, हाथ-पैर काँप रहे थे! कुछ पल को उसे कुछ समझ न आया! फिर धीरे-धीरे उसने स्वयं को संयत किया! चारों ओर निस्तब्धता छाई हुई थी -उसे ध्यान आया कि वह इस समय अस्पताल में है! बाऊजी की तबियत ज़्यादा बिगड़ गई थी, जिससे अस्पताल में भर्ती करना पड़ा था! यह याद आते ही वह तीर की तरह उठा और बाबूजी के पास गया! उनके पास जाकर देखा -वे गहरी नींद में थे! कितने कमज़ोर हो गए थे बाऊजी! उसने धीरे से उनके हाथ पर अपना हाथ रखा! घड़ी देखी तो सुबह के चार बज रहे थे! आज बाऊजी को अस्पताल से छुट्टी मिल जाएगी -यह सोचकर उसे बड़ी तसल्ली हुई! कितने दिन हो गए थे अस्पताल में रहते-रहते! बच्चों के इम्तिहान चल रहे थे, अतः वह अकेला ही बाऊजी के पास आ गया था! माँ तो पहले ही स्वर्ग सिधार चुकी थीं! उसने मन में ठान लिया था कि अब बाऊजी को वह अपने साथ ही ले जाएगा, नहीं छोड़ेगा इस शहर में अकेले!

वह वापस आकर सोफ़े पर बैठ गया और सोचने लगा -कैसा भयावह माहौल होता है अस्पताल का! यहाँ आओ तो ऐसा लगता है कि इस दुनिया में दुःख ही दुःख बिखरे पड़े हैं! हर किसी के चेहरे पर चिंता की अनगिनत लक़ीरें देखकर यह एहसास होता है कि जग में कितने पहाड़ जैसे दुःख हैं और उनके सामने अपना दुःख कितना कम है! उसने ईश्वर का धन्यवाद किया कि बाऊजी की तबियत अब ठीक है और वे स्वस्थ होकर घर वापस जा सकते हैं!

फिर उसे अपना सपना याद आ गया और वह बेचैन हो गया! अक्सर ही उसे ट्रेन के सपने आते हैं –कि ट्रेन छूट रही है और वह सबको ट्रेन में चढ़ाने की कोशिश कर रहा है! कभी परिवार का कोई सदस्य छूट जाता है, तो कभी वह स्वयं ट्रेन के पीछे दौड़ रहा है और भागते-दौड़ते बड़ी कठिनाई से ट्रेन में चढ़ पाता है! बहुत ही अजीब सी बेचैनी होती है उस वक़्त! ट्रेन छूट जाने की दहशत उसके मन में कुछ इस तरह समा गई थी कि अब वह ट्रेन के सफ़र से ही घबराने लगा था! जब भी ऐसा सपना आता था, तब कुछ दिनों तक वह एक अनचाही उदासी से घिरा रहता था, उसका दिल डूबा-डूबा रहता था! आख़िर क्यों उसे ये बेसिर-पैर के ट्रेन के सपने आते हैं -यही सब सोचते-सोचते उसका सिर भारी होने लगा, पलकें झुकने लगीं और उसकी आँख लग गई!

बाऊजी को अस्पताल से छुट्टी मिलने पर वह उन्हें लेकर स्टेशन पहुँचा! ट्रेन में अपनी आरक्षित बर्थ पर उसने बाऊजी का बिस्तर लगाया और उन्हें आराम से लिटा दिया! खिड़की से देखा तो सामने ही एक चाय का स्टाल दिखाई दिया, जिसे देखते ही उसे चाय की तलब उठी! ट्रेन चलने में अभी थोडा वक़्त था! बाऊजी को बताकर वह चाय लेने नीचे उतरा! अभी चाय ले ही रहा था कि ट्रेन चल पड़ी! वह घबरा गया! देखा तो उसका डिब्बा आगे निकल चुका था! वह अपने डिब्बे की ओर दौड़ा! और भी कई लोग ट्रेन में चढ़ने के लिए भागे –उनसे टकराते हुए, धक्का-मुक्की में उसके हाथ से चाय भी गिर पड़ी! ट्रेन अपनी रफ़्तार पकड़ने लगी थी! दौड़ते-दौड़ते वह प्लेटफार्म से नीचे तक उतर आया! तभी उसने देखा कि उसके सामने से आख़िरी डिब्बा निकल रहा था –उसने अपनी पूरी कोशिश और ताक़त लगाकर, हाथ बढ़ाकर हैंडल को पकड़ना चाहा मगर ये क्या? -उसे लगा जैसे किसी ने उसका हाथ झटक दिया हो! उसकी आँखें हैरानी से फटी रह गईं जब उसने देखा कि उस आख़िरी डिब्बे के दरवाज़े पर बाऊजी खड़े थे -मगर उन्होंने उसे थमाने को अपना हाथ आगे नहीं बढ़ाया बल्कि वे मुस्कुराकर हाथ हिलाकर उसे ‘बाय’ कर रहे थे! वह तब भी हैरत-भरी निगाहों से देखते हुए, हाथ बढ़ाए, डिब्बे तक पहुँचने की धुन में, बेसुध –सा दौड़ता रहा कि उसका पैर किसी चीज़ से टकराया, वह चीख़ा -“बाऊजी...” और गिर पड़ा!

तभी किसी ने उसे झटके से थाम लिया –देखा, तो सामने डॉक्टर साहब खड़े थे, जो उसे हिला-हिलाकर उठा रहे थे! वह बुरी तरह पसीने में तरबतर था, साँसें बिल्कुल क़ाबू से बाहर थीं, आँखों में अजीब सी तड़प और बेचैनी थी, गला बिल्कुल सूख गया था और मुँह से चाहने पर भी आवाज़ नहीं निकल रही थी! डॉक्टर साहब ने उसकी ऐसी हालत देखकर उसके आगे पानी का गिलास किया, जिसे वह एक ही साँस में पी गया! फिर स्वयं को एकत्रित कर, टूटी-फूटी आवाज़ में उसके मुँह से निकला –“वो बाऊजी...!”

कुछ पलों तक डॉक्टर साहब उसको देखते रहे फिर हौले से उसके कंधे पर अपना हाथ रखकर, सिर झुकाकर बोले –“आई एम सॉरी! वे अब नहीं रहे!”

वह भौंचक्का रह गया! उसकी आँखें असीम आश्चर्य एवं सदमे से खुली की खुली रह गईं !

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