कहानी करुणेश की - भाग १

सन्तोष पाण्डेय-अबे ओये करुणेश,सुन!जब भी शाम उदास होने लगे तो उस चौराहे की तरफ रुख करना जहाँ मित्रों की भिन्न भिन्न मंडलियों में उनकी अजीबोगरीब टिप्पणियों के सम्मिश्रण से माहौल खुशनुमा हो जाया करता है।

करुणेश इन्ही बातो को याद करते हुए अपनी पुरानी मित्र मंडलियों की तरफ निकल पड़ा जहाँ से वह धीरे धीरे लुप्त होने की कवायद में जुट चुका था । लुप्त होने की वजह कोई और नही, वही थी जो आज फिर से उसी मंडलियों तक पहुचने की वजह बनी।

शिवांगी नाम था उसका।

कौन थी?क्यों उसकी जिंदगी में दाखिल हुई ?ऐसे तमाम सवालों के जवाब से पहले एक नजर संतोष पाण्डेय जी की तरफ-----

संतोष जो सभी खूबसूरत लड़कियों के लेखा जोखा समिति के आजीवन अध्यक्ष पद से नवाजे गए थे ओर उनकी सटीक जानकारी उनके पद पे बने रहने की योग्यता में कभी कोई कमी नही होने दी ठीक वैसे ही जैसे बाग की सारी तितलियों की खबर भंवरे को हो कि कब कौन तितली किस बाग से किस बाग की तरफ किस भँवरे के साथ गलबहियां डाले आती जाती है।
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आगे की कहानी,करुणेश की जुबानी

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बात उन दिनों की है जब आभासी दुनिया में वास्तविक धरातल पर सम्पन्न होने जा रहे चुनावों के दरमियान राजनीतिक समर्पण के चलते बढ़ चुकी व्यस्तताओं के बीच अचानक 239वें दोस्त का दोस्ती की स्वीकार्यता हेतु एक सूचना स्क्रीन पर दिखी-

Shivangi mishra sent you a friend request..

शामत तो तब आयी जब सबको छोड़ सिर्फ उस एक निवेदन ने न जाने क्यों स्वीकार्यता को मंजूरी देने और ततपश्चात शुरू हुए गपशप में मशगूल हो जाने को विवश किया।

दरअसल यह एक ऐसी प्रजाति से रिक्वेस्ट आयी थी जिसमे इसके विपरीत वाली प्रजाति का रूपांतरण इतनी आसानी से संभव बना दिया था फेसबुक ने कि पूछिये मत।लोग फर्जी भी बना सकते हैं मौज मस्ती के लिए इसलिए डरना स्वाभाविक था।

बाते होती रही पर प्रतिक्रियाओं का दौर शाम को हुए एक वीडियो कॉल से पहले तक संदेहात्मक ही रहा।फिर हसीन चेहरे को देख तसल्ली हुई कि जिसका रिक्वेस्ट आया है शायद वो सही है लेकिन खतरे की आशंका अभी भी प्रबल थी कि आखिर कौन हो सकता है जो खुद इतना आगे निकलकर हाथो में हाथ देना चाहता है?कहीं ये किसी का मजाक तो नहीं?

गाँव पहुँचे चार ही दिन हुए थे, अभी और रहना था वहाँ लेकिन मिलने की बेचैनी मुझे फिर अपने कर्मभूमि इलाहाबाद तत्काल पहुचने के लिए विवश कर गयी।

प्रयाग स्टेशन पर उतरकर हवाओं में घुली उसकी मीठी बातों की भीनी खुशबू को आसानी से महसूस कर पा रहा था।सड़को पर रफ्तार भरती गाड़ियों का शोरगुल ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो उस्ताद बिस्मिल्लाह खान अपनी शहनाई से प्यार को आवाज दे रहे हों।कमरे पर पहुच कर अस्त व्यस्त हो चुके सामान सही कर मोबाइल उठाया ही था कि एक सूचना मोबाइल के पटल पे टपका-

"आ गए इलाहाबाद!आप तो परसो आने वाले थे!जूस पीने जा रहे हैं कटरा।आ जाना अगर आप चाहो तो."

में रवि को साथ लिए बिना कुछ बताये निकल गया तुरंत उसके दर्शन के लिए जूस पीने के बहाने।
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मिनी इलाहाबाद,कटरा मार्केट

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फ़ोन पे लगातार बात करते आगे बढ़ रहा था वो कर्नलगंज से आ रही थी और मैं कचहरी से।हम बीच में मिलने वाले थे लेकिन डर भी था कि कैसे मिलेंगे।अन्ततः खुद को छुपाते हुए उसका दीदार कर मैं आगे बढ़ निकला।और बोल दिया फोन पे कि आ जाओ यूनिवर्सिटी चौराहे की तरफ चाय की दुकान पे बैठे हैं हम।

उसके आने तक दिमाग मे यही घूमता रहा उसे देखने के बाद कि इस जाहिल के हाथ में साहिल तक पहुँचाने की पतवार वो भी इतनी खूबसूरत नाव को भला कैसे मिल सकती है और सुकून भी था इस बात का कि अब तो इस दीदार के भरोसे पूरी ज़िंदगी काट लेंगे चाहे परिस्थितियां कैसी भी हो।

वो तो गनीमत थी कि गर्मी का मौसम और समय दोपहर का था जिस वक़्त अधिकतर लोग कमरे में ही रहना पसंद करते थे।इसके बावजूद वह शांत चौराहा जो अक्सर शाम में ही रंगीन हुआ करता था आज कड़ी धूप में नई ठंढक लिए उससे ज्यादे रंगीन दिख रहा था,शिवांगी से मुलाकात जो होनी थी।

वो घड़ी आ गयी जिसका इंतजार बेसब्री से कर रहे थे।सुशील की दुकान पर वो अपनी दोस्त के साथ और मैं अपने दोस्त के साथ रोहित के दुकान पर।

चाय की चुस्की लेते हुए उसने जैसे ही हाथ हिलाया मेरी चाय गले में अटक के रह गयी और नजर उसके खिलखिलाते चेहरे पर।मैं एकटक देखता और उड़ता रहा कल्पनाओं की दुनिया में बिना यह ख्याल किये की चाय अपनी गर्मी खो चुकी है।अचानक बीप हुआ मोबाइल और फिर यथार्थ में लौटा तो देखा एक संदेश फिर से-

चाय तो पी लो जनाब,

देख बाद में लेना,

भाग नही रही मैं।

फिर क्या वही ठंडी हो चुकी चाय में उसके गर्म एहसास घोलकर एक सांस में गटक गया।

पीछे पीछे फिर जूस की दुकान तक पहुचे रवि के मना करने के बावजूद।बेचैन आत्मा रवि जो एक जगह टिक नही सकता कुछ देर, फिर भी मरता क्या न करता साथ तो देना ही था उसे।

अहा क्या प्रभाव था उसकी खूबसूरती का!आज जूस की दुकान भी ऐसी सजी हुई लग रही थी मानो आज अनार-लीची की शादी हो।सेव संतरा बारात में शामिल तो थे पर उनकी निगाहैं बगल वाली सब्जी की दुकान में अकेले रखे मशरूम को ताड़ते नही थक रही थी और मेरी नजर उसके गालों पे बने डिम्पल को।

नजर वहां से हटना तो नही चाहती थी लेकिन इशारो में बात करने का उसका हुनर काम आया और बिना बोले बता गयी कि मोबाइल चेक करो।

मैने उसके तीनों मैसेज को पढ़ा-

कहां खो जाते हो तुरंत आप?

घूरते ही रहोगे?

बोलना भी है कुछ?

चेहरे पर खुशी लिए बोलने ही वाला था कि जूस वाले चच्चा की गुस्ताखी खलल कर गयी।चच्चा भी मेरी लाल आंखों में वही सवाल पढ़ रहे थे जो में उनसे पूछना चाहता था कि आपने पैसा क्यों लिया?वो भी अपना मुंह गिराकर बेचारगी से जवाब दे गए कि क्या करता साहेब, है ही इतनी जिद्दी, आप आज आये हो न(धीरे धीरे आपको भी इसके जिद का एहसास हो जाएगा)ये मुझे रोज परेशान करती है।वो जा चुकी थी ।हम भी निकल रहे थे कि अचानक रवि ने याद दिलाई एक बात और हम दोनों हँसने लगे।दरअसल वो जो पांडेय जी हैं न उनकी बात थी। वो जिस दिन 50 रुपये का चाट पकौड़ा खिला देते थे तो बड़ी नोट और छुट्टा न होने का बहाना कर 100 रुपये का पेट्रोल डलवा लेते थे।
उनकी एक जबरदस्त सिग्नेचर लाइन यह थी कि ---

"जब प्यार बराबर दोनो तरफ तो हिसाब का बोझ सिर्फ एक तरफ क्यों???"

वैसे मेरा इस लाइन से दूर दूर तक कोई संबंध नही था।

क्रमशः------!!!!

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आगे की कहानी की प्रस्तुति इस बात पर निर्भर कि यह भाग कैसा लगा ?

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