सौरभ ने दरवाजा खटखटाया और धीरे से आवाज़ दी
मैंने दरवाजा खोला और वह झटके से दाखिल हो गया , आते ही उसकी नजर आईपीसीसी के सिलेबस पर पड़ी | वह एक लम्बी सी साँस लेकर सिलेबस ऐसे देखने लगा मानो किसी मल्टीनेशनल कंपनी के सारा असाइनमेंट एक फाइल में अटकी हुई हो और उसे पूरा करने का टास्क उसे ही मिला हो| मै अभी भी चुप था और देख रहा था सौरभ कंही मेरी तनहा सी आँखों में झांककर मेरी उदासी की वजह न पूछ ले | और सही वजह बताउं तो साले किसी भी बात का बतंगड़ बनाने में देर नहीं करता | वैसे भी हम दोनों में बहुत सारी बातें एक जैसी थी, जब भी मिलते थे हंसी ठिठोली होती थी | मेरा ध्यान अभी भी उस पर था की कहीं वो मुझ पर ध्यान देना शुरू कर दे | आखिर थे तो हम दोनों ही सीए स्टूडेंट , कोर्स के साथ साथ छोटी छोटी बातों पर ध्यान देने लग जाते थे | वो अभी भी किताबों को पलटने में लगा था और हम अपने प्यार के दुनिया के एक एक किस्सों को पलटने में लगे थे |

राँझना मूवी की तरह बोले तो.. बस इतनी सी तो थी कहानी मेरी, एक इंस्टिट्यूट था जिसमे हमे मिला था जरुरत से ज्यादा बड़ों से सनेह , अपने सहपाठियों से खिंचाई और कुछ लोगों से अनदेखी,एक दोस्त था सौरभ जिसे हम हर बात शेयर करते थे | एक भैया थे जो हमारी हर बात बिना कहे समझ जाते थे| एक सर थे(अभी भी है ) जिनके हर बात पे कोई हँसे या न हँसे हम हँसते जरुर थे | एक मेम थी जो सारे इंस्टिट्यूट में ऐसी तबाही मचाये रखी थी , जैसे उन दिनों बिहार का शोक कोशी | इन सबके बीच एक लड़की थी जिसे हमें बहुत चिड थी, पर मन में कहीं न कहीं एक आकर्षण जरुर था | हम ये सब बोल सकते थे पर किसके लिए और ये सोचकर भी अपने को नियंत्रित रखते थे की कोन मेहनत करे दिल लगाने को, दिल तुडवाने को| कहेंगे उसी दिन जब सीए बन जाये , यहीं शहर की स्टडी सेंटर में दौड़ जाने को, किसी के इश्क में पढ़ जाने को | खैर ................
मेरी कहानी के असली पत्रों का आना तो अभी बाकि था, जैसे जैसे दिन बीतते गए कारवां बनता गया |कितना साधारण सा था वो कांटेस्ट , मिस्टर/मिस फ्रेशर का वो कॉन्टेस्ट जहाँ से ये सब शुरू हुआ | हमें क्या पता था इस कांटेस्ट का एक पार्टिसिपेंट एक दिन मेरी लाइफ में पार्टिसिपेंट करने लगेगी| रोज की तरह हम क्लास आये | तभी हमारे सीनियर्स आये और बताये की हमारा सिलेक्शन मिस्टर फ्रेशर के रूप में हुआ है | कांटेस्ट खत्म हो चूका था हम आ रहे थे तो किसी ने पीछे से आवाज़ दी .........अरे तुम अकेले आगे आगे क्यू जा रहे हो ? पहली बार बाहरी दुनिया में बच्चे ने किसी के आवाज़ में एक अपनापन पाया था | मैंने बस पीछे पलट के थोडा सा मुस्कुराया और कुछ नहीं कहा |फिर अब तो दिल का धड़कना भी उसी के लिए हो चूका था | ये तो शुरुआत थे ऐसे ही हमारे बीच काफी दिनों तक चलता रहा | कभी कभी क्लास में वो बात करती थी पर हमें कभी हिम्मत नहीं हुई, बचपन से इतने शर्मीले जो थे| स्कूल के दिनों में हमें इसके ढेर सारी उपाधि भी मिल चूका था मिस्टर लोनली , छुपा रुस्तम वगेरह वगेरह | धीरे धीरे हमारी बात बढते गयी , हम तो पूरी तरह से सोचे हुए थे जब तक परीक्षा न हो हम बात आगे नहीं बढ़ाएंगे | परीक्षा हो भी गयी अब तो हम इतनी बातें करते थे ख़तम होने का नाम ही नहीं लेता था पढ़ाई में costing से ले के गोलगप्पा में testing तक की हमारे बीच बात हो जाया करती थी | सारी रात बात करते और सारा दिन उनके बारे में सोचते | अब तो यही दिनचर्या बन गया था हमारा| हमे समझ में आ रहा था की प्यार हो रहा है...पर कन्फर्म नही कर पा रहे थे ?
खैर, दोस्तों ने हमारी हिम्मत बढ़ाने के लिए मिल्क सेक, कोल्ड ड्रिन्क्स वगैरह पिलाके(क्योंकि हम पीते नहीं है) इश्क की दुनिया में शहीद होने भेज दिया | दो घंटे के उस पहली मुलाकात में डेढ़ घण्टे परीक्षा सेण्टर की तरह हमें कुछ समझ न आया क्या बोलना है...आखिर के दस मिनट में पाँच मिनट वाशरूम में बिताने के बाद हम बस इतना ही बोल पाये थे...."सुनो, आई लाइक यू....."खैर रिप्लाई में "बताते है बाद में" बस यही लाइन सुनने के बाद हम दोनों निकल चुके थे....
ये एक लाइन के हमारे लिए हॉलीवुड की तमाम सस्पेंस वाली मूवी से ज्यादा रहस्मय लगा रहा था..
कभी घंटो भर किसी टॉपिक पर एनालिसिस करने वाला ये सीए स्टूडेंट किस रहस्मय भंवरजाल में आ गया था समझ में नहीं आ रहा था |
खैर तमाम तरह के प्रोबबलिटी निकालने एक दिन उसका रिप्लाई आ ही गया.....हमें अपनी प्रोबबलिटी पर पूरा भरोसा होने के कारण मेसेज बॉक्स को बिना ओपन किये हम अपने सारे दोस्तों को लैपी का दिव्य दर्शन के लिए बुला चूके थे...सब अपने अपने पसन्दीदा रेस्ट्रो में जाने के प्लान बनाने के मेसेज बॉक्स पे क्लिक कर दिया..
सब लोगों के शान्त होने के बाद स्क्रीन पर ये एक ही लाइन कोहराम मचा रही थी| " I AM NOT INTERESTED IN ALL THESE"
गाँव से आये इस बच्चे का दो चार अंग्रेजी की लाइनें सीखने के बाद अब शहरी होने का भ्रम टूट चूका था...
"अबे इंस्टिट्यूट नहीं जाना है , जल्दी चलो नहीं तो शेखर भैया चले जाएँगे फिर फॉर्म आज भी सबमिट नहीं हो पाएगा|" सौरभ के आवाज ने हमें अपनी दुनिया से वापस लाया... मैं अभी भी मन ही मन बडबडा रहा था असली फॉर्म तो मैं कब का सबमिट कर चूका हूँ दोस्त...

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