कानपूर नगर का एक चौराहा ,शायद पिछले जन्मो के पापो के कारण ही इस चौराहे में हज़ारों वाहनों की चीख पुकार को अनसुना करते हुए मुझे उस बोधि बृक्ष की तरह खड़े रहना था। हां लेकिन हज़ार साल के लिए तो नहीं लेकिन पंद्रह बीस मिनट के लिए ही सही । पर वो बोधि बृक्ष कम से कम इन मशीनी घोड़ो की दहाड़े तो नहीं ही सुनता होगा । माता जी का आदेश था तो हुकुम तो बजाना ही था सो चल पड़े बहन को स्कूल बस से लाने । बस उसी बस के इंतज़ार में खड़े थे । ऊपर से गुजरता प्रधान मंत्री स्वर्णिम चतुर्भुज योजना के अंतर्गत बना वो पूल हमारे विकास की डींग हॉक रहा था । वो विकास जो हमने सन सैतालिश से अब तक पाया । इस विकास की झलक तले मुझे हमारे विकास की और भी कई तस्वीरे मिल गयी। कोने में खड़े पुलिसवाले जो आते जाते ट्रको से बीस बीस रुपये वसूल रहे थे वो भी इस विकास की तस्वीर का एक अंग थे।अभी कुछ दिन ही हुए की इलाके में ईमानदारी की चिमनी जलाए हुए एक इंस्पेक्टर साहब आए थे।इसी ईमानदारी के सोले में भकभका कर वो भदौरिया साहब का ट्रक जब्त कर बैठे। और उसके बाद पता नही कहाँ से उन सिंघम टाइप अफसर में शक्ति कपूर की आत्मा घुसेड़ दी गई और कप्तान साहब के निरीक्षण में वो लाइन हाजिर हो गए।और भदौरिया साहब उनकी गाड़ी तो अभी भी वैसे ही नब्बे की रफ़्तार में है।और अकेले भदौरिया साहब थोड़े न है,गिट्टी मौरंग वाले यादव जी और सीएम साहब के खास पंडित जी भी तो है। ये सब लोग हमारे विकास की उजली तस्वीर के रहनुमा हैं।और ये पुलिस वाले,ये तो बस सफेदी के इस यज्ञ में अपनी अपनी आहुती डाल रहे हैं।उसी चौराहे पर कुछ छोटे बच्चे और कुछ अधपके किशोर भी अपने दुर्गन्ध से सुगन्धित कपड़े और अपनी असभ्यता की तासीर के साथ अपना पेट भरने का जुगाड़ लगा रहे थे।उन बच्चो को तो शायद पेट ही भरना था पर वो किशोर उनको पेट के साथ अपनी मर्दानगी भी तृप्त करनी थी।इनकी मर्दानगी में हवस नही थी बल्कि एक रूपये का वाह पान मसाला फाड़ के खाने की तलब और श्याम बीड़ी का सुट्टा मारने की ख्वाहिश थी।वक्त के पहिये ने इन्हें इनकी औकात दिखा दी थी।ये सब पके और अधपके बच्चे अपने टीन के डब्बे काट कर बनाए गए शनिदेव के साथ तेल और रूपये का डोज ले रहे थे।इनमे से बहुतों के बाप किसी चौराहे पर बैठ कर गांजे के आगोश में लिपटे हुए पत्ते खेल रहे होंगे ।जो उनके हिसाब से दुनिया की सबसे बड़ी बाजीगरी है। खैर ये तो अनुमान का खेल था पर यथार्थ की धरती भी कम भुरभुरी न थी।वहाँ सामने एक पचपन से साठ के बीच की बुढ़िया बैठी थी।शायद इतनी ही उम्र होगी उसकी पर समय की धकापेल और थप्पड़ों से वो अस्सी से कम की नही लग रही थी। उसके साथ उसकी पूरी गृहस्थी थी।कुछ फटे पुराने कपड़े और बटोर कर लाई गई लकड़िया थी जिनका जलना न जलना इर्द गिर्द के लोगो की दया दृष्टि पर निर्भर था।शायद ये भी हमारे सत्तर बरस के विकाश का एक हिस्सा था। वहीं बगल में आड़े तिरछे खड़े ऑटो भी दिखाई दे रहे थे, कई सारे।इन सब ने आपस में मिलकर एक ऐसी कलाकृति बना ली थी जिसे देख कर शायद पिकासो भी पानी भरता। और इस तरह खड़े होने से किसी और वाहन के निकलने का भय भी समाप्त हो गया था। एक ऑटोनॉमी वाली जो फील आती थी सो अलग।घर से ढूढ़ कर सवारी निकाल लाने वाले इन काकदृष्टी ड्राइवरों के पास दो ही काम हुआ करते हैं।पहला आती जाती सवारियों को तौलना दूसरा उस बुढ़िया को छेड़ना । कुछ शरीफ ड्राइवर तरस खाकर कभी कभार उसे कुछ खाने पीने का भी दे दिया करते हैं पर एलीट क्लास के ड्राइवरो की तो बात ही निराली है।उतने में वहाँ पर रोड की चौड़ाई घटाने का ठेका लेने वाला स्टैंड संचालक छुट्टे सांड़ की तरह न जाने कहाँ से प्रकट हुआ।पता नही वो विस्णु जी के गदे से प्रेरित था या बाहुबली वाले भल्लालदेव के गदे से।पर उसके हाथ में गदानुमा लकड़ी का डंडा जरूर था। उस डंडे को उसने बुढ़िया की तरफ बढ़ाया और अभद्र इशारे करते हुए कुछ मर्दानगी भरी बातें करी।इसके बाद वहाँ उपस्थित सभी मर्दो ने मदमस्त हास्य बिखेरा।कुछ मर्दाना पुलिस वालियाँ भी वहाँ मौजूद थी और उन्होंने भी कम हँसी नही उगली।ये हमारे विकास की नारी सशक्तीकरण वाली तस्वीर थी।पर इन सभी मर्दो की मर्दानगी अभी संतुष्ट कहाँ हुई थी। वो तो तब संतुष्ट हुई जब वो बुढ़िया एक पत्थर लेकर उठी और गाली बकते हुए सबको दौड़ा लिया हाँलाँकि ये उसका रोज का काम था और वो किसी को मारती भी न थी।पर क्योंकी ये उसके रोज का काम था इसीलिए वो पागल थी। अपनी माँ के उम्र की औरत में भी हवस के अंश ढूंढ़ लेने वाले इन महामर्दों या यूँ कहें की नामर्दों की सोच पर ही घिन आ रही थी। इतना कुछ देखने के बाद बस दिमाग में यही आ रहा था की क्या सिर्फ सड़कों की चकाचौंध ही विकास की पिक्चर चलाती है। पर अब तक हमारा वारेंट जारी हो चुका था। बस जो आ गयी थी। और बस के चलने के साथ साथ हम भी अपनी पंद्रह मिनट की इन यादों को समेटते हुए बढ़ चले।


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