नवारुण भट्टाचार्य की बांग्ला कविता का हिंदी अनुवाद

तुम्हारा भाग्य बेहद सुसम्पन्न है

क्रॉस का निर्माण पूरा किया बढ़ई ने

लोहार ने बना ली हैं बड़ी कीलें

माली ने भी बना लिया है कांटे का मुकुट

इन सभी कामों के बदले वे मजदूरी पाकर खुश हैं

अंतिम यात्रा में जो लोग तुम्हे धिक्कारेंगे

उन लोगों ने भी अपने गले साध लिए हैं

जबरदस्त

सैनिकों ने भी पहन लिए हैं जिरहबख्तर , लोहे के जूते ,

उठा ली हैं बर्छियाँ

जय ध्वनियाँ उठ रही हैं शासन की

कम्बल में लिपटे कुछ कुष्ठ रोगियों को छोड़

कोई भी तुम्हारे पक्ष में नहीं

घोड़ों के नुथनो से निकल रही है गर्म भाप

सूर्य भी प्रखर हो रहा है

तुम्हारी छाया को भी पत्थर में चुनवा देने के लिए ,

तुम्हारा भाग्य सच बेहद संपन्न है

आसमान की ओर ताको देखो

कोई बादल भी नहीं है जो भिगो दे तुम्हारे होंठ

पहाड़ों के स्खलित रूखी हवा के संग

डायनो की भयावह आवाज़ें आ रही हैं

सांचे में ढाल कर रखा हुआ कंकाल मुंड

जिसके आँखों के कोटरों में सिर्फ तप्त

गर्म बालू भरा है

कहीं नहीं है कोई विलाप के चिन्ह

इन सब के बावजूद भी क्या तुम कहोगे

तुम्हारा भाग्य सुसम्पन्न नहीं ?

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