मैं आज ही पहुंची हूँ। घर में भाभी ने सबका नाश्ता निपटा दिया पर खुद निराहार भाग दौड़ कर रही है।आज पुत्रदा एकादशी है।पंडित जी पूजा करने आ रहे हैं ।पंडित जी आए तो मुझे देख कर सकपका गए। नमस्कार की औपचारिकता के बाद मैंने अखबार उठा लिया।भाभी की भाग दौड़ और फुर्ती देखते ही बनती थी।पूजा के लिए भाभी ने आसन जमा लिया था ।

पंडित जी इस घर से चिपक गए हैं। वास्तु ज्योतिष पूजा रिश्ते हर काम में इनकी ही चलती है।भाभी मोटी दक्षिणा देती रहती है घर का हर भेद जानते हैं।अच्छा खासा दखल रखते हैं।

मैं घर की बेटी हूँ पर पंडित जी मुझसे कतरा रहे हैं क्योंकि कितनी भी समस्याएं आईं मै ने उनसे कभी उपाय नहीं पूछे।कुंडली नहीं दिखाई।

पिछली बार जब मैं मायके आई हुई थी । एक दिन मैं बाजार से आई तो पंडित जी भाभी से कह रहे थे तुम्हारी ननद अलक्ष्मी है। उसे घर मे कम बुलाया करो। उतने में मैं आ गई ।पंडित जी से मेरी खासी बहस हुई। मैंने कहा अपने घर मे बेटियों को आने से आप कैसे रोक सकते हैं।

हफ्तों मैं खुद को टटोलती रही उन्होंने ऐसा कैसे कह दिया फिर सोचा सब भाभी के विचारों का संक्रमण है।

पूजा चल रही थी।उधर रमा बुआ मुझसे मिलने आईं हम आंगन में धूप सेकने आ बैठे।

बुआ धीरे से बुदबुदाइं" दो बारी बच्चा गिरवा चुकी है जाने कब इस घर को वारिस मिलेगा।"

मैंने कहा"बुआ, भगवान जो दे उस की हत्या करो फिर भगवान से बेटे मांगो।अक्ल मारी गई है लोगों की । वैसे भी अगर किसी का घर बर्बाद करना हो तो उसे दो लोगों से मिलवा देना चाहिए एक वास्तु शास्त्री और एक ज्योतिषी।"

मैं जानती थी पंडित जी पीछे ही खड़े हैं।

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