1. बेचारा वह
भरा हुआ था प्रिया विरह से
कभी हुई थी चूक तनिक सी
उसके प्रभु ने शक्ति छीन ली
फिर निर्वासन एक बरस का
दूर रामगिरि के आश्रम में
जगत्पावनी सीता के स्नानधर्म से
साधारण जल
परिवर्तित हो बना पुण्यजल
जहां यक्ष ने किया बसेरा
वह बेचारा

2. उस पर्वत पर
अति-उत्कंठित, प्रियाहीन वह
निकल गया था कनक वलय, पर
होश कहां थे
तडप तडप कर
मास बिताए जिसने कितने !
पर जब आया
प्रथम दिवस आषाढ मास का
मोहक बादल, उसने देखा
भिडा हुआ पर्वत चोटी से
मानो शिशु गज लगा हुआ
उत्खात केलि में


3. वह सेवक
धनपति कुबेर का
मेघ निरख उत्कंठित होकर
अन्तर्मन था भींग गया
सो, किसी तरह था खडा
सोचता, बहुत देर तक
जाने क्या क्या !
स्वाभाविक था
मेघ घिरे
तो प्रिया-युक्त का भी मन डोले
तो क्या गति होगी उसकी जो
कहीं पडा है दूर देश में
लालायित हो
एक प्रिया-आलिंगन को भी

4. जीवित है वह
प्रिया-प्राण के ही आश्रय से
आने वाला है सावन जो
सो प्रसन्न हो
ताज़ा कुटज भरी अंजलि से
जैसे उसका अर्घ्य बनाकर
किया निवेदन
प्रेम ग्रथित वाणी में बोला
'आओ बन्धु तुम्हारा स्वागत !'
मन में थी यह बात
प्रिया तक
बन्धु, हृदय पहुंचा दो मेरा


5. धुंआ, आग, हवा और पानी
इनसे मेघ बना है
वह तो जीव-हीन है, चित्तरहित है
फिर भी उससे किया
निवेदन
उत्कण्ठा का मारा था
सो, सोच न पाया
इन संदेशों को ले जाना
सक्षम प्राणी के वश में है
जो अपनी आंगिक चेष्टा में
चतुर निपुण हैं

बडी दुसह है काम-यातना
बौद्धिक जन भी इसके मारे
भेद भुलाते
जड चेतन का
बस अपनी इच्छा दिखती है

6. बन्धु ! सुनो तुम
मुझे विदित है, तुम कुलीन हो
जन्म तुम्हारा
जग प्रसिद्ध
पुष्कर आवर्तक के कुल में है
काम रूप तुम
प्रथम पुरुष तुम देवराज के
दैव योग से
अपनों से मैं दूर यहां हूं
तभी तुम्हारा
याचक बन कर आया हूं मैं
अधिगुण पुरुषों से कुछ मांगूं
याचित नहीं मिले
तो भी यह
उचित श्रेष्ठ है
नीच-अधम लोगों से
मिलना तय हो फिर भी
कभी न मांगूं


7. तपते हैं जो धूप विरह में
शरण तुम्हीं
उन तप्त जनों की
मैं झुलसा धनपति प्रकोप का
सुन लो मेरी
दूर प्रिया से यहां पडा हूं
पहुंचा दो बस
उन तक यह मेरा संदेशा
रहती हैं
अलका नगरी में
उसी अमीरों की बस्ती में
जाना होगा,
जहां नगर के
बाहर का उद्यान भवन भी
बना श्वेत पत्थर से
जो हैखूब दमकता
शिव मस्तक की चन्द्रप्रभा से

8. वायुमार्ग से जब सवार हो
आते तुमको देखेंगी
परदेशी पतियों की ललनाएं
मुख पर आए बालों को
दोनों हाथों से
पीछे कर, आश्वस्त हुई सी
निरखेंगी
उनके प्रिय तो आते होंगे
मेघ उमडने पर
अपनी वियोग से व्याकुल पत्नी का कोई
कैसे कर सकता अनदेखा
यदि पराधीन वह नहीं
किसी का बंधुआ नौकर
मुझ जैसा


9. तुम अवश्य देख पाओगे
अपनी पतिव्रता भाभी को
खोई सी जो
मुझमें ही तल्लीन
कहीं बैठी, गुमसुम सी
मेरे आने के दिन गिनती
तुम तो इच्छा-गति वाले हो
जहां कहीं भी
जा सकते हो
खोज सकोगे
अरे अगर तुम सोच रहे हो
प्रेमी हृदय फूल सा कोमल
सह कैसे पाया होगा
दारुण वियोग को
कैसे होगी वह जीवित अब
तो सुन लो तुम
प्रिय से फिर मिलने की आशा
है वह संबल
जो देती है जीवन
प्रिय वियोग से व्यथित हृदय को

10. मन्द मन्द चल रही हवा
तुम्हें है
प्रेरित करती
और उधर देखो तो बाएं
चातक
कैसे मगन हुआ
गाता जाता है
पिछला गर्भाधान काल सुख
जीती यादों में
गदगद हो उन्मत्त बगुलियां
पंक्तिबद्ध हो
निश्चय से भोगेंगी फिर से
तुम को
वे आकाश मार्ग में
बढो
बहुत ही शुभद शकुन है


11. वह पृथ्वी जो
उठी हुई कन्दलियों से उभरी है
उपजाऊ प्रचुर है
व्याकुल है
उसको मिलना
कर्णमधुर
जब शब्द तुम्हारे
गर्जन हंस सुनेंगे
वे भी मानसरोवर जाने को
उत्सुक होकर
नभ पथ के सहयात्री बन
कमलनाल का अग्रभाग
लेकर अपना पाथेय
कैलास के आने तक
निश्चय वे साथ निभाएंगे

12. मनु-पुत्रों से पूजित हैं
जो वे पद हैं श्रीरामचन्द्र के
पाकर उनका चरन परस
निज कटि प्रदेश पर
अतिपावन हो चला
और फिर,
समय समय पर स्नेह तुम्हारा
पाकर अपना मान चुका है
तुमको,
उस बान्धव से
तुंग शैल से आलिंगन कर
बन्धु ! विदा लो
वह भी तो है सखा तुम्हारा
इस विछोह में
गर्म सांस लें
अपना स्नेह जताता है वह


13. फिर बतलाऊंगा संदेशा
जो कानों से पी लेना तुम
मार्ग तुम्हें पहले बतला दूं
ताकि सुभीता रहे
वहां सीधे जाने में
सुनो ध्यान से
चलते चलते थक जाओ
तो तुम अवश्य कुछ सुस्ता लेना
वहीं पहाडों की चोटी पर
जल बरसाकर
लगे तनिक कमजोरी सी
तो, उन्हीं पहाडी नदियों का
सुस्वादु नीर चख लेना
जी भर
लेकिन याद रहे यह हरदम
आगे तुमको जाना ही है
ओ मेरे प्रिय बादल भाई

14. जैसे ही तुम उस पर्वत की चोटी से
उडे, तभी वे
सिद्धों की भोली वनिताएं
विस्मित हो देखेंगी
जैसे मुग्धा
बेसुध और एकटक
नायक को देखा करती है
देखो, हवा उडा ले भागी
उस पहाड की चोटी को ही
सिर उतान,
आंखें तुम पर ही
आंखों में क्या उत्सव होगा !
किन्तु न तुम मोहित हो जाना
बढना आगे
हरे भरे बेतों के वन से
बचते बचते
उन दिग्गज के सूंडों के आघातों से
बचते बचते
तुम्हें निकलना होगा आगे


15. इन्द्रधनुष का टुकडा जो
मिश्रित रत्न-कान्ति सा मोहक
निकल रहा है उधर
बाबी के ऊपर
देखो,
निकट मात्र होने से
उसके
मित्र, सत्य तुम चमक उठोगे
श्याम-वर्ण है रूप तुम्हारा
निश्चय से तब
मोरपंखधारी विष्णु सा
जब वे आए थे बन कान्हा
ग्वाल बाल बन

16. खेती की तो आस तुम्हीं हो
इसीलिए ग्राम्या ललनाएं
तृषित दृष्टि से
देखेंगी
भरपूर नज़र से
जो न जानती भ्रू विलास रति
भोली भाली चितवन वाली
प्रीति स्नेह से सहलाएंगी
माल क्षेत्र में

सोंधी सोंधी खुशबू
जब निकले मिट्टी से
हल से जब
खुजलाई जाए, तब
किंचित पश्चिम हो जाना
और तनिक आगे बढते ही
बंधु ! शीघ्र उत्तर हो जाना


17. शीतल होगा
तप्त आम्रकूट का वह प्रांगन
उसके अन्तर्मन का दावानल
तीव्र तुम्हारे बौछारों से
मानेगा उपकार
और गदगद होकर
सिर-आंखों पर बैठाएगा
साथ साथ आनन्दित होकर
जी भर कर
आतिथ्य करेगा
यही सोच तुम थके हुए हो

नीच लोग भी देते आश्रय देते
उपकारी को
पर वह तो उन्नत है
उसका कहना ही क्या !

18. सुनो, बंधु ! इक बात सुनो
तुम्हारा वर्ण
चमकीले और कोमल जूडों सा है
और तुम जब जा बैठोगे
ऊपर चोटी पर तो
आम्रकूट पर्वत के चौडे मध्यभाग में
पके आम की
पांडुर पांडुर दीपित शोभा
और दो पहाड
उन्नत उन्नत
सन्नद्ध वहां हैं
गोल गोल पांडुर पांडुर
ऊपर से श्यामल गात तुम्हारी
होगा प्रतीत कुछ ऐसा ही
मानो पृथ्वी का स्तन युगल
वस्त्रहीन हो उभरा है
सुन्दर कोमल


19. उस पर्वत के
जिन कुंजों में
अपने प्रिय से वनचारिणियां
काम तृषित हो
प्रेम मग्न हो
वहां फुहारा देना
लेकिन हौले हौले
किन्तु ठहरना बस क्षण भर ही
जल बरसा कर
हल्के होकर
गति अपनी जब तीव्र करोगे
पूरा करते ही उस पथ को
देखोगे हाथी के मस्तक पर चित्रित सी
विन्ध्याचल की तलहटी भूमि
कई भाग में बिखरी सी
नर्मदा दिखेगी
देखोगे
वह अस्त-व्यस्त है
ऊबड-खाबड चट्टानों में

20. जल बरसाकर
दोबारा तुम
हो जाओगे फिर से हल्के
सो पी लेना
उसी नर्मदा में बहता
जामुन वन का रोका पानी
वह मद मिश्रित है
वहां घूमते
गर्वित हाथी के मद से
तुम मतवाले हो जाओगे
तब अन्दर ताकत कुछ
महसूस करोगे
वरना हल्केपन में
हवा उडा ही लेगी
जब अन्दर कुछ वज़नदार
हो तब तो कोई
टिक पाता है अपने पथ पर


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