सोख लेता अतिरिक्त पानी

गढ़ने को चाय का स्वाद

सोंधी फुहार लिए

होंठों पर झूमता

कुम्हार की चाक बैठ

ज़िन्दगी -सा घूमता

हर थाप पर संवारता

अपना स्वरुप

पंक्तियों में सजा खूब , गंठियाता धूप

अग्निशिखा में बन कुंदन रूप

आओ ! किसी दिन ढाबे पर बैठ

दूर तक उड़ेली हरीतिमा को

आँखों से पियें

बादलों की रुई भरकर हाँथों में ,

खेत निहारते माटी के लाल – सा

नंगे पाँवों धरती को छुएं

आओ कभी कुल्हड़ में चाय पियें !

कुम्हार के श्रम को चूमते हुए

माटी की पावन सुगंध, जियें |








hindi@pratilipi.com
+91 8604623871
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.