रिंगटोन बजते ही अनुराधा का हाथ तेज़ी से फ़ोन की तरफ़ बढ़ा। उसकी सहेली निशा का था। ओह नो ! निशा तुम , हम तो समझे कि मंत्री जी का फ़ोन है। तुमने अखबार में तो पढ़ा होगा न। हमें चुनाव .....अरे दुआ कर , जीत जाऊँ। नि शा ने रुआंसे स्वर में कहा –“ ज़रूर जीतोगी .....अनुराधा।” मैं बहुत परेशान हूँ। नरेश की वहशियाना हरकतें। माँ जी की किचकिच और ....बात को बीच में काटते हुए –“ अरे यार ! एक बात तो तुझे बताना भूल ही गयी। हम लोग शॉपिंग सेंटर खोलने जा रहे हैं , मेन मार्केट में। मौका पाकर निशा बोली –“ मैं तुमसे मिलना चाहती थी ,एक तुम्ही हो जो .......” और हाँ ! क्या कहा तुमने .....एक सेकण्ड न्यूज़ देखो ! स्लम एरिया में मेरा कार्यक्रम था , आज वही टेलीकास्ट हो रहा है .....

अच्छा ऐसा है कि तुम थोड़ी देर बाद फ़ोन करो …..वो मंत्री जी का फ़ोन आ रहा है न ...अरे हाँ ! मैं तो पूछना ही भूल गयी , तुम कैसी हो ?

फोन कट चुका था। उंह ...जल गयी होगी ....अनुराधा ने रिसीवर पटक दिया। बेमतलब .............न जाने क्या मिल जाता है लोगों को खुद फोन करके काटने में ?

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