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पिछली बारिश पहाड़ों से घिरे छोटे से कस्बे में मैं एक स्टडी टूर पर था, कुछ जड़ी-बूटियाँ खोजने गया था।यूथ हॉस्टल से सुबह-सुबह निकल पड़ता मैं।अभी अपने कमरे से बाहर ही आया था कि केयर टेकर ने आवाज़ दी- 'साब जी वो जन्तो के यहाँ पकोड़े बहुत अच्छे बनते हैं, लौटते में खाते आना, खाने में देर हो जाएगी।'मैं मुस्कराता निकल गया वहाँ से। अभी नीचे उतरा ही था कि घोड़े वाला कई सारे घोड़ो को हाँकते हुए- 'काली गंगा को कालो पानी, कैलो-कैलो छैलो छैलो', पहाड़ी धुन गुनगुनाते हुए ज़ल्दी में निकला। इतने घोड़े देख पहाड़ी रस्ते पर फिसलता बचा मैं।सँकरे रास्ते पर मैं धीरे-धीरे ऊपर चलने लगा।

रुई के फाहों से बादल, सरपट भागते हुए मेरे सर के ऊपर थे, कई बार लगता कि मैं बादलों के ऊपर हूँ, नीचे अब कुछ नहीं दिखाई दे रहा था। हलकी दूधिया रौशनी में टॉर्च के सहारे मैं कुछ ढूँढ रहा था कि तेज़ बारिश शुरू हो गयी। पहाड़ों पर बारिश कभी भी हो जाती थी, मैंने बरसाती निकाल ली और चट्टान की ओट में खड़ा हो गया। थोड़ी देर बाद कुछ बादल छटे तो अहसास हुआ कोई और भी है वहाँ।चारों तरफ नज़र दौड़ाई तो पाया एक छोटा सा झरना जो कि बादल की वज़ह से नहीं दिखाई दे रहा था बीच सड़क से गुज़र रहा था। झरने के इस ओर मैं था तो दूसरी ओर वो थी। बहुत सावधानी से झरने के पास से दूसरी ओर आ गया। मुझे एक बार घूरा उसने तो मैं पास बनी टी स्टाल की ओर मुड़ गया पकोड़े खाने।

टी स्टाल में बैठा मैं, बस उसे ही देखे जा रहा था।जन्तो ने कहा- जाने दो साब थोड़ी पागल है, कर्नल की बेटी है। कर्नल सुनते ही बन्दूक याद आ गयी, आधे हौसलों ने वहीँ दम तोड़ दिया। तेज़ हवा उसकी छतरी छीन ले गयी। कुछ दूर अपनी छतरी के पीछे भागी वह,फिर झल्ला कर रह गयी। मैंने भी नीचे झांक कर देखा तो उसकी छतरी पहाड़ों से नीचे उतरती हुई जैसे गाना गा रही थी- 'हवा के साथ-साथ, घटा के संग- संग'। मुझे जोर से हंसी आ गयी। जैसे ही उसकी ओर मुड़ा,दो पल के लिए उसे देखता ही रह गया। मेरी कमबख्त नज़रें उससे हटने का नाम ही नहीं ले रही थीं। उसने मुझे घूरा तभी जन्तो ने आवाज़ दी- साब जी आपके पकोड़े, मैंने अपने भजिये पर ध्यान देना ही सही समझा।

वह चुपचाप झरने की ओर बहकर जाते हुए पानी की ओर बढ़ गयी। उसने अपने हाथों पर कुछ छुपा रखा था। मेरे अन्दर का खोजी अब किसी जासूसी उपन्यास के नायक की तरह उस पर नज़र रखे हुए था।धीरे से अपने दुपट्टे से कुछ निकाला उसने और चारों ओर नज़रें दौड़ाई, कहीं कोई उसे देख तो नहीं रहा,मैं वापस अपने पकोड़ों को देखने लगा। अपने हाथों में छुपाई हुई एक कागज़ की कश्ती उसने पानी में बहा दी। उसकी बहाई हुई कश्ती को वो बहुत उम्मीद से देख रही थी और मैं उन दोनों को। उस कश्ती पर कुछ लिखा हुआ था शायद... जिसे मैं पढ़ नहीं पाया। बड़े ही उत्साह से अपनी बहाई कश्ती को पहाड़ों से उतरने तक देखती रही वह फिर वापस चली गयी...

उसके जाने के बाद मैंने जन्तो को देखा और कहने लगा कमाल है,आज कल भरी जवानी में लोग पागल हो रहे हैं,इतनी बारिश में भीगते हुए आना वो भी सिर्फ कागज़ की नाव बहाने के लिए, ठहाके लगाकर हँस पड़े हम दोनों। हमें हँसता देख जन्तो की बीवी ने कहा- किसी के दर्द में हँसना अच्छी बात नहीं साब जी। मेरे चेहरे के भाव बदल गए ये कहते हुए दर्द में...

वह कहने लगी- जिस पर बीतती है वही समझ सकता है साब उस बेचारी का दर्द। जन्तो कहने लगा साब जी वो कहते हैं न इस्क वाला रोग बस वही है साब। मैं वापस अपने कमरे में आ गया पर मेरा मन अभी भी उस कश्ती में लगा हुआ था। आखिर क्या लिखा था उस कश्ती में और उसे बहाने के पीछे क्या उद्देश्य था... रात कब सो गया, पता ही नहीं चला। अगली सुबह से मैं जड़ी बूटी की खोज में निकल गया। चलते-चलते बहुत दूर पहुँच गया था और पहाड़ों में रास्ता भटक गया था।अभी बादलों ने अपना डेरा डाला ही था कि अँधेरे में पाँव फिसला और मैं गहरी खाई में गिरने वाला ही था कि किसी के मजबूत हाथों ने थाम लिया मुझे।

ऊपर आने पर देखा तो उम्र हो चली थी, मगर शरीर अभी भी चुस्त-दुरुस्त, मन में चल रहा था कहीं ये कर्नल साहब तो नहीं। उन्हें देख हल्का मुस्कुराया ही था कि रौब के साथ कहने लगे- उल्लू, गधे, बेवकूफ देख कर चल नहीं सकते, अभी गिर जाते तो लाश भी नहीं मिलती।बेईज्ज़ती का सारा कोटा एक बार में ही पूरा हो गया था। मैंने दबी आवाज़ में कहा रास्ता भटक गया था और वो अँधेरे में पैर फिसल... इतना ही कहा था मैंने कि वे कहने लगे- बाहर से आये हो? चलो मेरे साथ।

मैंने चुपचाप चलने में ही अपनी भलाई समझी। वैसे मैं बता देना चाहता हूँ कि मैं बहुत बहादुर हूँ, मुझे किसी से भी डर नहीं लगता पर अँधेरे में जो जानवरों की आवाजें आ रही थीं मेरी रूह काँप गयी। कर्नल साहब ने कहा- बस इतने में ही डर गए।चले आते हैं घूमने मुँह उठा कर,डरपोक कहीं के। मैंने कहा मैं साइंटिस्ट हूँ, जड़ी बूटी की खोज में आया हूँ। मुझे देख कर मुस्कराए और अपने पीछे आने को कहा।

थोड़ी देर बाद मैं एक बड़े से बंगले में था।कीचड़ से सना मैं जैसे ही उनके घर के बाहर पहुँचा तो उन्होंने आवाज़ लगायी- श्याम सिंह पानी लाओ।इतना जोर से कहा कि मैं डर गया। पानी आने पर अपने हाथ मुँह धोकर उन्होंने मुझे इशारा किया, मैं भी जल्दी-जल्दी हाथ-मुँह धोने लगा।मुझे देख सामने वाला ये समझ सकता था कि मैं उनकी सेना में भर्ती होने वाला नया रिक्रूट हूँ।

अन्दर आने पर उन्होंने आवाज़ लगायी तृप्ति चाय लाओ। कुछ देर बाद अन्दर से चाय का प्याला लिए उनकी पत्नी बाहर आईं। मैंने तो सोचा था कि बेटी का नाम तृप्ति होगा।मैं चारों ओर देख रहा था दीवारें मैडल से सजी हुई थीं, कई सारी तसवीरें,कप रखे हुए थे।मैं उन्हें देख कहने लगा- सब आपके हैं? रौब के साथ अपनी मूंछों पर हाथ फेरते हुए कहा- हाँ मेरे और मेरी बेटियों के हैं।

अपनी पत्नी की ओर मुड़ते हुए उन्होंने कहा- आपकी शहजादी कहाँ हैं? उनकी पत्नी ने अपनी नज़रें झुका लीं तो कहने लगे ज़रा समझिए इस तरह कश्तियाँ बहाने से कुछ नहीं होगा, जिसे जाना था वो चला गया, अब नहीं आयेगा। तभी कुछ क़दमों की आहट हुई। मैंने नज़रें उठाई तो सामने एक हाथ में छतरी,दुसरे में कुछ कश्तियाँ हाथ में थामे, भीगी हुई ठण्ड से काँपती वही पागल लड़की मुझे देख बोली- तुम यहाँ क्या कर रहे हो?मैं कुछ कहता, इससे पहले कर्नल साहब बोले- साइंटिस्ट हैं,जड़ी-बूटी खोजने आये हैं। ज़ोर से हँसी वह और हँसते हुए बोली- 'पापा रामायण काल में हनुमान जी आये थे यहाँ संजीवनी बूटी खोजने और पूरा सुमेरु पर्वत उठा ले गए थे वैद्य सुशेन समेत। आप बच कर रहना, इस बार ये वानर जी पता नहीं क्या उठा ले जायें', हँसती हुई अन्दर चली गयी।कर्नल साहब हँस पड़े और मैं भी मुस्करा कर रह गया,मुझे बन्दर कह गयी थी।मेरी नज़र दरवाज़े के बाहर पड़ी, कुछ कश्तियाँ जो हडबडाहट में उसके हाथों से छूट गयी थीं, जैसे उन्हें मेरा ही इंतज़ार था।मैं उठा और उन्हें धन्यवाद् कहते हुए दरवाज़े के पास बैठ अपने जूते पहने और धीरे से एक कश्ती अपने मोज़े में छुपा ली,सबकी नज़रों से बचकर, ठीक वैसे ही जैसे स्कूल के दिनों में चिट छुपाया करते थे।अपने हॉस्टल की ओर चल दिया मैं गुनगुनाते हुए- 'एक लड़की भीगी भागी सी'।

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