क्लास में घुसते ही भावना के नाक में सिगरेट के धुंएँ की तीखी गंध गई | क्रोध से उसका चेहरा तमतमा गया | लेकिन खुद को संयत कर उसने दो - तीन बार जोर से सांस अन्दर खिंची और हर बार वही गंध तेज़ी से उसके अन्दर घुसती चली गई | फिर तो वह आपे से बाहर हो गई और उसने क्लास के सभी स्टूडेंट की तलाशी लेनी शुरू कर दी |तलाशी में अनिमेष के शर्ट की जेब से सिगरेट का पैकेट बरामद हुआ |भावना  गुस्से में आकर उसे लेकर प्रिंसिपल रूम की ओर चली गई |

शहर के एक प्रतिष्ठित पब्लिक स्कूल के कक्षा नौ में पढता था अनिमेष | भावना के साथ चलते हुए उसने कई बार " मैम .......मैम " कह कुछ कहना चाहा ; लेकिन भावना का गुस्सा इतना तेज़ था कि उसने  सुनकर भी नहीं सुना | प्रिंसिपल आरती सिन्हा काफी कड़ी प्रिंसिपल मानी जाती थीं |भावना ने उनके ऑफिस में जाते ही अनिमेष की शिकायत लगाई और कहा - " मेरे क्लास में आने के पहले यह सिगरेट पी रहा था | मुझे इसकी शर्ट की जेब से सिगरेट का पैकेट मिला है |"

भावना की काम्प्लेन सुन प्रिंसिपल ने आव देखा न ताव तुरत अनिमेष की माँ  को फ़ोन कर स्कूल आने को कह दिया | अनिमेष ने प्रिंसिपल से भी कई बार कुछ कहने की कोशिश की ; लेकिन आरती सिन्हा और भावना दोनों ही अनिमेष को अपनी - अपनी तरह से सुधारने वाली बातों के साथ - साथ उसके पैरेंट्स के लालन - पालन पर भी लंबा - चौड़ा वक्तव्य देती रहीं | 

लगभग पैंतालिस मिनट के बाद अकबकाई हुई अनिमेष की माँ ने प्रिंसिपल के ऑफिस में प्रवेश किया | इतनी देर तक चुपचाप तरह - तरह से डांट सुनते अनिमेष की आँखों में माँ को देखते ही आंसू आ गए |उसका मन हुआ बचपन की तरह वह अपनी माँ की गोद में मुंह छुपाकर जोर - जोर से रोये |

अनिमेष की माँ ने अन्दर आते ही चिंतातुर हो प्रिंसिपल से पूछा - " क्या हुआ ?? मुझे क्यों बुलाया गया है ? अनिमेष तो ठीक है न ?"

" अनिमेष तो ठीक - ठाक उधर खड़ा है |" - प्रिंसिपल आरती सिन्हा ने अनिमेष की ओर इशारा कर कहा |

अनिमेष पर नजर पड़ते ही उसकी माँ को चैन मिला | लेकिन मन के संशय ने उन्हें फिर से प्रिंसिपल से सवाल करने को मजबूर कर दिया - " मुझे किस कारण बुलाया आप ने ?"

" देखिये मिसेज भटनागर हम अनिमेष को अब और स्कूल में नहीं रख सकते | " - इस बार भावना ने तीखे लहजे में जवाब दिया |

" क्यों ,क्या हुआ ?" - घबडाए स्वर में अर्चना भटनागर ने पूछा |

" मिसेज भटनागर ,अभी भावना को क्लास में जाने में सिर्फ पांच मिनटों की देर हुई और आपका बेटा क्लास में ही सिगरेट पीने लगा | उसकी जेब से सिगरेट का पैकेट और पैर के पास फर्श पर अधजला सिगरेट का टुकड़ा मिला है | मैं इसे अभी के अभी सस्पेंड कर रही हूँ | आप ले जाईये और जो स्कूल इसे रखना चाहिए उसमें एडमिशन कराईये |"

प्रिंसिपल की बात सुन रुआंसा  सा हो अनिमेष ने फिर कुछ कहना चाहा लेकिन अपनी माँ और टीचर्स की खा जाने वाली निगाहों से सहम कर चुप हो गया |

अनिमेष अरविन्द भटनागर और अर्चना भटनागर की दूसरी सन्तान था |पहली सन्तान बेला मुम्बई मेडिकल कॉलेज में इस वर्ष ही एडमिशन पाकर मुम्बई में हॉस्टल में रहती थी | अरविन्द और अर्चना अपने बच्चों के संस्कार और पढाई - लिखाई के प्रति काफी सचेत रहते थे |अरविन्द अक्सर कहा करता था - " अर्चना , अगर हमने आज के इस बिगड़े माहौल में अपने बच्चों को पढ़ा - लिखाकर एक संस्कारवान नागरिक बना दिया तो समझो जीवन सफल हो गया |"

ऐसे विचार वाले अरविन्द को जब अर्चना ने प्रिंसिपल ऑफिस से बाहर निकल फ़ोन पर पूरी घटना संक्षेप में बताते हुए स्कूल के डिसीजन के बारे में बताया तो अरविन्द बौखला गया | वह उसी समय ऑफिस से छुट्टी लेकर घर पहुँच गया | तब तक अर्चना भी अनिमेष को लेकर घर आ चुकी थी | पूरे रास्ते भर जब भी अनिमेष अपनी माँ से कुछ कहने की कोशिश करता वह खा जाने वाली आँखों से उसे घूरती |फलत: सहम कर अनिमेष चुप हो जाता  | रास्ते भर की माँ की चुप्पी ने अनिमेष को घर पहुँचने के बाद के हालात से बहुत हद तक वाकिफ करा दिया था | अत: घर पहुँचते ही वह सीधा अपने कमरे में जाकर बैठ गया |

अरविन्द ने घर में घुसते ही अनिमेष को बुलाकर तडातड कई चांटे जड़ दिए | अपना गाल सहलाता याचना से आंसू भरी आँखों से उसने कई बार पिता को देख कुछ कहना चाहा 

| लेकिन , क्रोध से कांपते पिता को देख उसके शब्द गले में ही सूख गए |

उस रात किसी ने खाना नहीं खाया | अनिमेष चुपचाप अपने कमरे में घंटों रोता रहा | उसके मन में तरह - तरह के विचार आते - जाते रहे |

उधर अर्चना और अरविन्द को अपनी परवरिश में बार - बार फेल होने का अहसास कचोटे जा रहा था और वे दोनों बिना एक शब्द एक - दुसरे से बोले चुपचाप छत को देखते पड़े हुए थे |सुबह  अर्चना का दुःख कुछ देर के लिए अलग  हो गया और माँ की ममता ने उसे अनिमेष के कमरे में ला खड़ा किया | कमरे में घुसते ही अर्चना के मूंह से जोरों की चीख निकली |अरविन्द  दौड़ते हुए अर्चना की चीख सुनकर वहाँ आया तो कमरे का मंजर देख उसके भी होश उड़ गए | अनिमेष बेड पर निढाल पड़ा था | उसने अपनी कलाई की नसें ब्लेड से काट ली थीं | खून बहकर चादर को गीला कर  रहा था | अरविन्द ने तुरत उसे गोद में उठाया और अर्चना को गाडी की चाभी लेकर आने को कहा | गाडी की चाभी लेने को जाती अर्चना की नजर अनिमेष के तकिया के पास पड़े मुड़े हुए कागज़ पर पड़ी | उस पर अनिमेष की लिखावट देख उसने कागज़ उठा पर्स में रख लिया और तेजी से बाहर निकल गई | अरविन्द ने उसे गाडी की पिछली सीट पर अनिमेष का सर गोद में लेकर बैठने को कहा | बदहवास सी अर्चना के दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था | बिना कुछ सोचे - समझे वह यंत्रवत अरविन्द के कहे अनुसार अनिमेष के साथ पीछे बैठ गई |

अरविन्द पास के हॉस्पिटल में लेकर जब अनिमेष को पहुंचा तो डॉक्टर ने पहले परिक्षण के साथ ही हल्के  स्वर में कहा - ' नो हॉप ,बट हम कोशिश करते हैं |'

अनिमेष को डॉक्टर के हवाले छोड़ अर्चना और अरविन्द विजिटिंग रूम में जाकर बैठ गए |अर्चना के आँखों से आंसू लगातार बहे जा रहे थे | वह चिल्ला - चिलाकर रोना चाह रही थी | लगभग ,घंटे भर बाद डॉक्टर ने आकर बताया - " हमलोग पूरी  कोशिश कर रहे हैं | लेकिन ,सब कुछ ऊपर वाले के हाथ है | अगर अनिमेष को रात में किसी समय होश आ जाता है तो उसके बचने के चांसेज हैं नहीं तो ...|"

डॉक्टर की बात सुन अर्चना का दिल बैठ गया |उसने साहस कर पूछा - "क्या हम अनिमेष को देख सकते हैं ?"

 " जी , आप लोग ICU के बाहर से ही उसके कमरे में झांकर देखें अभी | अगर  सिचुएशन कुछ कंट्रोल होती है तो आप को अन्दर बुला लेंगे |"

ICU के बाहर लगे शीशे से अनिमेष के पीले पड़े चेहरे को देखते हुए अचानक अर्चना को उसके लिखे कागज़ का ध्यान आया जिसे चलते - चलते उसने अपने पर्स में लगभग ठूंस कर डाल लिया था | वहीँ फर्श  पर बैठ पर्स से कागज़ निकाल उसने पढ़ना शुरू किया - 

"मॉम ,डैड , मैं आप दोनों से बहुत प्यार करता हूँ और आज यह जो कुछ भी हुआ उसके लिए मैं अपने -आपको माफ़ नहीं कर पा रहा हूँ | इसलिए मैं ने अपनी जिन्दगी खत्म करने का फैसला किया है | लेकिन जाने से पहले वह बात जो मैं कई बार स्कूल में भी कहना चाह रहा था और आपलोगों को भी बताना चाहता रहा लिखकर जा रहा हूँ | हो सके तो मुझे माफ़ कर दीजिएगा |"

इतना पढ़ते - पढ़ते अर्चना की हिचकी बंध गई |  अपना जी कड़ा कर उसने आगे पढ़ना शुरू किया - " मैं ने सिगरेट नहीं पी | यह सच है लेकिन यह भी सच है कि सिगरेट का पैकेट मेरे पास था और अधजला टुकड़ा भी फर्श पर मेरे ही पैरों के पास मिला था | दरअसल ,सिगरेट मेरा दोस्त समर्थ पीता है | उसके मम्मी - पापा दोनों ही काफी बीजी रहते हैं और कोई उसे टाइम नहीं दे पाते | घर पर वह अकेला ही रहता है |अक्सर ,अपने अकेलेपन की बातें वह मुझे बताता रहता है | मैं समर्थ से बहुत प्यार करता हूँ |उसका अकेलापन मुझे भी अन्दर से दुखी कर जाता है | उसकी कोई न तो बहन है और न ही भाई | ऐसे में खाली घर में मम्मी - पापा के लौटने तक अकेले रहना और उनके आने के बाद भी अकेले ही होना क्योंकि वे दोनों थके हुए आते हैं और बिना उससे कोई बात किये आराम चाहते हैं -- इस कारण समर्थ अन्दर से खोखला होता जा रहा है |उसे बहुत - बहुत प्यार की जरुरत है | अपने खालीपन को भरने के लिए उसने सिगरेट पीना क्लास सिक्स से ही स्टार्ट कर दिया था | क्लास में वह मेरे बगल में बैठता है और मेरे मना करने के बावजूद भी वह सिगरेट पी रहा था | वह सिगरेट के कश लगा रहा था कि मेरी निगाह दरवाजे पर आ रही भावना मैम पर पड़ी और मैं ने जल्दी से डेस्क पर रखा हुआ सिगरेट का पैकेट समर्थ को बचाने के लिए अपनी जेब में डाल लिया |समर्थ ने भी मैम को देखकर हड़बड़ी में अधपीया सिगरेट नीचे फेंका ,जो मेरे पैर के पास आ गया | हम दोनों ने ही उसे नहीं देखा |मैम ने आते ही मुझे पकड़ लिया और ........ | खैर ,मैं तो अब जा रहा हूँ लेकिन ममा तुम समर्थ को मुझ सा प्यार जरुर देना और डैड प्लीज आप उसकी यह गंदी आदत जरुर छुडवा दीजिएगा | वह भी मेरी तरह ही बहुत अच्छा लड़का है | हो सके तो मुझे आप दोनों माफ़ कर दीजियेगा |- अनिमेष |"

पत्र पूरा पढ़ते ही  अर्चना फूट - फूट कर रोने लगी | अरविन्द ने अर्चना के हाथ से पत्र ले एक सांस में पढ़ डाला और दीवाल की ओर चेहरा कर बिलख पड़ा | आशा और निराशा में झूलते  हुए रात कटी | सुबह ICU के फर्श पर बैठे - बैठे ही दोनों की आँख ज़रा सी क्या लगी कि अरविन्द का फोन बज उठा | फोन रिसीव करने पर दूसरी तरफ से प्रिंसिपल की आवाज सुनाई दी - "मिस्टर भटनागर हमें अनिमेष के बारे में सबकुछ सच मालुम हो गया है | समर्थ ने अभी स्कूल आते ही सारी बातें सच - सच बता दी हैं | वह अपने दोस्त के जाने से बहुत दुखी है और अपनी आदत पर शर्मिंदा भी | हम अनिमेष का सस्पेंशन वापस लेते हैं | और हाँ , समर्थ ने अभी मुझे लिखकर दिया है कि वह सिगरेट पीना छोड़ रहा है |साथ ही ,वह जीवन में अब कभी भी इसे हाथ नहीं लगाएगा | वी आर वैरी सॉरी  दैट |"

अरविन्द ने चुपचाप फोन काट दिया और छत पर अपनी निगाहें गडा दीं |घंटे भर बाद ICU की नर्स ने  आकर  हाथ के इशारे से दोनों को अनिमेष के रूम में जाने को कहा |डरते - थरथराते क़दमों से अपने - आपको ठेलते हुए अरविन्द और अर्चना रूम में दाखिल हुए | अनिमेष की आँखें बंद थीं |अर्चना लडखडाते हुए अनिमेष के पास पहुंची और उसके सर पर हाथ रखा कि अनिमेष का हल्का सा कमजोर स्वर उसके कानों में टकराया - "आई अम नॉट अ लायर |"

ख़ुशी और दुःख के मिले - जुले भाव से रोते हुए अर्चना ने कहा - " हाँ बेटा ,यू आर नोट अ लायर | "

बेड की दूसरी  तरफ से अरविन्द ने आकर अनिमेष का हाथ थाम रुंधे गले से कहा - " यस अनिमेष ,वी आर प्राउड ऑफ़ यू |सार्थक ने सारी सच्ची बात प्रिसिपल को बता दी है और उन्हों ने तुम्हारा स्कूल से सस्पेंशन वापस ले लिया है |"

अनिमेष के चेहरा  इस वाक्य से संतोष से भर गया  और आँखें खोल वह मुस्कुरा उठा |

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