कैफे काॅफी डे....

हम दोनो एक दूसरे का हाथ थामे दिल्ली के काॅनाट पैलेस के CCD की सीढियो पर चढे जा रहे थे । हाथ इतनी मजबूती से थामे थे जो एक पल भी छूटने को तैयार नही था । अंदर घुसते ही नजरे दौङायी तो दायी ओर की सीट खाली पायी ।

"चलो उधर बैठते है !" मैने परी से कहा । मै और वो चल दिये ....जहाँ हम दो बैठने वाले थे । बैठते ही , मैने पानी पिया क्योकि अपने रूम विश्वविद्यालय मैट्रो स्टेशन से राजीव चौक तक के सफर मे मै थक चुका था ।

"तो तुम अब घर जा रहे हो ।" परी ने कहा ।


मै - हाँ, अब नया सफर तय करना है जो मेरे पिता ने निर्धारित किया है !

" हमममम , ठीक है !" मायूस भरे चेहरे से परी ने कहा ।

कुछ देर हम दोनो शांत हो चले थे । सिर्फ साँसो की सरसराहट की आवाज आ रही थी , तभी अचानक परी ने मुस्कुराते हुये नजरे झुकाकर कहा ," तुम जब भी मिला करो मुझे गले लगाकर मेरे ओठो पर प्यार से प्रहार किया करो ! "

" ओह ! अच्छा !! आज इतना प्यार कैसे ? " मैने कहा ।

( ऐसा मैने इसलिये सोचा क्योकि अमूमन मैने उसे कभी ऐसा कहते नही सुना था ! )

" बस यू हीं !! दिल ने कहा तो कह दिया !! " परी मुझसे बोली ।

( बस ये यू ही शब्द मै आज तक नही समझ पाया । जो हर लङकी का सबसे प्यारा शब्द होता है । इस यू हीं शब्द को समझने मे मुझे अपनी जिंदगी बहुत कम लगती है । जब परी ने मुझसे कहा था ," अब हम आपको नही किसी और को प्रेम करते है !" तब भी मैने पूछा था ," आखिर क्यो ? " उस समय भी तुम यह कहकर चली गयी थी ," बस यू हीं !!" मेरे शब्दकोश मे यह शब्द नही है । नफरत है तुम्हारे इस " यू हीं" शब्द से । भाङ मे जाये यू हीं !!! " )

" अच्छा ! खैर छोङो सब ये बताओ जिंदगी का क्या सोचा है ? " परी ने अपने बालो को सभालते हुये कहा जो उसके गालो पर बेबजह प्रहार कर रहे थे ।

मै - जिंदगी का क्या सोचना है ......तुम्हारे साथ बितानी है और क्या !!!

परी - अरे बुद्धू !! क्या करोगे जीवन मे भविष्य मे क्या करने का सोचा है ???

( जब लङकियाँ बुद्धू / बाबू / सोना कहती है तो कसम से कुछ पल के लिये ऐसा लगता है अब कुछ नही चाहिये जो कुछ है यही है । पर दरअसल ये शब्द सामने वाले को मूर्ख / भ्रमित करने के लिये ही प्रयोग किये जाते है । )

मै कुछ देर मौन रहा और कहा ," लेखक बनना चाहता हूँ । एक बहुत अच्छा और बेहतर लेखक !!! "

"अद्भुत ! ग्रेट !! बनोगे तुम । एक अच्छे लेखक बनोगे । पर मिस्टर लेखक , तुम अच्छे लेखक तभी बन सकोगे जब मुझ पर लिखोगे !! " परी ने मुस्कुराते और एक आँख बंद करते हुये कहा ।

मै - हहहहहहा ! तुम पर .....!! पर तुम पर क्या लिखूँगा ??? पागल हो बिल्कुल तुम .......

" सच्ची कह रहे है बाबू !मुझ पर लिखे बिना एक बेहतर लेखक नही बन सकते ! " इस बार उसकी हँसी मे मुझे चालाकी नजर आ रही थी ।

बेशक तुम उस समय मजाक मे थी पर मै आज समझ रहा हूँ कि तुमने ऐसा क्यो कहा था ? आज कलम उठती है तो तुम पर ही चलती है और तुम पर ही रूकती है ।

" तुमसे बिछङकर ही तो लिख पाता हूँ , जब तुम पास होती हो तो बस तुमको पढ़ता हूँ । "

तुम्हारा

अंकुर त्रिपाठी 'विमुक्त'
hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.