ऐसी ही एक सुबह जब मै किसी से मिलकर वापस अपने बैरक की ओर जा रहा था, देखा कि एक मज़दूर-नेता टाइप का व्यक्ति, संतरी से कुछ ज़ानकारी लेकर सीखचों के पास उदास खड़ा था.उसने मुझे सलाम किया तो मैंने औपचारिकता में पूछा- “ क्यों कामरेड,क्या बात है?”

वह बोला- ‘‘भैया क्या बताऊं ! मै कम्युनिस्ट पार्टी का छोटा मोटा नेता हूँ. जेल भरो आंदोलन के तहत प्रदर्शन में बस्ती के शकूर अहमद जी कहने पर हमने बीड़ी बनाने वाले 100 आदमियों की गिरफ्तारी दिलाई. अब सब 5 दिन से यहॉ पड़े हैं कोई हाल –चाल पूछने नही आ रहा. इससे लोगों का मनोबल टूट रहा है और वो मेरी जान खा रहे हैं ...रोज कमाने खानेवाले लोग हैं..उन्हें घर से भी उलहने आ रहे हैं.रोज खबर आती है कि आज कोई नेता मिलने आने वाला है लेकिन आता कोई नही.आज ही...शकूर अहमद जी के आने की बात थी मगर अभी पता चला कि नही आ पाएंगे. अब उन्हें ये समझाना मुश्किल होगा...वो समझते हैं कि मै झूठी तसल्ली दे रहा हूँ.’’ इतना कहकर वह थोड़ा रुका फिर अचानक मुझे रोककर बोला- “सर, आप मुझपे एक एहसान कर सकते है !”

“ हॉ...हॉ, बोलो !” मुझे उससे सहानुभूति हो आई थी.

“ सर, आप बिल्कुल नेता लगते हो .मै अपने साथियों से कहूंगा कि शकूर साहब ने आपको भेजा है ...खैरियत पूछने के लिए.आप बस थोड़ा उन्हें तसल्ली दे देंगे तो मेरी जान बच जाएगी.” उसकी बात सुनकर मैने स्वयं की ओर निहारा.सिवाय कुर्ते-पाजामे और बढ़ी हुई दाढ़ी के मुझे नेता टाइप ऐसा कुछ अलग से नज़र नही आया. अब चूंकि वह मानता है कि मै उसके किसी काम आ सकता हूँ...तो मै तैयार हो गया .पर एक बात मैंने उससे साफ कर दी कि मुझे नेता टाइप लच्छेदार भाषण देना नही आता.मै साधारण सा कॉलेज़ स्टूडेंट हूँ.

“ वो सब आप मुझपर छोडिए, बस हॉ कर दीजिए. मैने कहा –“जैसी तुम्हारी इच्छा .”

और नाटक शुरू हो गया . मुझे आगंतुक कक्ष में ही रुका रहने को कहकर वह अपने बैरक की ओर चला गया. इस बीच वहॉ उपस्थित स्टॉफ को भी मैंने सारी बात बताकर उन्हें सहयोग के लिए मना लिया . थोड़ी देर में उनकी बैरक की ओर से जोर-जोर से नारे लगाए जाने की आवाज़ आने लगी और वह गरीब नेता अब थोड़ा अकड़ा हुआ...,अपने पीछे मज़दूरों का रेला लिए, आता दिखाई दिया.फिर क्या था ...मेरे पास सुबह भेंट में मिला फूलों का एक गुलदस्ता था . जब वो सब मेरे बिलकुल क़रीब आ गए तो मैंने सीखचे से उन फूलों को उनकी ओर उछाल दिया . बस ...ज़िंदावाद-ज़िंदावाद के साथ ज़मकर तालियॉ बज़ीं.

सुरक्षा की दृष्टि से वो सारे लोग सीखचों से जेल के अंदर की ओर थे और मै दूसरी ओर, जहॉ से आगंतुक लोग आकर मिलते हैं. मैंने उनसे क्या कहा था मुझे ठीक से याद नही...बस इतना याद आता है कि मौज़ूदा सरकार की लानत लमानत की थी और उन्हें तसल्ली दी थी कि शीघ्र ही उन्हें वो सब मिलेगा जिसके लिए आज वे यहॉ कष्ट भोग रहे हैं. दो चार शिष्ट झिड़्की जेल के स्टोफ को भी दी थी. फिर यह भी कह दिया था कि इनकी कोई गलती नही है ये भी तो हमारी-तुम्हारी तरह वर्कर हैं... अपनी ड्युटी कर, बाल-बच्चों का पेट पाल रहे हैं. हमारी लड़ाई तो उन लोगों से है जो हमारा... गरीबों का खून चूस रहे हैं...बस. इसके बाद मैने उस नेता की ओर देखा और वह फौरन नारे लगवाता उन लोगों को लेकर अपनी बैरक की ओर चल दिया .मैंने चैन की सॉस ली और जब वे सारे अपने बैरक में घुस गए, मै भी अपनी बैरक की ओर बढ़ लिया .

***

हमें जेल में रहते कोई 8-10 दिन हो गए थे .एक सुबह फिर ऑफिस से बुलावा आया .बहुत अच्छा लगता था जब ऐसा कोई बुलावा आता था .मगर विज़िटर रूम जो देखा तो खाली था, तब...अंदर ऑफिस की ओर संतरी ने इशारा किया पर वहो तो घुले साहब अकेले ही बैठे थे.मुझे देखकर अंदर बुला लिया और बोले- “ देखो,अब तक तुम लोगों के छोड़ने की कोई सूचना नही आई. तुम लोग कब तक और किनके भरोसे यूं बैठे रहोगे ! दो दिन बाद सत्र समाप्त हो जाएगा और सब अपने-2 घर चले जाएंगे...फिर !”

“ साथी हैं ना “ यद्दपि मै भी यह कहते-2 थोड़ा झिझक गया था .

“ साथी.... तुम्हारी ज़मानत लेंगे ? सुनो तुम्हारा कोई रिश्तेदार हो या तुम्हें घर खबर भिजवानी हो तो मुझे बताओ...मै खबर कर दूंगा ...यहॉ है कोई ?” उन्होंने अपनेपन से पूछा.

“ एक चाचा हैं...अ‍ॅन्डर सेकेट्री. लेकिन मै उन्हें इस पचड़े में नही घसीटना चाहता .”

“ और वो पड़ेंगे भी नही...सरकारी अधिकारी हैं और तुम्हारा केस शासन के विरुद्ध है.” उन्होंने अपना शक ज़ाहिर किया .

“लेकिन मै घरवालों को भी परेशान नही करना चाहता...पिताजी ही हैं,वो भुसावल से भागे -2 आएंगे...तो मुझे अच्छा नही लगेगा .”

“फिर !” वे चिंतित लगे...शायद हम पर तरस आ रहा हो या जेल में हमारी गतिविधियॉ उनकी व्यवस्था में आड़े आ रही हों...कुछ कह नही सकता ! लेकिन चिंतित मै भी हो गया मुझे भी लगा कि सच में अगर ये लोग भूल गए तो !आखिर मै बोला –“सर, अब इतने दिन कट गए तो विधान सभा के समापन तक देख लेते हैं...वर्ना फिर कुछ करेंगे.”इतना कहकर मै वहॉ से चला तो आया लेकिन मन खिन्न हो गया था .साहू ने पूछा तो उसे भी सब बताना पड़ा .वह बोला – मै तो घर सूचना भिजवा देता हूं ...इनके भरोसे कहॉ तक रहेंगे...और उसने ऐसा ही किया .

झींकते –लड़्ते, हंसते-रोते विधान-सभा सत्र का अंतिम दिन आ गया .रात भर नींद नही आई.और सुबह से मन ही मन कान, खुश खबरी सुनने के लिए उतावले होते गए. उस समय मुझे रह-रह कर ये गाना याद आ रहा था –‘ज़रा सी आहट होती है तो दिल सोचता है...कहीं ये वो तो नहीं...’ लेकिन जब 5 बजे तक कोई हलचल दिखाई नही दी तो दिल बैठने लगा .उस दिन लगभग सारा दिन वो क़ैदी वार्डर, मेरे आस-पास मंडराता रहा, जिससे मेरी खूब छनने लगी थी.जब शाम के 6 बज गए तो वो भी निराश होकर, गेट में ताला लगा कर चला गया और इस दिवस का भी अवसान हो गया .

लगभग 7 बजे फिर गेट खुला । यह प्रादेशिक समाचार का समय होता था और चूंकि रेडियो एक ही हुआ करता था ,सब लोग साथ बैठकर उसे सुना करते थे....आकाशवाणी.और वाचक देवकीनंदन पांडे ! लेकिन उस दिन गेट खुलते ही वार्डर ने आकर मुझे बाहों में जक़ड़ लिया और बोला –“भैयाजी छुट्टी हो गई.”उसके पीछे और कई लोग थे ...सब ने बधाई दी और कहा –“ आपको धुले साहब याद कर रहे हैं.”

मै लगभग भागता हुआ ऑफिस पहुंचा .वहॉ जेलर साहब भी थे. मुझे देखते ही दोनों ने मुझसे पहली बार हाथ मिलाया और बोले –“ सक्सेना ,मान गए तुम्हें ! तुम्हारा हर काम स्पेशल हुआ है. अभी-अभी गवर्नर हाउस से तुम्हें रिलीज़ करने का आदेश आया है...यू ऑर वेरी लॅकी.ऐसा अमूमन होता नही है.”

“थैंक यू सर...” कहते-कहते मेरा गला रुंध गया था.अब चूंकि 7 बज चुके थे मै समझ गया कि कल सुबह ही मुझे छोड़ा जाएगा .अत: पूछा –“कल कितने बजे छोड़ेंगे ?”

यह सुनकर वो थोड़ा मुस्कुराए,फिर बोले- “बेटा, जब राज्यपाल तुम्हें स्पेशल रिलीज़ ग्रांट कर सकता है तो हम भी कुछ प्रिविलेज़ रखते हैं. यू ऑर फ्री फ्रॉम दिस मूमेंट...ऐंड लीव माए चेम्बर...ज़स्ट नाउ !

“हुर्रे....” मेरे मुंह से निकला .यह बाद में पता चला किरे कुछ साथी उस सुबह राजोरिया की अगुआई में हमारे लिए राज्यपाल से मिले थे और उन्होंने छोड़ने का आश्वासन दे दिया था.

जेल से जब निकला तो अंधेरा घिर आया था . बाहर एक परिंदा भी नही था .पल भर सोचता रहा कि जाऊं तो जाऊं कहॉ ? उस समय मुझे गाइड पिक्चर का वो सीन याद आ रहा था जिसमें देवानंद कंधे में कोट लटकाए जेल से बाहर निकलता है... .फिर एम.एल.रेस्ट हाउस की तरफ रुख किया जो जेल से बहुत दूर नही था .

***

hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.