बेरंग मूर्ति

ग्रामीण अनगढ़ हाथों के द्वारा यह खूबसूरत राधा कृृष्ण की मूर्ति की आज यह दशा देख यादव जी अत्यन्त खिन्न और परेशान थे.क्या हुआ कि रिटायरमैंन्ट के बाद कुछ अच्छा करने की सोच के कारण यादव जी ने अपने गांव डालुहेड़ा के पुराने जीर्ण शीर्ण मन्दिर में कुछ सुधार करने हेतु पहले से स्थापित शिव परिवार के साथ एक राधा- कृष्ण की  सुन्दर सफेद संगमरमर की मूर्ति की स्थापना धूमधाम से करायी! सारे गांव को भोजन कराया.लेकिन सालभर होते न होते एक स्त्री ने दिया जलाकर राधा जी के चरणों में कुछ इस तरह रखा की थोड़ी देर में ही मूर्ति की पोशाक धूं धूं कर जलने लगी ..सुन्दर मूर्ति बेरंग हो गयी आंख नाक तक खराब हो गये..।

यादव जी के दुख का पारावार न रहा.। श्रद्धा और प्रेम से स्थापित मूर्ति का यह हश्र होगा उन्होने सपने में भी न सोचा था पर अब हो भी क्या सकता था सिवाय इसके कि पुन: मूर्ति का जीर्णोद्धार किया जाये.अनेक जगह फोन से सम्पर्क किया .कहीं से जवाब अाता' हम कुछ नही कर सकते ' ,कोई कहता 'मूर्ति को यहीं ले आओ' ! अब स्थापित मूर्ति को ऐसे कैसे उखाड़ दें ,करते करते छ: महीने बीत गये ! पर कुछ भी ना हो सका ! एक दिन मेरठ बाऊजी के सामने यादव जी ने इस समस्या का जिक्र किया. बाऊजी ने भी न जाने कहां कहां सम्पर्क किया पर कुछ ना हो सका ,पता नही ईश्वर को क्या मन्जूर था ,बिना उसकी इच्छा के कभी कुछ हुआ है भला ! यादव जी की बेचैनी दिनो दिन बढ़ती जा रही थी! उन्होनें एक दिन बाऊजी से कहा ," मुझे आप से ही उम्मीद है शर्मा जी!"
एक दिन बातों ही बातों में बाऊजी ने अम्मा से कहा ," सुनो ये काम अनुराधा भी तो कर सकती है !"
रंगों से खेलने का शौक मुझे बचपन से ही था । मैंने कईं ऐसी पेंटिग बना रखी थी जो घर पर दिवारों पर सजी थी और आने जाने वाले लोगों की दृष्टि में आ ही जाती थी बस इसी विश्वास के कारण बाबूजी ने अम्मा से यह कह दिया । पर अम्मा को न जाने क्यूँ ये अच्छा नहीं लगा और अम्मा नाराज होकर बोली ," कैसी बातें करते हो, भला वो ये सब  कैसे करेगी ..और फिर दिल्ली से इतनी दूर गांव में भला वो कैसे जायेगी!"

बाऊजी चुप हो गये! पर अन्तर्मन इस बात को लेकर परेशान रहता ।अब यादव जी के साथ बाऊजी भी मूर्ति की  बहुत चिन्ता करने लगे  ,उन्हें लगा कि जब बहुत परेशान होकर यादव जी ने उनके सामने इस समस्या को रक्खा है तो ये उनका भी नैतिक दायित्व बनता है कि इसमूर्ति के लिए वो भी कुछ करें ।

  इसी कारण एक दिन मौका पाकर बाऊजी ने मुझे सारी बात बताई तथा  बेरंग मूर्ति की फोटो भेजकर संकोच के साथ कहा," देख क्या ये मू्र्ति ठीक हो सकती है ? संकोच अम्मा की वजह से था पर यादव जी का बार बार कहना भी उन्हें परेशान कर रहा था , और अब एक यही एक आशा की किरण नजर आ रही थी साथ ही पिता होने के कारण वो मुझे अच्छे से जानते थे कि ऐसे कामों को मैं भी बड़े उत्साहपूर्वक करती हूँ। अत: मैंने सुनते ही कह दिया कि किसी दिन छुट्टी में मैं आकर देख लूंगी कि हो पायेगा या नहीं। पर इस बात में भी कई महीने निकल गये । तब गर्मियों की छुट्टियां पड़ते ही बाऊजी ने मुझे याद दिलाया कि एक दिन समय निकालकर  मूर्ति को देख आते हैं ।

डालुहेड़ा मेरठ से लगभग तीस पैंतिस किलोमीटर दूर एक छोटा सा गांव है! उसी के पास  कुछ किलो मीटर दूर  सुप्रसिद्ध पुरा महादेव जी के नाम का शिवमन्दिर है, एक तरफ प्रसिद्ध बाल्मीकि मन्दिर है ,कहते हैं कि सीता माता इसी स्थान पर धरती में समायी थी. पास में ही बरनावा में लाक्षाग्रह यहीं है , जिस लाख के घर में कौरवों ने पांडवों को जलाने की साजिश की थी ,रास्ते में पांचली गांव भी है जहां पर नैचुरलपैथी का एक प्रसिद्ध आश्रम भी है ।

इतने सारे आकर्षण के साथ बहुत दिनों बाद गांव ,खेत हरियाली और आम लीची से लदे के बागों को देखने की इच्छा जाग्रित हो गयी । साथ ही  शहर के कोलाहल से मुक्ति की प्रबल इच्छा  और  मूर्ति ठीक करने की चुनौती .. सब कुछ मुझे चवालिस पैंतालिस डिग्री की गर्मी में गांव डालुहेड़ा की ओर ले चला।

16 मई 2016 को सुबह मेरठ से बाऊजी ने यादव जी को फोन किया कि आज मूर्ति को देख लेते ,पर हमारे पास गांव आने के लिये कोई साधन नही है !तब तुरन्त यादव जी ने कहा ,"आप चिन्ता ना करें अभी मैं भतीजे के साथ गाड़ी लेकर आता हूँ !"

लगभग डेढ़ घन्टे बाद प्रदीप और यादव जी हमें लेने पहुंच गये! ग्यारह बजे के करीब हम डालुहेड़ा के लिये रवाना हो गये .गर्मी काफी थी. ..लगभग  आधे रास्ते पहुंचने के बाद गाड़ी में कहीं से अजीब सी आवाज आने लगी ,रोककर देखने पर ज्ञात हुआ कि एक बड़ी सी कील पहिये में घुस गयी  थी . देखने पर ज्ञात हुआ कि ट्यूब बिल्कुल बेकार हो गयी थी । तब  ज़िक्र हुआ कि चलो कोई नहीं स्टैपनी बदल लो पर हैरानी तो तब हुई देखने पर ज्ञात हुआ कि गाड़ी में स्टेपनी ही नही थी । इतनी भंयकर धूप और गर्मी में लड़कों की यह लापरवाही सभी को बड़ी नागवार गुजरी  लेकिन अब कर भी क्या सकते थे ।लोगों से पूछा कि कोई पंचर लगाने वाला है क्या आस पास ... । किसी ने इशारा करके कह दिया कि हाँ यहीं पेट्रोल पम्प के पास  में ही बैठता है एक पंचर लगाने वाला ।

प्रदीप ने भरी दुपहरी 44 - 45 डिग्री के तापमान के बावजूद भी बिना किसी शिकन के कन्धे पर टायर उठाया और ट्यूब बदलवाने के लिये चल दिया । काफी देर हो गयी लेकिन प्रदीप नही आया तो थोड़ी चिन्ता हुई कि कहीं गर्मी के कारण कोई परेशानी तो नहीं हो गयी ।  फिर इन्तजार करने के बाद फोन किया तो फोन भी गाड़ी में ही बजने लगा , पुन: लड़कों की लापरवाही पर थोड़ी हैरानी हुई सबको । पर सम्भवत: ग्रामीण परिवेश में मोबाईल ने अभी इस तरह घुसपैठ नहीं की थी जैसी हमारे शहर के अति आदि युवा वर्ग में मोबाइल और सोशल मिडिया ने जकड़ बना रखी है वहीं दूसरे कठिन कामों से दूरी । फिर मन नें यह भी कही कि क्या कोई शहरी युवक इस काम को क्या इस तरह कर पाता ???

.खुली सड़क पर भरी दुपहरी और गर्मी तो कहर बरसा ही रही थी ..लोगों से पूछा तो पता लगा की पेट्रोल पम्प तो बहुत दूर है । बड़ा अफसोस हुआ कि लड़का कन्धे पर ही टायर लेकर इतनी दूर कैसे गया होगा .. ।  तभी कन्धे पर टायर रखे प्रदीप मुस्कुराते हुए आया तथा झट से टायर को गाड़ी में फिट कर दिया । लड़के की सहनशीलता तथा धैर्य काबीलेतारीफ़ था । वह लड़का पूरी श्रृद्धा और लगन से सम्मानपूर्वक राधे कृष्ण की मूर्ति के कायाकल्प के लिए पूर्णत: आश्वस्त और समर्पित था मानो वहीं हम लोग भी यही सोच कर चुपचाप भरी दोपहरी को झेल गये थे कि न जाने इसी में कुछ भलाई हो ।

हम पांच लोग यादवजी, बाऊजी,अम्मा,प्रदीप और मैं पुन: इस तरह रास्ते की लगभग पौने घन्टे की इस यात्रा बाधा को पार करके अपने नेक काम की और अग्रसर हु

यहां देखने वाली बात यह थी कि अक्सर किसी कार्य मैं इस तरह बाधा पैदा होती है और स्थितियां कष्टकारक होती हैं तो इन्सान की आदत होती है कि वह अक्सर एक दूसरे को दोष देते रहते हैं.. मन ही मन भुनभुनाते रहते हैं ..किसी पर बस नही चलता तो स्वयं पर ही गुस्सा निकालते हैं.. पर हैरानी के स्तर पर यहां सभी इस भीषण गर्मी में एकदम शान्त एवं स्थिर थे मानो भगवान जी हमारी सहनशीलता की परीक्षा लेना चाह रहे हों । तब मुझे अपने गुरुदेव के शब्द याद आए कि 'श्रद्धा और कृतज्ञता हमारी संस्कृति के मेरुदण्ड हैं ।'

ये इसी भाव का परिणाम था कि इतनी विपरीत परिस्थिति में भी हरेक व्यक्ति  के चेहरे पर झुंझलाहट की जगह एक विशिष्ट शान्ति और मुस्कान थी!
रास्ते भर बड़े बड़े हरियाले खेत ,बड़े बड़े घने छायादार वृक्ष खासतौर से अम्बियों से लदे बार बार आने वाले आम के पेड़ मन को अपनी ओर आकर्षित कर  रहे थे ..ललचा रहे थे !इस प्रकार प्रकृति के सुन्दर दृश्यों का आनन्द उठाते हुये आखिरकार हम गांव पहुंचे ही गये।
गांव छोटा ही था ,। छोटी छोटी घुमावदार गलियां ,,बेतरतीब सा ईंटों से बना खड़ंजा । खड़ंजे के दोनो तरफ आज भी वही पहले जैसी खुली नालियाँ ,छोटे बच्चों की प्रश्नाकुल आँखें ।
किसी अजनबी के आने पर आज भी गांव के लोग घर के दरवाजे पर थोड़ा हैरानी से ,लगातार टकटकी लगाये देखे जा सकते हैं ,आंखों में एक प्रश्न के साथ ,कौन हैं ,कहाँ से आये हैं और मुख्य रूप से किसके यहां आये हैं ।
तभी रास्ते में मेरी कल्पना से छोटा एक मन्दिर दिखाई दिया । परिसर के बीच में एक चौंतरे पर छोटा सा लेकिन काफी पुराना मन्दिर बना था । गांव के लगभग  हर मन्दिर की तरह । वहीं पर एक पुराना बड़ा पीपल का पेड़ भी था जिसके चारो तरफ एक बड़ा चौंतरा बनाया गया था। एक दो पेड़ और भी थे । मन्दिर के अन्दर एक शिवजी की पत्थर की मूर्ति परिवार सहित विराजमान थी ।तथा एक तरफ लकड़ी के बदरंग से दरवाजे के अन्दर वही राधा कृष्ण की मूर्ति स्थापित थी जिसके लिए हम यहां आए थे । मूर्ति जलने के कारण काफी खराब हो चुकी थी ।
इसके अलावा रखरखाव के अभाव में मन्दिर काफी उपेक्षित और गन्दा लग रहा था ,जाले भी लगे थे । मुझे देखकर तब हैरानी हुई जब मन्दिर में अन्दर जाने पर वहाँ शिव परिवार के पास में ही एक काला कुत्ता तेज गरमी से बचने केलिए नि:संकोच आराम फरमा रहा था । मन्दिर के अन्दर भरी दोपहर में भी अंंधेरा था साथ ही रोशनी की कोई व्यवस्था भी ना थी । यादव जी भी हमारी इस मनोदशा को समझ गये और लाचारी में बोलें-
'"बस यहाँ गाँव में थोड़ी बहुत पूजा पाठ त्यौहारों पर ही हो जाती है बाकि समय लोगों को मन्दिर से कोई सरोकार नहीं होता इसीलिए सफाई वगैरहा के चक्कर में भी कोई नहीं पड़ता ,मैं भी कितना कर सकता हूँ।" सबकुछ देखकर मुझे थोड़ी चिन्ता हुई कि मैं इस कार्य को इन हालातों में ठीक से अन्जाम दे भी पाऊँगी या नहीं । लेकिन मन ने कहा अपनी तरफ से पूरी कोशिश करो बाकि ईश्वर के आधीन छोड़ दो ,और फिर जब प्रभु ने इतनी दूर से बुला भेजा तो बाकि काम भी ठीक से हो ही जाना चाहिए ।
मन्दिर का मुआयना करने के बाद पहले हम यादव जी  घर पर पहुंचे जो अच्छा खासा बड़ा था लेकिन  बिडम्बना ये कि इतने बड़े घर में मात्र दो बुजु़ुर्ग प्राणी ही रहते थे क्योंकि बच्चे पढ़ लिख कर अपनी अपनी नौकरी या व्यापार के हिसाब से सैट हे जाते हैं ।इसीलिए सब बाहर  । बहुत बड़ा घेर भी घर से लगा हुआ । खोर में मुंह मारती ,जुगाली करती वही सनातन गाय, भैंस और लवारे ..कटिया ,बछड़े ...देखकर मन बचपन में पहुंच गया।
घर पर पहले हमें  ताजे मीठे खरबूजे खिलाए गये । फिर पड़ोैस से एक सुन्दर सलीकेदार लड़की ने आकर हमसे नमस्ते की । किसी शहरी लड़की की तरह ही कॉन्फिडेंस से युक्त .. जा़हिर है पढ़ाई लिखाई तथा मोबाइल ,लैपटॉप और सोशल मिडिया का काफी कुछ प्रभाव यहाँ भी आ चुका था।.. वह बीए कर चुकी थी लड़की ने अच्छी दूधवाली चाय हमें पिलायी ।
सब कुछ के चलते मुझे मूर्ति की चिन्ता ही लगी थी । खैर हम अपने साथ रंग ब्रश और जरूरत का सामान लेकर चले थे कि बन पड़ेगा तो आज ही निपटा देंगे काम ।
और फिर खूब गरमी में ..,अंधेरे में ..थोड़ी गहराई में स्थापित पत्थर की मूर्ति को कलर से ठीक करने के चुनौतीपूर्ण काम में हम लग गये । यहाँ भी मेरा सहायक प्रदीप और कुछ बच्चे बने जो वहाँ इकट्ठा हो गये थे इसी जिज्ञासा के साथ कि आखिर यहाँ हो क्या रहा है ? वो कभी मुझे ,कभी मूर्ति को तो कभी प्रदीप को  देखते इस आशा के साथ कि भाई बता दे 'यहां क्या हो रहा है ? 'प्रदीप मुँह पर उंगली रख सब बच्चों को शान्त रहने को कहता कि इस गुरुतर काम में दखल ना डालें जिसका उत्तरदायित्व उस पर है । समझ में आने पर सब बच्चे इस बात का इन्तजा़र करने लगे कि कोई काम हमारे भी हिस्से आये ।ये बिल्कुल ऐसे था जैसे स्कूल में बच्चे अपने गुरु की पुस्तकें उठाकर साथ चलने में अपनी शान समझते हैं और अपने गुरु का प्रिय  कहलाने में गौरव का अनुभव करते हैं , कक्षा में उनकी एक विशिष्ट पहचान जो बनती है ।
हमने अपना काम इस तरह शुरु किया मानो हम ऑपरेशन थियेटर में हो एक डॉक्टर के साथ बाकि सहायक पूरी मुस्तैदी के साथ डटे हों कि पता नहीं कब कौन से औजार की जरूरत पड़ जाए।
कोई कलर ,कोई ब्रश तो कोई कपड़ा ही पकड़ा देता ब्रश पोंछने को  ..।,लगातार तीन घन्टे मोमबत्ती और  मोबाइल पकड़ना ,.भी अपने आप में एक टास्क था वो भी . पूरी मुस्तैदी से ...।   इस बहुत इन्ट्रस्टिंग टीम के साथ काम पूरा में भी पूरे तीन घन्टे लग गये  हमें यह सब करने में । कमर झुकाये पसीना बहाते हुए जहाँ जैसी आवश्यकता थी हमने यथा सम्भव अच्छा काम करने का प्यास किया । पत्थर पर पेन्ट से स्किन कलर लाना आसान नहीं था ..पर किया । राधा जी की साड़ी लाल..ब्लाउज हरा ...सब सुन्दर लगने लगा । गहने पीतवर्ण । कृष्ण जी की पोशाक ,बाँसुरी और मुकुट और चेहरे पर भी चमक आ गयी । पर अभी एक चुनौती बाकि थी और वो थी  उनकी आँखें ..।
बाकि में थोड़ा बहुत इधर ऊधर चल जाता लेकिन आंखों में जो रहस्य और सौन्दर्य चाहिये था वो ऐसी स्थिति में नामुमकिन नहीं पर कठिन जरूर था । कमर दुखने लगी थी । थोड़ी अन्दर गहरे में रखी मूर्ति के अनुसार हाथ को चलाना था ..ना कि मूर्ति को हम अपने हिसाब से कैनवास की तरह इधर उधर करलें । और क्योंकि सारा काम एक साथ हो रहा था तो यह भी नहीं की बार बार कलर मिटा और लगा सकें ।मुझे एक बार में ही चार आँखें और चार बारीक भौंहे बनानी थी वो भी अंधेरे में मोबाइल और मोमबत्ती के सहारे । वैसे भी शाम होने लगी थी । बाबूजी ने भी बाद में बताया कि मैंने कह तो दिया लेकिन इन हालातों में मूर्त्ति का चेहरा कैसे संवर पायेगा । लेकिन कहते हैं  जहाँ चाह होती है ,श्रद्धा और विश्वास होता है वहीं कार्य भी बखूबी सम्पन्न हो जाते हैं उस ईश्वर का नाम पर।
मैंने मन ही मन कृष्ण जी को याद किया ," प्रभुजी बहुत दूर दिल्ली से आयें हैं हम इस पुण्यकार्य के लिए ,लाज रखना ।"
और आश्चर्यजनक रूप से आँखें एक ही बारी में इतनी सुन्दर बनी मानो धन्यवाद दे रही हों कि तुमने एक अच्छा काम किया जरूरी था ये ।
मन प्रफुल्लित हो गया कि कठिन परिस्थितियों में एक नेक कार्य सम्पन्न हुआ इन हाथों से ,साथ ही कहीं थोड़ा गर्व भी कि आज मेरा पेन्टिंग का शौक सार्थक हुुआ ।
सब खुश थे । घर पर यादव जी के उसी भतीजे प्रदीप की बहु ने तब तक हमारे लिए स्वादिष्ट भोजन तैयार कर दिया था ।खूब खूब स्नेह और घी से भरी सब्जी और रोटी । और मेहमानों के लिए सबसे अहम बूरा चावल ..बूरा जिसमें बूरा कम घी ज्यादा था ।  भूख भी तब तक खूब लग गयी थी । फिर चलने का समय आया तो यादव जी ने पत्नी से कहा ," बेटी पहली बार घर आई है कुछ दो ।"
मैंने बहुत मना किया लेकिन उन्होंने बहुत जबरदस्ती करके मुझे हजार रुपये का नोट थमा ही दिया । "तुम बेटी हो हमारी .."  को मैं कैसे मना कर सकती थी ।
चलते समय हमने छत पर से प्रसिद्ध पुरा महादेव का मन्दिर भी देखा ,जहाँ पर पवित्र सावन में हरिद्वार से कांवड़ लाने वाले श्रद्धालु जल चढ़ाने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं । देर होने के कारण मन्दिर तो ना देख पाये बस दूर से एक झलक देख ली ।
और देखा शाम को पास वाले घर में बड़ी सी छत पर तीन चार धोती कुरते और मूंछों के साथ हुक्का गुड़गुड़ाते और बातें करते हुए गांव के बाबा ,चाचा और ताऊ जी ।
थोड़ी दूर एक घर में एक स्त्री चूल्हे में उपले ,तूड़ी और फूंकनी के साथ आग जलाकर पतीली में दाल बना रही थी । एक छत पर बहुत सारे गोबर के उपले पाथकर रखे हुए थे जिन्हें वो आज भी गोस्से बोलते हैं ।
गाँव और गाँव के काम जो मैंने बचपन में शौक में ,तो कुछ जरूरत में बहुत किये थे । खेत से साग तोड़ना ,आंगन लीपना ,चरखा कातना , टेरना ,आोखली और औखल में दाल चावल कूटना ,चक्की में आटा पीसना और बहुत सारे काम मुझे आज भी उतने ही प्रिय हैं जितने तब । जिनकी याद आज ताज़ा हो गयी ।
स्कूल से वापस आते समय रास्ते में भाई के साथ खेत से गन्ने तोड़कर चूसना भी हमारा तब एक प्रिय शौक था । और खेत के मालिक द्वारा देख लिये जाने पर डंडा लेकर दूर तक पीछे दौड़ना भी फिर कईं दिन तक रास्ता बदल कर स्कूल आना जाना .. सब याद आ गया इस यात्रा में ।
और फिर उसी गाड़ी से हम शाम को वापस मेरठ आ गये और फिर वही अपनी दिल्ली ।

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