उर्मिला रामरखिआनी की अंग्रेजी कहानी का हिंदी अनुवाद

उर्मिला रामरखिआनी की अंग्रेजी कहानी का हिंदी अनुवाद

उसने चाबी से दरवाज़ा खोला। उसका जी दहल गया। स्मिता की लाश हॉल में नहीं थी जहाँ वह छोड़ कर गया था । उसके शरीर में एक कंपकंपी दौड़ गई। लाश के बारे में, उसके इरादों के बारे में, कौन जानता था? वह भी अब जब, उसने चुपचाप लाश को ठिकाने लगाने की तैयारी कर ली, तो लाश गायब ! एक बात निश्चित थी की स्मिता की लाश खुद उठ कर घर से बाहर नहीं गई । शायद वह भूतनी बन गई हो, मगर वह तो भूत प्रेत में विश्वास नहीं रखता ।

शयनकक्ष से कुछ आवाज़ आई। वह एहतियातन अंदर गया । उसको एक और झटका पहुंचा, जो खिड़की वह अंदर से बंद करके गया था खुली थी। हवा पर्दो से अठखेलियां कर रही थी। ज़रुर कोई घर के अंदर आया था। लेकिन कौन? कैसे ? उनके घर की चाबी किसके पास थी? खिड़की तोड़कर कोई अंदर नहीं आया था। परेशान, भयभीत, ध्वस्त वह घर से निकला। निकलते वक़्त दरवाजा ज़ोर से बंद किया। बाहर आकर उसे ज्ञात हुआ कि घबराहट में घर की चाबी हॉल में रह गई थी।

इस मानसिक हालत में चाबी वाले को ढूँढना मुश्किल था। उसने सोचा कुछ समय तक यहाँ से दूर जाना चाहिए, या बेहतर होगा दो दिन के लिए शहर से बाहर चला जाए। हताश, चिंतित अवस्था में वो बस डिपो पहुंचा । उसे ठीक से याद था कि उसने स्मिता के ग्लास में नींदकी गोलियों से भरी शीशी डाल दी थी, और उसने ग्लास में से उसके सामने ही पीया था । उसके बाद स्मिता तुरंत ही निद्रावश हो गई थी। इतनी सारी नींद की गोलियां लेने के बाद स्मिता का ज़िंदा रहना नामुमकिन था। उसने देखा था स्मिता की साँस टूट रही थी और फिर साँसे रुक गई। उसने रातको बोतल, ग्लास के निशान मिटा दिए थे। अब वह दुआ करने लगा कि स्मिता की लाश पुलिस के हाथ न लगे। बस कहाँ जा रही है ये देखे बग़ैर एक प्रतीक्षारत बस में चढ़ गया ।बस चल पड़ी ।

वह ये नहीं जनता था कि उसकी पत्नी को लग रहा था कि किसीकी जान को खतरा है, उसकी अपनी या किसी और की। स्मिता ने नींद की गोलियों की शीशी देख ली थी, जो न वह लेती थी और न राकेश। उसने राकेश को फोन पर बातें करते सुना था। राकेश फोन पर दबी आवाज़ में अपने दोस्त को एक योजना के बारे में बता रहा था, इसलिए स्मिता ने शीशी में से नींद की गोलियां निकाल कर दूसरी गोलियां रख दी थीं जिससे किसीको हानि न पहुंचे।

पिछली रात राकेश ने जब प्यार से उसके लिए शराब का जाम बनाया तो स्मिता समझ गई कि वह खुद निशाना बनने वाली है। उसने भी छद्म स्नेह का दिखावा किया और शराब का जाम हाथ में लेकर चियर्स ( शुभकामनायें) कह कर पीना शुरू किया ।

रात भर उसने ये खेल जारी रखा। जब भी राकेश उसको देखने आता थोड़ी देर के लिए अपनी साँस रोक लेती और वह समझता शरीर सुन्न हो गया है जैसे कोई मृत देह हो। उसने महसूस किया की राकेश उसे घसीट कर हॉल में ले जा रहा है । उसे लगा जैसे मौत सचमुच उसे गले लगा रही है। राकेश कुछ बुदबुदाता दरवाज़ा ज़ोर से बंद करके वहां से निकल गया ।

कुछ पल रुक कर वह उठी । अभिनय करके वह थक गई थी, पहले ढह जाना, सुन्न हो जाना और फिर साँस रोक कर मरने का अभिनय!! राकेश इतना बेवकूफ कैसे हो सकता है? उसने पानी पिया, और चहेरा ठन्डे पानी से धोया। वक़्त कम था, उसे यहाँ से भागना था राकेश के आने से पहले।

राकेश उसकी देह को ठिकाने लगाने का जुगाड़ कर लौटे उसके पहले उसे भाग जाना चाहिए । वह घर से बाहर निकली और पास के एक होटल में ठहरी। अब वह अपने पति के लौटने की प्रतीक्षा करने लगी। उसकी लाश न देख कर उसे कितना आघात पहुंचेगा।

अगली सुबह वह घर लौटी, उसने घर पर एक सरसरी निगाह डाली। शयनकक्ष की खिड़की अंदर से बंद थी, हॉल में फर्श पर राकेश का चाबी का गुच्छा पड़ा था। वह समझ गई की राकेश यहाँ आया होगा, भयभीत हो कर विफल अवस्था में तुरंत बाहर निकला होगा। वह सोचने लगी राकेश की प्रतिक्रिया क्या होगी अब जब वह घर वापिस आएगा ।

दूसरे दिन राकेश ने सभी अखबारों का परीक्षण किया ताकि उसे स्मिता की लाश के बारे में कुछ पता चले। कोई ख़बर न मिलने से थोड़ी राहत महसूस हुई। राकेश चाबी वाले को ले कर घर वापिस आया। घर का दरवाज़ा थोड़ा खुला देख चौंका। अचंभित, भयभीत होकर उसने दरवाज़ा खोला। देखा तो स्मिता बैठी है ,चाय पीते पीते अख़बार पढ़ रही है। ये कैसे संभव है? क्या वह जो देख रहा है सच है ? हाँ वाकई में वह स्मिता ही थी। उसे ज़ोर का धक्का लगा, लड़खड़ाता हुआ बेहोश हो कर गिर पड़ा ।

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